पुस्तक ः ‘नहीं जो हाशिये पर भी’ लेखक महेन्द्र सिंह

अरुण शर्मा ‘अजीब’


नही जो हाशिये पर
शब्द ब्रह्म को हृदयस्थ कर, दुष्यन्त की परम्परा मशाल को हिन्दी गीतिका-ग*ाल के माध्यम से रोशन करने मध्यप्रदेश के अल्पज्ञात गांव से एक चितेरा युवक आया, और अपने काव्य संग्रह से हलचल मचा कर जब आगे बढा तब ‘उसकी आवाज’ शीर्षक कविता का विवाद थम चुका था। लेकिन उसी तेवर में उसने सद्यः प्रकाशित ‘नहीं जो हाशिये पर’ रचा, और सहजता से मध्यप्रदेश के हिन्दी जगत में अपनी पहचान बनाई।
कवि की जागरूकता के स्तर का पता एक शेर से चल जाता है-
‘फन तो वह है जिसे देखे वाह वाह निकले,
ऐसी महिमा क्या ? जिसे खुद फनकार कहे।
ग*ाल संग्रह पर विद्वान टीकाकारों ने अपनी टिप्पणियां दी है, उनमें सर्वश्रेष्ठ जहीर कुरैशी की टिप्पणी है कि कवि ने संवेदना को सहलाने, गुदगुदाने की अपेक्षा, पाठक को बेचैन किया है। मेरा मानना है कि कवि को पता है कि सामाजिक यथार्थ के साथ चेतना का स्तर भी बदल रहा है। अन्तर्विरोधों से जूंझने के संकल्प, राजनैतिक विसंगतियों पर प्रहार और सांस्कृतिक विडम्बना से संघर्ष की अभिव्यक्ति ग*ालों में खूब हुई है।
एक अलग संप्रेषण की बानगी है समर्पण के नाम में मेघ पाटकर, महाश्वेता देवी और, अल्पज्ञात रमणिका गुप्ता का नाम है। अर्थात् आधी आबादी के प्रति उनका सम्मान है, और इससे वे संभवतः उर्जा भी ग्रहण करते हैं।
ख्यातनाम शायर स्व. सागर खय्यामी ने एक शेर लिखा था, और उसी की तर्जुमानी महेन्द्र जी करते हैं-
रिश्ता रखते हैं मीर के घर से।
है तआल्लुक कबीर के घर से।। (सा.ख.)
जागी थी कभी फिक्र में गौतम कबीर में,
सदियां गुजर गई मगर वो सोई नहीं है। - महेन्द्र सिंह
कालजयी तेवर का शेर है-
मेरे जागने का सबब फैलता अंधेरा है।
रात के बाद जिब्ह हो रहा सवेरा है।।
बारीकी से देखिए तो ‘जिब्ह’ को सलीके से क्राफ्ट किया गया है, और इसी जज्बे को जब मुनव्वर राणा का कलम लिखता है तो वो यूं हो जता है-
अंधेरे देख तेरा मुंह काला हो गया।
मां ने आंखे खोल दी घर में उजाला हो गया।।
महेन्द्र की ग*ाल दुष्यन्त की जमीन पर जब अपने सृजन का फावडा चलाती है, तो न केवल धरती की चुप्पी टूटती है बल्कि वो खुद को तालशती प्रतीत होती है।
हां मगर तय तो है, चुप नहीं रह पाऊंगा मैं।
है मेरा सामर्थ्य कितना ? कह पाऊंगा मैं।।
वहीं एक चुनौती भरी रचना यथार्थ की जमीन पर, देखें,-
कल कबीर की जलती हुई लुकाठी से,
अपने घर को आग लगाकर आया हूं।।
और यह संग्रह की सबसे सशक्त रचना भी है।
व्यवस्था की विद्रुपता पर प्रहार के रूप में
धन के भव्य मंच पर जारी, प्रजातन्त्र का नाटक था।
और भरोसा संवादों पर, रहते कुछ विभ्रम भी थे।।
‘एक और ज्योति जलने दो’
अपने उद्बोधन म कुशल करण सांचीहर ने लिखा है कि यह आपाधापी का दौर है, और आहत को राहत देने का तरीका है कविता। अपने संप्रेषण में उन्होंने इसे सही सिद्ध किया है, कि यह आम आदमी की बोली में, उसके सोच और सरोकार को सहजता से अभिव्यक्ति करती है।
आम बोलचाल की भाषा के अभिनव प्रयोग में श्री कुशल करण सांचीहर ने एक गुलदस्ता गूंथा है। इनका रचना संसार, स्वगत प्रश्ा*ों में की गई, अनवरत चेष्टाएं हैं जिनमें संन्देश भी हैं, आग्रह का भाव भी।
पण्डितजी ये क्या हो रहा है।
क्या अजब जमाना है।
प्रकाशक प्रकाश फैला रहे इसकी बानगी है। अपने सृजन को विस्तार देने में कवि पूरा आत्मविश्वास दिखाता है।

