प्यासा - मूल कहानी ङ्क्त तहान

मूल लेखिका-उज्जवला केलकर/हिन्दी अनुवाद-डॉ. जुल्फिकारबानो देसाई



मूल लेखिका-उज्जवला केलकर अनुवाद-जुल्फिकारबानो देसाई

आज का दिन जस्मीन के जीवन में अनोखा था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कि वह एम.बी.बी.एस. होकर आगे पढने के लिए जर्मनी जा रही है। ‘करुणा निकेतन क्रेश’ में पली जस्मीन का मन भारी हो गया। उसके पैर मानो उस क्रेश को छोडने से इन्कार कर रहे थे। आँसू पोछकर वह क्रेश की सीढियाँ उतर आयी, तो पीछे पीछे क्रेश के सभी लोग भी आ गये। गेट के बाहर सुनीता कब से टैक्सी में बैठी इन्तजार कर रही थी।
पच्चीस साल पहले इस क्रेश की शरण में आई एक छुटकी आज डॉक्टर बन गई थी। ‘करुणा निकेतन’ का हर व्यक्ति आज उससे बात करना चाहता था। उसे भविष्य के लिए बधाई देना चाहता था। शुभकामनाएं देकर उसे विदा करना चाहता था। जस्मीन का मन उनकी हमदर्दी एवं प्यार से भर आया। अब उसे जल्द ही यहाँ से भागना चाहिये, पर अभागे पैर हैं, कि आगे चलने का नाम ही नहीं लेते। इस उधडबुन में कुछ देर तक क्रेश की बिल्डिंग को वह देखती रही।
‘सिस्टर नॅन्सी आज जिंदा होती, तो कितनी खुश होती’ मारिआ के मन में अनायास ही खयाल आया। जसमीन को पढाकर उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी भेजने का सपना सिस्टर नॅन्सी ने देखा था। उनके साथ फादर फिलीप ने भी।
इस क्रेश ने लगभग साढे तीन वर्ष की जिस कन्या को अॅडॉप्ट किया था, वह थी जस्मीन। आज कल क्रेश का कितना विस्तार हुआ था। अलग अलग आयु की कितनी बच्चियाँ यहाँ पल रही हैं, पढ रही हैं। उनमें से कुछ अनाथ, कुछ त्यागी हुई, कुछ घर से भागी हुई, कुछ चोरी के आरोप में पकडी हुई, कुछ रिमांड होम से सीधे यहाँ भेजी हुई। कुछ गरीब माँ-बाप परवरीश में स्वयं को असमर्थ पाकर अपनी बच्ची को यहाँ छोड गये थे। क्रेश ने इन सबको सहारा दिया। प्रेम से पाला, पढाया, और उनकी क्षमता के अनुसार पैरों पर खडा भी किया है।
शहर की सबसे पिछडी और गरीब बस्ती में यह ‘ग्रीन टेंपल चर्च’ है, जिसे जर्मनी देश से मदद प्राप्त होती है। फादर फिलीप जर्मन देश से प्रमुख बिशप के रूप में यहाँ आये। अपाहिज तथा गरीबों की सेवा, यह प्रभु ईसा मसीह का ही कार्य मैं कर रहा हूँ, इस विश्वास से उन्होंने यहां के लोगों की मदद की। गरीबी एवं अंधश्रृद्धा के कारण समाज की उजडती कलियों को उन्होंने जीवन दिया। तत्पश्चात् जर्मनी से सिस्टर नॅन्सी, सिस्टर मारिया, सिस्टर ज्युथिका आ गयी। यहाँ के ईसाई लोगों नें भी उनकी मदद की।
फादर फिलिप ने जब क्रेश शुरू करना तय किया, तब एक लेप्रसी पीडित भिखारी दाम्पत्य की तीन वर्ष की कन्या को उन्होंने गोद लिया। ‘हम इसे प्यार से पालेंगे, पढाएंगे, उच्च शिक्षा देंगे। बस, सिर्फ एक ही शर्त है। आपको उससे अपनी पहचान छिपानी होगी। उसे मिलने का, उसे अपनी पहचान देने का प्रयास आप लोग ना करें।’ फादर फिलिप की यह शर्त उस भिखारी दांपत्य ने खुशी से मान ली। अपनी बेटी के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना में वे डूब गये।
फादर ने डॉ. थॉमस से कहकर बच्ची का कम्प्लीट चेकअप करवाया। ‘थैंक गॉड! बच्ची इन्फेक्ट नहीं हुई है। प्रभु की लीला।’ सीने पर क्रॉस का चिन्ह बनाते हुए उन्होंने कहा। बाप्तिस्मा के समय सिस्टर नॅन्सी ने उसका नाम सुझाया ‘जस्मीन’ - प्रसन्न, तरोताज, महकता फूल, जिससे सारा वातावरण खुशी के मारे महक जाय।
