शैलीवैज्ञानिक, आलोचना ने समीक्षक के मूल धर्म को फिर से उठाया है

(प्रो. कृष्णकुमार शर्मा से दीपमाला गिडवानी की बातचीत)सीताराम पाण्डेय


5 फरवरी, १९३४ को जयपुर में जन्मे डॉ. कृष्णकुमार शर्मा देश के प्रख्यात शैलीवैज्ञानिक आलोचक एवं प्रोफेसर हैं। भौतिकशास्त्र में एम.एससी. करने के बाद वे हिन्दी क्षेत्र म आए और १९६४ में ‘राजस्थान की लोकगाथाएँ’ विषय पर पीएच.डी उपाधि प्राप्त की। प्राध्यापक रहते हुए एम.ए. संस्कृत की उपाधि प्राप्त की। ध्वनि सिद्धान्त का काव्यशास्त्रीय, सौन्दार्यशास्त्रीय एवं समाजमनोवैज्ञानिक अध्ययन विषय पर डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की। उदयपुर विश्वविद्यालय एवं जम्मू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में रीडर रहे। बाद में केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा में प्रोफेसर नियुक्त हुए।।
संस्कृत एवं हिन्दी के काव्यशास्त्र के साथ शैलीवैज्ञानिक समीक्षा के क्षेत्र में उनका शोधकार्य प्रायोगिक रूप से नवोन्मेषी रहा। ‘शैलीविज्ञान की रूपरेखा’ (पुरस्कृत), ‘गद्य-संरचना ः शैलीवैज्ञानिक विवेचन’ (पुरस्कृत), ‘शैलीवैज्ञानिक आलोचना के प्रतिदर्श’, ‘भारतीय काव्यशास्त्र ः शैलीवैज्ञानकि संदृष्टि’, बगडावतों की लोकगाथा, ‘समकालीन कविता ः समय की साक्षी’, ‘समकालीन कविता ः शैलीवैज्ञानिक संदर्भ’ आदि उनकी चर्चित पुस्तकें रही हैं। मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दी स्वरूप और प्रयोग’ (तीन भाग) के वे सहलेखक रहे हैं, जो मध्यप्रदेश के स्नातक पाठ्यक्रमों में हिन्दी भाषा की प्रचलित पुस्तकें रही हैं। वे व्यास फाउण्डेशन की पुरस्कार समिति में निर्णायक सदस्य भी रहे। शैलीवैज्ञानिक आलोचना में डॉ. शर्मा ने सैद्धान्तिक प्रतिमानों का भारतीय काव्यशास्त्र के संदर्भ में ववेचन किया है। संस्कृत काव्यशास्त्र, हिन्दी काव्यशास्त्र और भाषाविज्ञान के समन्वित परिप्रेक्ष्य में उन्होंने व्यावहारिक अनुप्रयोगों से शैली वैज्ञानिक आलोचना को वस्तुपरक एवं सहृदय संवेदी बनाने की दिशा प्रशस्त की है।
डॉ. शर्मा से यह मेरी पहली मुलाकात नहीं है, मैं उनसे अनेक बार मिल चुकी हूँ। उन्हीं के सान्निध्य में मैंने एम. फिल. की उपाधि प्राप्त की। २०१२ से निरन्तर मैं उनके ज्ञान से लाभान्वित होती रही हूँ। उनके विचारों और उनकी आलाोचना शैली ने मुझे मेरे प्रश्ा*ों, समस्याओं आदि का समाधान करते हुए उन्होंने मुझसे जो बातचीत की, उसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं ः-
दीपमाला ः आप मूलतः विज्ञान के विद्यार्थी रहे, फिर आपका हिन्दी साहित्य की ओर रुझाान कैसे हुआ?
प्रो. शर्मा ः दीपमाला जी, आप विधि पर विश्वास करती हैं?