गोष्ठियां महफिलें चलने दे।
निमंत्रण कहां
महफिल और मित्रों मिलते मिलाते रहे।
यायावरी करते चलें यात्राएं
कविताओं को स्केच बोर्ड की तरह इस्तेमाल किया गया है।
अपने भोगे हुए अतीत पर कवि गर्वित है, वहीं वर्तमान के प्रति असंतोष भी कई रचनाओं में दृष्टव्य है-
अब कहां सुर में सुर मिलते हैं।
आवो साथी बात करें।
ये छल युग का समय
यादें ही यादें रह गई अब यहां।
पारिवारिक प्रसंगों को भी उठाया गया,
कैसा हो विवाह
ये मकान मेरा नहीं, सौ वर्ष तो जिओ। में मुखर होती जिजिविषा है,
काव्य यात्रा के आदर्श में श्री विजयदान देथा ‘विजय’ की एक स्मृति उजागर करती श्रद्धांजलि स्वरूप कविता भी है। जो इनके समकालीन साहित्यकारों के साथ रचनाधर्मिता का निर्वहन करती उनकी प्रगाढता के स्तर को उजागर
करती है।
जीवन प्रवृति में एक सहज वृति हो, इसे लेकर ‘चैरेवति का नारा चरितार्थ होने दो।’ गाडी चलती है भगवान न्याय करे, गाडी चलने दो, सृजित हुई है।
कई कविताएं उद्बोधन, जागरण व संदेश देती हैं, जिसमें आओ सूरज के साथियों, अजर अमर साथी, ऐसा हो सकता है, प्रमख हैं।
सृजन फलक का विस्तार व्यंग्य की भाषा में गेय गीत है-
लाडू छूटे ना
शक्कर का हो राशन।
घी का किंचित प्राशन।।
खाने में दांत घिसे तो क्या, जीमण खूटे ना.........लाडू छूटे ना।।
वाह रे दानदाताओं! ये बाजार है, महंगाई का मिजाज तिकडमी तारे, ‘फूल्स डे मनाएं’ और ये कैसा विकास कविताएं मिश्रित व्यंग्य की हल्की फुल्की रचनाएं हैं। पर विद्रूपताओं पर खुलकर प्रहार करती हैं।
धुन में धुन मिले तो सब ठीक है।
सुर में सुर मिले तो सब ठीक है।।
सरल किन्तु सरस रचना है, जिसके एक छोर पर देवताओं देखो ? न्याय मन्दिर के भगवान ‘प्राण प्रतिष्ठा’ जैसी कविताएं अन्धविश्वासों पर चोट करती रचनाएं हैं।
सूफी स्वर को व्यक्त करती
‘शून्य ही शेष’ है जो अध्यात्म के रूझान को प्रकट करती है।
स्वगत शैली में ‘औ रुपये’ रची है, जिसमें द्वन्द्व है जड चेतन से संवाद का मुखर स्वर देती अभिव्यक्ति है। इसी क्रम में क्या भेद की बात है रची गई है।
‘भारत माता देख रही’
सुनो साथियों
राष्ट्र निष्ठा को व्यक्त करती रचना है। जिसमें कवि अपने समय को एक सुखद समापन की ओर ले जाता प्रतीत होता है।
‘साथियों आत्मा की आवाज सुनो।’
सुन्दर गेटअप, कवर और सटीक मुद्रण के अलावा न्यूनतम वर्तनी दोष, संग्रह को एक और आयाम देगी, और श्री कुशल करण सांचीहर को पहचान दिलाने के क्रम में एक कदम आगे की ओर बढाएगी।
एक पंक्ति में कहा जाय तो कुशल कवि के रूप में यह कविता संग्रह नये कीर्तिमान गढेगा। कवि ने जिस सरल भाषा का चुनाव कर इसे रचा है, और अपने अन्तरग भावों को शिद्दत से रखा है, श्लाघन्य है, स्तुत्य है। क्योंकि ऐसा प्रयास निराला, कबीर, खुसरो, सभी ने किया था।
काव्य जगत में एक और ज्योति जलने दो का स्वागत हो, और लेखक को और अधिक उत्साह मिले ऐसा विश्वास है, मारवाड की माटी की गंध और कहीं कहीं टेशन शब्दों का प्रयोग संग्रह को रोचक व संग्रहणीय बनायेगा, इसमें कोई दो राय नहीं। शुभकामनाएं। ?

प्रकाशक, साहित्य भण्डार इलाहाबाद (उ.प्र.) वर्ष -
२०१६ प्रथम संस्करण, मूल्य-२५० रु
पुस्तक ः ‘एक ज्योति और जलने दो’ लेखक कुशल करण सांचीहर, प्रकाशक-अरिहन्त प्रकाशन जोधपुर
(राज.), वर्ष-२०१६ प्रथम संस्करण, मूल्य २०० रु
१६०, शास्त्री नगर मेन सेक्टर, भीलवाडा (राज.)
मो. ९९५०३५४९७९