अमृतलाल नागर का कथा साहित्य ः भाषा वैविध्य

ईरम खान


मनुष्य के सार्थक एवं सर्वोत्तम विचारों को लिपिबद्ध करते हुए श्रेष्ठ रूप से अभिव्यक्त करना ही साहित्य कहलाता है। प्रत्येक काल के साहित्य में उस काल का जीवन छिपा रहता है। साहित्य लिखित हो या मौखिक उसका भाषा के साथ अन्योन्याश्रित सम्बन्ध होता है। चूंकि भाषा और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाषा है तो साहित्य है और जब साहित्य होता है तब भाषा स्वतः ही विकासमान होती है।
अमृतलाल नागर के साहित्य में प्रयुक्त बोलियों के विविध रूपों का चित्रण किया गया है। नागरजी का साहित्यिक व्यक्तित्व उनके अपने युगपरिवेश की उपज है। उनके साहित्य में एक ओर महानगरीय परिवेश की समूची घुटन के बीच विघटते मध्यम वर्ग की पीडा और आशा-आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति वाली भाषा का सहज रूप है, तो दूसरी तरफ लखनवी जन-जीवन को अभिव्यक्त करने वाली अवधि, बांग्ला, मराठी, ब्रज आदि बोलियों का समावेश है जिसमें वहाँ की जीवन-शैली के विधि रूपों को प्रस्तुत किया गया है। उनके समग्र साहित्य में भारतीय संस्कृति की सोंधी-सोंधी गंध और लखनवी अंदाज का मोहक रंग देखा जा सकता है। करीब ३८ साल पहले बीबीसी के आले हसन से बात करते हुये नागरजी ने अपने लेखन का फलसफा बयान करते हुये कहा था कि ‘‘मैं तो भाई जनता जो यहाँ बोलती है उस बोली का लेखक हूँ। न मैं हिंदी जानता हूँ और न उर्दू। मैं पढते-पढते थोडी भाषा *ारुर सीख गया हूँ। यही कह सकता हूँ कि अपने बारे में जानने का मेरा प्रोसेस अभी जारी है। इस दुनिया के भाषायी अनुभवों के सागर से मैनें बहुत पानी पिया है, लेकिन अभी भी प्यासा हूँ।’’१
भारतीय साहित्य में सम्पूर्ण भारत का बिम्ब मिलता है। साहित्य चाहे किसी भी भाषा में लिखा गया हो, परन्तु प्रचलित बोलियों के माध्यम से उसका प्रभाव समग्र देश पर पडता है। भारतीय साहित्य को भाषागत सीमा से दूर हटकर विशाल फलक पर बोलियों तथा मातृभाषा के माध्यम से ही भारतीयता की न*ारों से देखा जा सकता है। समस्त, प्राणियों में भाषा की वजह से ही मनुष्य श्रेष्ठ, समर्थ और विकासशील प्राणी है। सभी की अपनी स्थानीय बोली होती है, जिसे हम मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा के माध्यम से ही व्यक्ति अपने विचारों को अभिव्यक्त करता है। मातृभाषा के बारे में गणेश शंकर विद्यार्थी की ये पंक्तियाँ उल्लेखनीय है- ‘‘पराई भाषा चरित्र की दृढता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बनाकर उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है। इसलिए जो देश दुर्भागय से पराधीन हो जाते हैं, वे उस समय तक, जब तक कि वे अपना सब कुछ नहीं खो देते हैं, अपनी भाषा के लिए सदा लोहा लेते रहना अपना कर्त्तव्य समझते हैं।’’२ इन पंक्तियों से दृष्टिगत होता है कि प्रत्येक साहित्यकार अपनी पठनीयता को प्रभावित करते हुए मन को स्पर्श करने के लिए अपने परिवेश की भाषा को चुनता है।
