बेटा

अतुल मोहन प्रसाद


दरवाजे पर खट्-खट् की आवा*ा सुन महेन्द्रजी ने दरवाजा खोला। सोझा बचपन के दोस्त आशुतोष को देख प्रसन्नचित्त महेन्द्र बोले- ‘‘कहो कैसे भूलकर आना हुआ। कितने दिन बाद आये हो आशुतोष?’’
‘‘सब कुछ खडे-खडे ही पूछ लोगे क्या?’’
‘‘नहीं-नहीं। अन्दर आ जाओ।’’- महेन्द्र ने आशुतोष की आगवानी की।
‘‘कहो। कैसे आना हुआ?’’
‘‘देखो। मैं भूलकर नहीं आया हूं। आज सोचा महेन्द्र के घर जाकर उसका हाल-चाल जानकर आऊंगा। यह सोचकर ही चला था। कोई दिख नहीं रहा। अकेले हो क्या?’’- आशुतोष ने जिज्ञासा जाहिर की।
‘‘अकेल कहां? पत्नी है न। आ रही है। संतानें सभी अपनी-अपनी जगह है और ठीक-ठाक है।’’
‘‘मतलब।’’
‘‘बेटी अपने घर यानी ससुराल में है। दोनों बेटे अपने नौकरी वाले स्थान पर बहू-बच्चों के साथ मस्ती के साथ रहते हैं। बाकी बचे हम दोनों।’’
‘‘बेटे आते नहीं क्या?’’
‘‘क्या जरूरत है। तीसरा बेटा है न?’’
‘‘तीसरा बेटा? कौन है? तुम्हारे तो दो ही बेटे थे न?’’
‘‘नौकरी ही तो मेरा तीसरा बेटा है। उसे बेटे के ही तरह पोसा है। अभी भी प्रत्येक महीने तीस हजार पहली तारीख को दे जाता है।’’
‘‘ओह।’’
‘‘जब तक हम लोग जियेंगे तीसरा बेटा साथ निभायेगा। नौकरी के साथ भी नौकरी के बाद भी।’’- चेहरे पर मुस्कान लाते महेन्द्र बोले।
असर
मालकिन की चिंता आज ज्यादा बढ गयी थी। दो दिन से रूबी अपने बच्चों को दूध नहीं पिला रही थी। दरवाजे पर उसके बच्चे भूख से केंकिया रहे थे। मालकिन छडी लेकर उसके सामने बैठ गयी- ‘‘चलो बच्चों को दूध पिलाओ।’’ - जमीन पर छडी बजाते मालकिन बोली। रूबी चुपचाप खडी रही। एक टक देखती रही।
‘‘तुम इस तरह नहीं मानोगी।’’- मालकिन बोली- ‘‘सामने से सो जाओ। दूध नहीं पिलाना था तो तूने बच्चें क्यों दीये?’’ डर के मारे रूबी सीधा सो गयी।
मालकिन के चेहरे पर संतोष की रेखा उग आयी। मालकिन सोचने लगी। अचानक परसों बहू के संग बातचीत स्मरण हो आई-
‘‘यह क्या कह रही हो बहू?’’- अपने बच्चे को बोतल का दूध पिलाते देख बोली- ‘‘अभी से बोतल का दूध? अपना दूध क्यों नहीं पिला रही?’’
‘‘अपना दूध पिला के हमें ‘फिगर’ खराब करना है?- बहू ने टका सा जवाब दिया। हमें लग रहा है, रूबी ने बहू का जवाब सुन लिया था। उसीके जवाब का असर था कि उसी दिन से रूबी ने अपने बच्चों के दूध पिलाना बन्द कर दीया था।’’?
डी. के धर्मशाला मार्ग, बंगाली टोला, बक्सर, (बिहार) - ८०२१०१
मो. ०८२३५०५९३५७