चार कविताएं

डॉ. अशोक कुमार गुप्त ‘अशोक’




सभी फलों का राजा आम
सभी फलों का राजा आम
खट्टा मीठा ताजा आम
चाहे छील इसे तुम पाओ
या फिर चूस चूस रस खाओ
भाँति-भाँति के इसके नाम
सभी फलों का राजा आम
लंगडा फसली और दशहरी
मलिहाबादी तोता-परी
हापुस देशी महुआ जाम
सभी फलों का राजा आम
बनता चटनी जूस अचार
लू का दुश्मन पना तयार
आता बहुत भाँति यह काम
सभी फलों का राजा आम
आम वृक्ष की सेवा करना
हो ‘अशोक’ इस जग में रहना
कंद मूल फल खाए राम
सभी फलों का राजा आम।

मन्नु दद्दा बहुत सयाने
मन्नु दद्दा बहुत सयाने
काम सभी करते मनमाने
दुहकर गाय भगाते घर से
बीत गए यह करते अरसे
धर्म परायण रोटी देता
धर्म निष्ठ का तमगा लेता
कहीं कहीं पाती दुत्कारें
कोई छूकर चरण दुलारे
चुन्नु मुन्नू सुन लो भैया
छुट्टा कभी न छोडो गैया
दाना-पानी देते रहिए
गाय बाँधकर घर में रखिए।

बात बहुत बचकानी करती
बात बहुत बचकानी करती
मम्मी क्यों मनमानी करती
पापा सीधे सरल सहज हैं
दाता सुख के शुभ्र जलज हैं
कभी नहीं मदिरालय जाते
सदा सुपाच्य भोज ही खाते
नित नित होली और दिवाली
कहते सदा तिजोरी खाली
किस्मत में आराम नहीं है
सोलह घण्टे काम सही है
अपनी सबको व्यथा बताते
लोक धर्म हित कथा कराते
यह तो दुनिया कहती आई
धर्म प्रचारक है व्यवसायी
कुत्ता वफादार है प्राणी
कुत्ता वफादार है प्राणी
नहीं जगत में इसका सानी
स्वामिभक्त यह बडा उदार
मालिक को करता है प्यार
संयम अपना कभी न खोता
सभी प्राणियों से कम सोता
दुश्मन की रखता पहचान
घर में घुस न सके अनजान
घर की यह करता रखवाली
होली ईद और दीवाली
कभी न करता आनाकानी
कुत्ता वफादार है प्राणी ?
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