नागरजी के रचना संसार में ग्रामीण और शहरी परिवेश और उसमें जीते-मरते लोगों का जीवन-संघर्ष अपनी पूरी संश्लिष्टता के साथ विभिन्न भाषिक परिवेशों में अभिव्यक्त हुआ है। वे मूल्यहीनता, दोहरापन, विषमता और विसंगति को अपनी अचूक दृष्टि स मार्मिकता में व्यक्त करते हैं। उन्होंने अपनी भाषा को बोलियों की रंगत देकर समृद्ध किया है। नागरजी ने अपने साहित्य के माध्यम से शिक्षा की प्रमुख समस्याओं में भाषाई समस्याओं पर गम्भीर विचार और चिंतन भी किया। उनकी दृष्टि में ‘‘भारत सच्चे अर्थों में तब तक आजाद नहीं हो सकता जब तक अपनी देशी भाषाओं में सम्पूर्ण व्यवहार नहीं करता।’’३
नागरजी मस्तमौला व्यक्ति थे। हिंदी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, अवधी आदि भाषाओं के लेखन के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे, लेकिन उन्हें भाषा से जुडी किसी पार्टी अथवा संगठन का सदस्य बनना पसंद नहीं था। नागरजी उन थोडे से लेखकों में है जिनका भाषा सम्बन्धी ज्ञान पर्याप्त व्यापक है। गुजराती उनकी मातृभाषा थी। इन सबके अतिरिक्त उन्होनें उर्दू, अंग्रेजी, तमिल तथा संस्कृत भाषा को रुचिकर समझकर पर्याप्त रूप से ग्रहण किया। नागरजी के उपन्यासों की आकर्षक विशेषता पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग ही है। उनका समग्र साहित्य ‘‘भाषा विज्ञान की सामग्री का अद्भुत पिटारा है। विविध भाषाओं, अनेक प्रकार की बोलियों
तथा ध्वनियों की संगीतात्मकता और लह*ो से पर्याप्त
परिचित है।’’४
नागरजी स्वयं बहुत अच्छे अनुवादक थे। उन्होंने ‘बिसाती’ नाम से मोपासाँ की कहानियों का अनुवाद किया। इसके साथ ही उन्होंने मराठी की कई कृतियों का हिन्दी में अनुवाद किया। अमृतलाल नागर ने अपनी लेखनी के दायरे में भारत के इतिहास भूगोल को अपने प्रसिद्ध अनुवाद साहित्य ‘आँखों देखा गदर’ में समेट लिया है। ‘‘हिन्दी के इस यशस्वी पुत्र ने मराठी के ‘यात्रा-वृतान्त’, ‘माझा-प्रवास’ को हिन्दी पाठकों के हाथों में पहुँचाने के लिए अपनी आत्मा में उतार लिया है। अठारह सौ सत्तावन की क्रान्ति का यह वर्णन देखें और भोगे गए गदर की ज्वाला को इतिहास ग्रन्थों से कहीं अधिक प्रामाणिकता से प्रस्तुत करता है।’’५
महान लेखक शरदचंद्र को मूल में पढने के लिए उन्होंने बांग्ला सीखी और बाद में बांग्ला भाषा पर भी अपना एकाधिकार कर लिया। नागरजी शरत से काफी प्रभावित थे, उन्होनें शरत के बांग्ला साहित्य को बार-बार पढा। हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषा का साहित्य पढना उनके लिए कभी केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, अपितु उनके लिए अध्ययन का प्रधान विषय था। ‘‘एक बार शरत ने उन्हें कहा भी था कि जो भी लिखो वह अधिकतर अपनी भाषा पर पकड के अनुभव के आधार पर लिखो। व्यर्थ के शब्दों की कल्पना के चक्कर में कभी नहीं पडना।’’६
साहित्यकार अपनी रचना में जिस परिवेश का चित्रण करता है वहीं भाषा भी उसी परिवेश के अनुरूप प्रस्तुत करता है। नागरजी ने भी अपनी समस्त रचनाओं में भारतीय संस्कृति के भिन्न-भिन्न परिवेश को चुना है। लखनवी परिवेश की भाषा को उन्होनें पूरी तरह से अपनी घुट्टी में पी लिया था। वही बोली, वाणी, वही लहजे, वही मुहावरें और वही शब्दावली। नागरजी ने एक खास तरह की भाषा गढी थी, जिसे उन्होनें गली-मोहल्लों में इकट्ठा किया था। प्रो. एस. पी. दीक्षित कहते हैं ‘‘उन्होनें लखनऊ के जन-जीवन को ओढा, बिछाया, इसको पूरी तरह से जीया। उसके पूरे इतिहास और पूरी सामाजिक सरंचना को समझा और हर वर्ग से निकट सम्बन्ध स्थापित कर तब उसे लेखन में परिणित किया।’’७
