अबुल वारिस का बदला

सुरेन्द्र ‘काकाजी’


वह एक मोतियों का सौदागर था। उसे एक ऐसे नाविक की तलाश थी जो छह माह तक उसे अपनी नाव किराए पर दे दे और स्वयं भी नाव खेने को साथ रहे। बसरा के समुद्र तट पर उसने एक युवा नाविक को देखा। उससे उसने कहा- ‘‘दोस्त, मैं तुम्हारी नाव छह महीने के लिए मुंह मांगे किराए पर लेना चाहता हूं।’’
मल्लाह का नाम अबुल वारिस था। उसने कहा- ‘‘मैं हजार स्वर्ण दीनार लूंगा।’’
बूढे सौदागर ने उसी क्षण हजार स्वर्ण मुद्राएं गिन दी और कहा- ‘‘कल मैं फिर आऊंगा, तुम अपनी नाव के साथ यहीं मिलना।’’ ‘‘ठीक है।’’ खुश होकर मल्लाह ने कहा।
दूसरे दिन सौदागर ठीक समय पर आ गया। आपस में दुआ-सलाम हुई, फिर उसके निर्देश पर वारिस ने नाव खोलकर समुद्र की ओर बढा दीं। लगातार तीन महीने यात्रा करने के बाद वे एक द्वीप पर उतरे। बूढे सौदागर के साथ एक गुलाम और ढेरों खाली बोरे थे। उसने कुछ बोरे गुलाम से उठवाए और उन्हें लिए हुए अबुल वारिस के साथ, एक पहाडी पर जा पहुंचा। गुलाम को उसने निगरानी के लिए वापस भेज दिया।
सौदागर ने मल्लाह को बतलाया-मुझे यहां मोतियों की एक खान मिली है। मैं चाहता हूं कि तुम इस खान में उतर जाओ और टोकरी में भर-भरकर मोती ऊपर भेजो। उन्हें बोरों में भरकर हम घर ले जाएंगे और आधा-आधा बांट लेंगे।
अबुल वारिस ने पूछा- ‘‘इन गड्ढों में मोती आए कहां से?’’
बूढे ने बतलाया- ‘‘समुद्र से लगा इन गड्ढों तक एक जलमार्ग है। उसी मार्ग से सीपी के झुंड तैरकर गड्ढों में आ जाते हैं। तुम यह रहस्य किसी से प्रकट मत करना। यह भेद तुम्हारे और मेरे बीच ही रहे, इसीलिए मैंने अपने गुलाम को भी वापस भेज दिया।’’
सौदागर ने यह बात कुछ इतने अपनत्व से कही कि अबुल वारिस उससे प्रभावित हुए बिना न रहा सका। फिर निर्दिष्ट स्थान पर जाकर वह बडे कौतूहल के साथ गड्ढे में उतरा। उसमें असीम सीपियां भरी थीं। सौदागर टोकरी नीचे डालता जाता और अबुल वारिस उसे भर कर ऊपर देता रहता। एक गड्ढे को खाली कर, अब वह दूसरे गड्ढे में जा घुसा। मोती निकालते-निकालते रात हो गई तब उसने कहा- ‘‘अब मैं बहुत थक गया हूं, मुझे बाहर निकालो।’’
किंतु बूढा सौदागर बोला- ‘‘वहीं आराम करो मूर्ख लडके! मैं बेवकूफ नहीं हूं, जो अब तुम्हें बाहर निकालूं...हा...हा...हा...।’’
बूढे की बात सुनकर अबुल वारिस क्रोध से कांपने लगा, पर वह करता भी तो क्या? बूढे सौदागर ने मोतियों को बोरे में भरकर अपने गुलाम की सहायता से नाव पर लादा और अपनी राह ली। बेचारा अबुल वारिस जीवन की आशा में गड्ढे में इधर-उधर टटोलता हुआ भटकने लगा। उसे वहां बहुत से हड्डियों के ढेर मिले। उसने समझ लिया, यहां से वापस जाना संभव नहीं है।
फिर भी उसने हिम्मत न हारी। अचानक उसके हाथ एक सुराख तक पहुंच गए। उसने उसे और चौडा करने की कोशिश की और आगे बढता गया। थोडी देर में उसे पानी का आभास हुआ। समुद्र से सीपियों के आने का जलमार्ग समझ कर वह आगे बढने लगा। पानी अब उसके गले तक हो गया था। नाविक ने तैरना आरंभ कर दिया और थोडी ही देर में वह समुद्र में जा पहुंचा। उसे काफी राहत मिली, मगर यह देखकर उसे दुख हुआ कि उसकी नाव वहां नहीं थी। बूढा सौदागर उसे लेकर कभी का पलायन कर चुका था।