रास्ते के फूटपाथवर पलने वाली यह बच्ची, क्रेश की पहली बेटी, इस इमारत में शुरू शुरू में बहुत डर-सी गयी। किसी के छूने मात्र से सकुचा जाती, भयभीत मेंमने जैसी।
जस्मीन ने अपनी जिन्दगी के ऐसे कितने ही टुकडे जमा किए थे। अकेलेपन में इन्हें जोडकर पूरी जिंदगी का चित्र वह बनाना चाहती। परंतु किसी से कुछ पूछने की हिम्मत वह जुटा न सकी। वह सोचती, ‘कैसे होंगे मेरे माता-पिता? कहां होंगे? फादर ने मुझे अॅडॉप्ट करना कब चाहा होगा? माँ- बाप उन्हें अपनी बच्ची देने से इन्कार करते तो? आज मैं कहाँ होती? किस हाल में होती? हो सकता है, सामने वाली महारोगियों की बस्ती में फटीचर सी रोगिणी बनी जीवन घसीटती रहती। जीवन का यही अर्थ रहता मेरा? आने-जाने हर एक के आगे भीख के लिए हाथ फैलाती, उन की दया को ललकारती रहती। कितने प्रश्न उठते उसके मन में! हर बार अलग उत्तर मिलता। अपने अलग अलग रुप बना कर वह देखती। हर बार एक दया, एक घृणा, एक भय उसके मन में समा जाता।
स्कूल जाते समय ग्रीन टेंपल क्रेश के आसपास मंडराते महारोगियों को वह ध्यान से देखती। चपटी नाक, घीसी हुई उंगलियाँ, सूजन भरे हाथ-पैर, मटमैले, फटे, पुराने कपडे, कभी गाडी पर बैठे, दूसरे से उसे खिंचवाते महारोगी। सबके चेहरे वह पढना चाहती। उनसे अपने चेहरे का साम्य ढूँढती।
किसीकी आँखें, किसी की ठुड्डी, किसी का गोरा रंग, उसे अपना लगता। मेरे माँ-बाप इनमें ही होंगे, सोचकर वह सिंहर जाती। शरीर काँपने लगता।
स्कूल से लौटते समय, उन भिखारियों को वह ध्यान से देखती। उसे रुकते देखकर सब भिखारी हाथ फैलाये उस की तरफ बढते,
‘बहनजी, गरीब को दो पैसे दे दो, भगवान तुम्हें अमीर बना देगा। सुखी बनाएगा।’
उसे हँसी आती। उनकी माँग पर भगवान अगर अमीर बनाता, तो सीधे इन लगों को ही पैसे देता न?
किन्तु क्षणमात्र में वह उस विचार से हट जाती। प्रभु ईसा के संस्कार उस पर थे। प्रभु ने जीवन भर गरीबों की, रोगीयों की सेवा की।’ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी जिओ’ उनका संदेश उसे याद आता।
फादर का सर्मन उसे याद आता। उसे लगता, इन लोगों को पैसे देने चाहिये। उन्हें चाय तो मिलेगी। ब्रेड तो खा पाएंगे वे। पता नहीं इनमें से मेरे माँ-बाप कौन हैं? हो सकता है, इस बहाने मैं उन्हें सुख दे पाऊँ। पर हां! उस के पास पैसे कहाँ थे। क्रेश उसके लिए खाना-पीना, कपडा, पढाई सब का प्रबंध करता, परंतु पैसे नहीं देता। क्रिसमस, तथा, ईस्टर के त्यौहार पर इन भिखारियों को पेटभर मिठाई बाँटी जाती। इस समय जस्मीन मिठाई का थाल हाथ में लिए सबके आगे होती। रोज खाना खाने से पूर्व प्रभु से प्रार्थना कराती, ‘प्रभु तूने जिस तरह मुझे स्वादिष्ट खाना दिया है, वैसा ही मेरे माँ-बाप को देना। अन्य लोगों को भी देना... आमेन।’
ऐसे समय अपने माँ-बाप को याद वह क्यों करती ? कहते हैं, एक दूजे के साथ रहने से प्रेम बढता है। उसे तो अपने माँ-बाप का साहचर्य मिला नहीं, फिर क्यों यह पागल मन उन्हीं के बारे में सोचता है ? क्या ईश्वर यही संकेत दे रहा है, कि एक दिन वह अपने माँ-बाप से उसे मिला देगा ? विचार मात्र से वह स्तंभित हो जाती।
जब से जस्मीन ने टुकडों..टुकडों... में ही सही, अपना जन्म, अपनी क्रेश में हो रही परवरीश के बारे में सुना, तब से जस्मीन सोचती रही, ‘मैं यहां की नहीं हूँ। मैं मूलतः उन भिखारियों में से हूँ। मैं यहाँ अजनबी हूँ, भले सब लोग मुझे प्यार करते हैं।’
विदाई समारोह चार बजे आयोजित किया गया। रिक्रिएशन हॉल खचाखच भरा हुआ था। सिस्टर मारिआ, उसकी पढाई की लगन, प्यारा बर्ताव और न जाने किन-किन गुणों का बखान कर रही थी। अन्य लडकियों
