धरती की भूख

शकुन्तला व्यास





प्राचीन समय की बात है-रामपुर में रामसिंह नाम के राजा राज्य करते थे। वे न्यायी, सत्यवादी एवं प्रजा पालक थे। प्रजा भी उनसे खूब प्रेम करती थी। एक बार उस प्रदेश में भयंकर अकाल पडा। लगातार तीन वर्ष तक खेतों में कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। सारी जनता परेशान थी।
पानी भी समय पर बरसता था, लोग खेतों में बीज भी समय पर बोते थे, फिर भी फसल अच्छी नहीं उगती थी। लोग भूखों मर रहे थे। अंत में तंग आकर सब लोग राजा के पास पहुँचे और बोलेः-‘‘महाराज हम अकाल से तंग आ गए हैं। आफ राज्य के खेतों में कुछ भी उत्पन्न नहीं होता, जबकि समय पर वर्षा होती है और खेत जोते जाते हैं, अतः हम लोग आपका राज्य छोड कर अन्यत्र जा रहे हैं।’’
राजा ने कहाः-‘‘मैं यह समझ गया हूँ कि जो कुछ खेतों में होता है उसे धरती खा जाती है। मैं धरती को पकड कर उसे दण्ड दूँगा। तुम लोग बेफिक्र होकर अपने-अपने घर जाओ।’’
राजा घोडे पर सवार होकर धरती को पकडने चल दिया। एक स्थान पर उसने देखा कि एक स्त्री फूट-फूट कर रो रही है। वह वहाँ ठहर गया और उसने उससे पूछा-‘‘तुम कौन हो ? यहाँ बैठी-बैठी इस तरह क्यों रो रही हो ?’’ स्त्री ने कहाः-‘‘मैं धरती हूँ। तुम्हारी प्रजा ने मुझ पर अन्याय किया है, इसलिए मैं यहाँ बैठी रो रही हूँ।’
यह सुन कर राजा को बडा आश्चर्य हुाआ, वह बोलाः-‘‘तुम तीन साल से हमारी प्रजा का बीज चुरा चुरा कर खाती हो और ऊपर से कह रही हो कि प्रजा ने तुम पर अन्याय किया है। मैं तुम्हें दण्ड देने के लिए ही निकला था। अब मैं तुम्हारी और प्रजा की दोनों की बात सुन कर जो अपराधी सिद्ध होगा उसे दण्ड दूँगा। कल तुम मेरे दरबार में उपस्थित होना।’’
दूसरे दिन दरबार में धरती आई। राज्य के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी दरबार में उपस्थित हुए। प्रजा ने अपनी शिकायत राजा के सामने रखी कि धरती बीज खा जाती है।
इस शिकायत पर राजा के पूछने पर धरती ने कहाः-‘‘महाराज! अन्याय आपकी प्रजा ने मुझ पर किया है। प्रजा होली दीवाली पर देवताओं को भेंट चढाती है, आपको नाना प्रकार के उपहार देती है पर मैं उससे पूछती हूँ कि वह मुझे क्या देती है ?’’ प्रजा के प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने कहाः-‘‘हम भला धरती को क्या दे सकते हैं ?’’
राजा ने कहाः-‘‘यदि धरती भूखी है तो वह बताए कि उसे खाने के लिए क्या चाहिए ?’’
धरती ने कहाः-‘‘मैं सबकी माँ हूँ। माँ स्वयं रूखा सूखा खा कर भी अपने बच्चों को अच्छा भोजन खिलाती है। मैं भी रूखा-सूखा भोजन ही चाहती हूँ। तुम लोग जो कूडा-करकट, घास, गोबर इधर-उधर फेंक देते हो वह इस तरह न फेंक कर भूमि में गड्ढा खोद कर गाड दिया करो। जब वह मिट्टी हो जाए तब उसे फेला दिया करो। मेरी भूख उसी से शांत हो जाएगी।’’
प्रजा ने धरती की बात मान ली। लोगों ने कूडा-करकट इधर-उधर न फेंक कर उसे खाद के रूप में परिवर्तित कर दिया। खाद डालने से फसल अच्छी हुई और अकाल सदा के लिए समाप्त हो गया।
उत्तम खाद देने से धरती की भूख मिटती है और खूब अन्न पैदा होता है। ?
१५ पंचवटी, उदयपुर(राज.)-३१३००१ मो. ७५०६३७५३३६