बहुत देर तक समुद्र में तैरते रहने के बाद, उसे एक जहाज अपनी तरफ आता दिखाई पडा। उसने मल्लाह को चिल्लाकर अपनी सहायता के लिए पुकारा। जहाज हिंदुस्तान जा रहा था। उसके नाविकों ने जब उसे असहाय देखा तो जहाज उस ओर मोड दिया। अबुल वारिस ने बतलाया उसका जहाज डूब गया है। वह किसी तरह बच निकला है और अब काफी थक चुका है।
नाविकों ने उसे अपने जहाज पर चढा लिया और कहा- ‘‘रास्ते में बसरा जाने वाले जहाज पर हम तुम्हें बैठा देंगे। तुम चिंता मत करो।’’
अबुल वारिस ने खुदा की इस मेहरबानी पर निजात की संास ली वरना उसने तो सोच लिया था कि अन्त समय निकट आ चुका है। और फिर-चालीस दिन तक वह जहाज निरंतर आगे बढता रहा पर उन लोगों को मार्ग में कहीं आबादी के चिन्ह दिखाई न दिए। अबुल वारिस समुद्री मार्गों के विषय में बहुत कुछ जानता था। उसके बाप-दादा भी अपने जीवनकाल में सफल नाविक रहे थे।
जब उसने देखा कि इतने दिनों के बाद भी जहाज किसी सिरे नहीं लगा है तो उसे आशंका हुई कि कहीं ये लोग रास्ता तो नहीं भूल गए हैं और जब उसने डैक पर आकर दूर-दूर के क्षेत्र का जायजा लिया तो उसकी आशंका सच निकली।
जहाज के कप्तान ने उसे बताया- ‘‘आज पांच दिन से हम लोग बिना ज्ञान के जहाज आगे बढाते जा रहे हैं। अब ईश्वर का ही भरोसा है।’’
वारिस भी एकाएक ही उन्हें कुछ न बता सका। आखिर वह बताता भी क्या? चारों ओर पानी ही पानी था। मार्ग की शिनाख्त करने का कोई भी जरिया वहां दिखाई न दे रहा था। वह किसी गहरी सोच में डूब गया और मन ही मन अल्लाह-ताआला से दुआ करने लगा कि ऐ अल्लाह, मदद कर। आखिर पांच दिनों तक और उन लोगों को यूंही भटकना पडा, तब कहीं जाकर उन्हें समुद्र में एक ऊंची मीनार दिखाई पडी। जहाज अपने आप उसी ओर बढने लगा।
अबुल वारिस ने घबराकर कहा- ‘‘शायद हम लोग शेर के मुंह की ओर बढ रहे हैं।’’
‘‘शेर का मुंह...?’’ कप्तान ने घबराकर पूछा- ‘‘समुद्र में शेर का मह? यह तुम क्या कह रहे हो?’’
अबुल वारिस ने बताया- ‘‘हां! मेरे पिता कहा करते थे, समुद्र में एक स्थान ऐसा है, जहां फंस जाने पर जहाज किसी तरह नहीं निकल पाता, बल्कि उसी ओर बढता जाता है और टूटकर चूर-चूर हो जाता है, इसे ही शेर का मुंह कहते हैं।’’
उसी समय उन्हें कुछ टूटे तख्ते तैरते दिखाई पडने लगे। लोगों ने समझ लिया कि हम अब मौत के फंदे में बुरी तरह फंस चुके हैं। सबको अत्यंत घबराया हुआ पाकर अबुल वारिस बोला- ‘‘मैं रस्से लेकर तैरता हुआ उस मीनार की ओर जा रहा हूं, वहां पहुंचकर मैं जहाज को मीनार से बांध दूंगा। शायद इससे जहाज का बचाव हो सके। तुम लोग धैर्य से काम लेना। अल्लाह पर भरोसा रखो, वही मारनेवाला है, वही बचानेवाला भी। होगा तो वही जो अल्लाह को मंजूर होगा, लेकिन हमें कोशिश करनी चाहिए।’’
उसने ऐसा ही किया। मीनार एक पहाडी पर था। वहां पहुंचकर अबुल वारिस ने देखा मोटी-जंजीर से बंधा एक बहुत बडा नगाडा मीनार के मुख्य द्वार पर लटक रहा था। सामने एक शिलालेख था, जिस पर लिखा था- ‘‘यदि कोई तीन बार इस नगाडे पर चोट करे तो जहाज अपने आप भंवर से दूर निकल सकता है।’’
अबुल वारिस ने वैसा ही किया और सचमुच जहाज खतरे से बाहर हो गया। हालांकि इस प्रकार अबुल वारिस वहीं अटका रह गया और जहाज दूसरी ओर चला गया, किन्तु इस पर भी अबुल वारिस ने चैन की सांस ली कि चलो, उसकी कोशिश से उन लोगों का जीवन तो बच गया जिन्होंने उसे जीवन दान दिया था, वरना अब तक तो वह कब का मर-खप गया होता। उधर जहाजवालों ने सकुशल बसरा के बंदरगाह पर पहुंचकर अबुल वारिस के घरवालों को उसका समाचार दिया तथा बहुत-सा धन देकर उन्हें तसल्ली दी कि उस जैसे नेक बन्दे की रक्षा ईश्वर करेंगे।