को जस्मीन का आदर्श रखने की बात उन्होंने अभिमानपूर्वक कही।
जस्मीन सोच रही थी, इन लोगों ने मुझ जैसे गरीब के लिए कितना कुछ किया है,क्या केवल अपने झुंड में खींचने के लिए? लोग कहते हैं अपने धर्म प्रचार के लिए ये लोग ऐसी मदद करते हैं। कहते रहे। उन्हें क्या पता, मुझ जैसी लडकियों को सुरक्षा, सहारा देने के लिए उन्हें धर्म प्रसार करना जरूरी नहीं है। उनका करुणा का स्रोत, ईसा मसीह पर श्रद्धा है। केवल दुखियों की सेवा के लिए ये लोग अपनी मातृभूमि से इतनी दूर आये हैं। सब लोगों को थोडे ही ये धर्म के झुंड में खींचते हैं ? फादर फिलिप तथा सिस्टर नन्सी के लिए अपार कृतज्ञता का भाव मन में लिए जस्मीन खडी हुई। उसने कहा, ‘इस क्रेश ने मुझे बनाया है। मेरा कर्तव्य बनता है, की उच्च शिक्षा के बाद मैं यहीं लौटूं।’ आगे लेप्रसी पर अधिक संशोधन का संकल्प उसने दोहराया और वह चुप हो गई। उसकी आँखों के आँसू में एक सपना तैरने लगा--जैसे जस्मीन वापस आयी है। एक साफ-सुथरा अस्पताल, एक साफ बस्ती का निर्माण उसने किया है। कोई लेपर नहीं, सब काम कर रहे हैं। इस निकेतन में खाना खा रहे हैं। कोई भूखा नहीं हैं। ‘प्रभु ईसा इस सपने को सच करने की शक्ति मुझे दे।’
गालों पर बहते आँसुओं को पोंछते हुए वह सोच रही थी, यह सपना साध्य होने तक चार-पाँच साल तो बीत ही जाएंगे। तब तक क्या मेरे माँ-बाप जीवित रहेंगे।
उस हॉल में सब जस्मीन के बारे में ही बात कर रहे थे। उसकी सहेलियाँ, क्रेश के कर्मचारी, टीचर... सभी... जस्मीन ने सामने देखा, दीवार पर प्रभु ईसा का बडा पोस्टर लगा था। नीचे लिखा था, ‘उसके दिए हुए पानी से जो अपनी प्यास बुझाता है, उसे फिर कभी प्यास नहीं लगती।’ जस्मीन को फादर का सर्मन याद आया। याद आयी, शरमोणी नाम की पापी स्त्री की कथा, जिसे प्रभु ने पास बुलाया। उसे जिन्दा मानी याने की अध्यात्मिक पानी पिलाया। उस पापिणी की प्यास हमेशा के लिए बुझ गई। मेरे माँ-बाप भी प्यासे होंगे। क्या वे भी पापी हैं ? तो फिर प्रभु उन्हें जिन्दा पानी क्यों नहीं पिलाता ?
फादर नें मुझे इस पानी तक तो लाया है। फिर मैं क्यों ये पानी नहीं पी सकी ? मेरे माँ-बाप को देखने की प्यास मुझे लगी है। गला सूख रहा है, जान घबरा रहीं है। माँ-बाप को देखने की मेरी प्यास कब बुझेगी ?
जस्मीन गेट से बाहर आयी। सुनीता आने के लिए कह रही थी। वह मुंबई तक उसे छोडने वाली थी। जैसे ही जस्मीन टॅक्सी में बैठने जाने लगी, फूटपाथ पर बैठे भिखारियों ने रोग से छीजे, बचे कुछे हाथों से प्रणाम कर अपनी जर्मन की टूटी-फूटी, टेढी-मेढी थालियाँ उस की ओर बढाई। वह उनके पास गई। पर्स खोलकर नोट निकाले। हर थाली में कुछ न कुछ परोसकर टॅक्सी में जा बैठी। मन ही मन बोल उठी, ‘ऐ मेरे अज्ञात माता-पिता, मेरी कार्यपूर्ति के लिए प्रार्थना करना। मुझे आशीर्वाद देना।’ टैक्सी चल पडी। उस ने खिडकी से हाथ हिलाया। गेट पर खडे क्रेशवासियों की तरफ, फिर विरूद्ध दिशा में खडे भिखारियों की तरफ। उन में से चार बुझती आँखें अपनी बेबसी पर रोती, उस टॅक्सी की ओर ताकती रही।
मूल लेखिका-उज्जवला केलकर
पता-लेखिका का संफ-१७६/२ गायत्री प्लॉट नं. १२, वसंत दादा साखर कामगाार भवन के पास, सांगली ४१६४१६ महाराष्ट्र
दू. ०२३३२३१००२० मो. ०९४०३३१०१७०
हिन्दी अनुवाद-डॉ. जुल्फिकारबानो देसाई
ग*ाल, कृपामयी हॉस्पिटल के पीछे मिरज-सांगलीरोड मिरज
जि-सांगली, (महा.)-४१६४१०
मो. ९०९६४४०८७२