अपने उपन्यास ‘बूँद और समुद्र’ में नागरजी ने स्वाभाविक ठेठ अवधी के रंग में रंगी हुई *ांदगी के गहरे सवालों को उकेरने का प्रयास किया है। लेखक ने वहाँ की संस्कृति व विवाह के समय के मतभेदों का चित्रण अत्यन्त रोचकता से किया है- ‘‘करजा लेओ या चाहे जौन उपाय करो, बाकी सकुन्तला तो हमारे खटकुल मां जाई। अपने लरिकन-बिटियन का ब्याह चाहे मेहतरन के घर करयों, चाहे चमारन के हम न बोलब, हम अपना गंगा किनारे
जाय पडब।’’८
नागरजी के उपन्यासों में ही नहीं अपितु कहानियों में भी भाषा वैविध्य और नूतन प्रयोगशीलता के दर्शन होते हैं। उनकी कहानियाँ उनकी *ान्दादिली का प्रतीक हैं। वे अपने कथ्य के परिवेश को भोगते हुए सर्वत्र दिखयी देते हैं। परिवेश की सचेतनता उनकी शब्दावली में अपनी प्राणवत्ता के साथ उपस्थित होती है। नागरजी के कथा लेखन के बारे में रामविलास शर्मा ने लिखा है- ‘‘नागरजी के लेखन का सबसे बडा गुण यह है कि वे अपने पात्रों में घुल-मिलकर अपने को खो देते हैं। उनका कलाकार दूसरे के अस्तित्व में ही अपने को पहचानता है। वे पात्रों के नख-शिख बोली, बोली-ठोंली की विशेषताओं के अलावा उनके मन में बैठकर उसकी आशाओं, आकांक्षाओं के साथ सांस लेते हुए दुःख सहते और संघर्ष करते हैं।’’९
निष्कर्ष ः- सारांश रूप में हम कह सकते हैं कि अमृतलाल नागर के सम्पूर्ण कथा लेखन में भाषा वैविध्य देखने को मिलता है। भाषा के विभिन्न स्तरों पर इनका सहज अधिकार है। अपने लेखन में परिवेश की स्वाभाविकता लिए भाषा के अलग-अलग रूपों का प्रयोग इनके साहित्य में देखने को मिलता है। इनके साहित्य के समग्र अवलोकन से यह दृष्टिगत होता है कि इनकी भाषा में एक ओर महानगरीय परिवेश की समूची घुटन के बीच विघटते मध्यम वर्ग की पीडा और उसमें प्रयुक्त होने वाली सामान्य बोलचाल की खडी बोली का रूप है, तो दूसरी तरफ लखनवी जन-जीवन को व्यक्त करने वाली विभिन्न भाषाओं का मिला-जुला रूप है। ?
संदर्भ-
१. रेहान फ*ाल ः खांटी लखनवी थे अमृतलाल नागर, बीबीसी हिंदी, ई-ब्लॉग,http://www.bbc.com/hindi/india,
२२ अगस्त, २०१६
२. गणेश शंकर विद्यार्थी ः मातृ भाषा, वागर्थ (अंक-२३८), मासिक पत्रिका, मई, २०१५, पृ. आवरण
३. सीमान्त प्रहरी (अमृतलाल नागर अंक), १५ अगस्त, १९६६, पृ. २३
४. मंजू ताम्रकर ः अमृतलाल नागर के उपन्यासों का समग्र विवेचन, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (म.प्र.), १९९५, पृ. २४०-२४१
५. सुदेश बत्रा ः अमृतलाल नागर ः व्यक्तित्व, कृतित्व एवं सिद्धांत, पंचशील प्रकाशन, जयपुर, १९७९, पृ. २४८
६. अमृतलाल नागर ः जिनके साथ जिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, १९८३, पृ. ३०
७. साहित्यकार ः श्री अमृतलाल नागर जी, लावण्यम,
ई-ब्लॉग,
७. साहित्यकार ः श्री अमृतलाल नागर जी, लावण्यम,
ई-ब्लॉग, http://www.lavanyashash.com,4 ¥»SÌ, 2014
८. अमृतलाल नागर ः बूँद और समुद्र, किताब महल प्रकाशन, इलाहाबाद, १९५६, पृ. १०६
९. राम विलास शर्मा ः नीर क्षीर (अमृत लाल नागर अंक) पृ. २७
३९-ए, शास्त्री नगर, हिलव्यू कॉलोनी, छबडा, जिला बारां, (राज.)
मो. ९७८७९४२६०८