पहाडी पर अबुल वारिस रात-भर फाटक की मेहराब के नीचे सोता रहा। सुबह जब उसकी आंख खुली तो उसने अपने आस-पास देखा। वहां दूर तक कोई प्राणी दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ देर तक वह न जाने क्या सोचता रहा, फिर एक ओर को बढने लगा। उसने सोच लिया था कि अब अल्लाह ही उसका मालिक है, देखें आगे क्या होता है।
आगे एक बहुत बडा मैदान था। वहां उसे एक गडरिया मिला। उसने अबुल वारिस का सब हाल सुनकर उससे हमदर्दी जाहिर की, फिर उसे अपना दोस्त बना लिया और अपने घर ले गया। उसका घर एक महल था, वहां उसने कई व्यक्तियों को एक हाल में देखा, जिन्होंने अबुल वारिस को बतलाया कि यह गडरिया नहीं एक राक्षस है जो लोगों को बहकाकर यहां लाता है और उन्हें मारकर खा जाता है।
उसी समय वह गडरिया वहां आया ओर लोहे की दो मोटी सलाखों पर एक मोटे आदमी को भूनकर खाने लगा। अवसर देखकर अबुल वारिस ने झट दो गर्म सलाखें उठाईं और उस राक्षस की आंखों में डालकर उसकी दोनों आंखें फोड दीं। राक्षस छटपटाने लगा।
उसने अबुल को पकडकर मार डालने के लिए काफी हाथ-पैर मारे, मगर अबुल उसके हाथ कब आने वाला था? वह दुबककर एक ओर बैठ गया, उधर राक्षस भी महल के द्वार पर जाकर बैठ गया कि यदि कोई भी शख्स उसकी इजाजत के बिना निकलकर भागने की कोशिश करे, तो वह उसे दबोच लें। काफी समय गुजर गया, मगर न कोई बाहर गया, न भीतर आया।
इसी प्रकार दूसरे दिन भेंडों के बाहर निकलने का समय हो गया। जब भेडों के बाहर निकलने का समय आया तो अबुल वारिस ने सोचा- मैं भी किसी तरह महल से बाहर निकल जाऊं, पर उसने देखा, राक्षस महल के फाटक पर खडा भेडों को टटोल रहा था। अबुल वारिस ने झट एक भेड को मारकर उसकी खाल ओढ ली और भेडों के बीच होकर वह फाटक से बाहर निकलने लगा।
राक्षस को जब भेड से भिन्न किसी दूसरी आकृति का अहसास हुआ तो वह उस पर टूट पडा पर अबुल वारिस ने फुर्ती से उसके हाथ में भेड की खाल देकर एक लंबी छलांग लगाई और पलक झपकते ही फाटक से बाहर हो गया।
रास्ते में एक दानव मिला। वह भी उसे बहका कर अपने घर ले आया और उसे अपना गुलाम बना लिया। अबुल वारिस ने किसी तरह दानव की स्त्री की सहायता से छुटकारा पाने में सफलता प्राप्त की और ‘बसरा’ की ओर वापस आते हुए एक जहाज की सहायता से वह पुनः अपने घर वापस आ गया।
अब वह काफी बूढा हो चुका था। एक दिन समुद्र के किनारे वह उसी स्थान पर बैठा था। तभी एक मोतियों का सौदागर आया और मुंह मांगा दाम देकर उसने उसकी नाव किराए पर ले ली। अबुल वारिस ने उसे पहली नजर में ही पहचान लिया। यह वही सौदागर था जिसने उसे मरने के लिए खान में छोड दिया था। अबुल वारिस के बाल सफेद हो जाने के कारण सौदागर उसे पहचान न सका था। अबकी बार वह किसी कीमत पर गड्ढे में उतरने को तैयार न हुआ। सौदागर को ही उसने बातों में फंसाकर गड्ढे में उतारा।
शाम को जब सौदागर ने अपने को बाहर निकालने की अर्ज की तो अबुल वारिस ने कहा- ‘‘मियां। अबकी बार तुम्हारी आराम करने की बारी है, अब तुम इसी गड्ढे में आजीवन आराम करते रहो...।’’
अपने जैसे अनेक सताए हुए लोगों का बदला अबुल वारिस ने सौदागर से ले लिया था। ?
कामिनी ऑटो पार्टस्, सिलकुंवा मार्ग, कुक्षी, जिला-धार, (म.प्र.)