दीपमाला ः कुछ हद तक।
प्रो. शर्मा ः कुछ हद तक नहीं, मेरा व्यक्तिगत अनुभव है नियति की जीवन में अहम् भूमिका है। मेरे ताऊजी सहायक अभियन्ता थे और मुझे भी इन्जीनियर बनाना चाहते थे। अतएव मुझे विज्ञान विषय दिलाया गया। यह बात सन् १९५० की है तब बालकों के विषय निर्धारण में अभिभावकों की दृष्टि ही काम करती थी, तो मैं महाराजा कॉलेज, जयपुर में विज्ञान विषय लेकर पढने लगा। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व से ही मेरे पिता प्रो. प्रभुनारायण शर्मा सहृदय और मेरे आदरणीय काका श्री पण्डित दीनानाथ जी निडर छोटी चौपड, जयपुर के निकट स्थित मन्दिर में एक रात्रि-पाठशाला चलाते थे। जिसमें हिन्दी विषय का निःशुल्क शिक्षण होता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद की परीक्षाओं- प्रथमा, मध्यमा एवं उत्तमा-के लिए विद्यार्थियों को तैयार किया जाता था। मैं और मेरे भाई-बहिन उस रात्रि पाठशाला में पहले तो वैसे ही जाते थे फिर पढने भी लगे। मैंने प्रथमा, मध्यमा और उत्तमा (उपाधि का नाम-साहित्यरत्न) की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की, साहित्याचार्य भी किया। यह सब सन् १९५२ तक हो चुका था। दिन में विज्ञान की पढाई चलती, आप समझ सकती हैं कितनी रुचि लेता होऊँगा और रात्रि में साहित्य का अध्ययन और फिर अध्यापन भी। हिन्दी भाषा और साहित्य के संस्कार तो थे ही, संयोग भी मिल गया। परिणामतः एम.एस.सी. अन्तिम वर्ष की परीक्षा देने के बाद तत्काल भौतिक विज्ञान में स्कूल व्याख्याता की नौकरी मिलने के साथ में एम.ए. किया। उसी वर्ष कॉलेज शिक्षा विभाग में मेरिट के आधार पर मुझे राजकीय महाविद्यालय, सिरोही में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर नियुक्त कर दिया। बस, विज्ञान छूट गया और मैं हिन्दी में आ गया। क्या आप इसे नियति का खेल नहीं समझेंगी? राजकीय महाविद्यालयों में कार्य करते-करते १ सितम्बर १९६४ में मैं उदयपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आ गया। बाद की यात्रा जम्मू विश्वविद्यालय, हैदराबाद, मैसूर, गुवाहाटी, आगरा और दिल्ली तक फैली है, रीडर बना, हिन्दी विभाग का अध्यक्ष और फिर प्रोफेसर। इसी दौर में दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग के प्रोफेसर रवीन्द्रनाथ जी श्रीवास्तव, भारतीय व्याकरण के आचार्य पण्डित विद्यानिवास मिश्र का अपार स्नेह मिला और उन्हीं की आज्ञा से उच्च भाषाविज्ञान का प्रशिक्षण भी लिया। अब आप समझ गई होंगी कि विज्ञान के संस्कार ही रहे, कार्यक्षेत्र हिन्दी साहित्य बन गया।
दीपमाला ः आपने ध्वनि सिद्धान्त पर कार्य करके डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की। आपकी काव्यशास्त्र में ही इतनी रूचि क्यों रही?
प्रो. शर्मा ः उदयपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में पहले दिन से ही एम.ए. के विद्यार्थियों को भाषाविज्ञान पढाया। इसी अवधि में मुझे लगा कि बिना संस्कृत भाषा के, सम्यक ज्ञान के भाषा विज्ञान पढाने के साथ न्याय नहीं किया जा सकता तो मैंने उदयपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में नियमित प्रवेश लेकर बकायदा संस्कृत में एम.ए. किया। आचार्य रामचन्द्र द्विवेदी, आचार्य विष्णुराम जी नागर और पहले मेरे सहपाठी रहे फिर गुरु बने प्रो. मूलचन्द्र जी पाठक और प्रो. गयाचरण त्रिपाठी के अभूतपूर्व सहयोग के बल पर मैंने विधिवत् संस्कृत का अध्ययन किया क्योंकि विशेष विषय काव्यशास्त्र था तो ध्वनि सिद्धान्त भी पढा, तभी मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि भारतीय काव्यशास्त्र तो व्याकरण पर आधारित है, भाषा पर प्रवृत्त होता है, पूर्णतः वस्तुनिष्ठ है। इसी प्रसंग में आनन्दवर्धन प्रतिपादित ध्वनि सिद्धान्त चित्त पर ऐसा चढा कि मुझे उसने पूरी तरह रमा लिया। ध्वनि सिद्धान्त आधुनिक भाषाविज्ञान के साथ तो संगति रखता ही है, काव्यभाषा का एक सम्पूर्ण सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त पर लिखा गया मेरा शोध प्रबन्ध मेरे जीवन की उपलब्धि है।
दीपमाला ः काव्यशास्त्र के पश्चात् आपने शैली विज्ञान पर भी ५ पुस्तकें लिखीं। शैलीविज्ञान से आपका जुडाव कैसे हुआ?
प्रो. शर्मा ः भाषाविज्ञान की अनेक अनुप्रयोगात्मक शाखाओं में से एक है- शैलीविज्ञान। भारत में इसका सूत्र विन्यास १९वीं शताब्दी के सातवें दशक में प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, प्रो. रमानाथ सहाय और प्रो. विद्यानिवास मिश्र ने किया। ७५-७६ में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा में शैलीविज्ञान पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ था, मैंने उसमें ध्वनि सिद्धान्त और शैली विज्ञान पर आलेख प्रस्तुत किया था। डॉ. नगेन्द्र जी ने मेरी पीठ थपथपाई थी, प्रो. बालगोविन्द मिश्र ने उस क्षेत्र में आगे कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया था परिणामतः ‘शैलीविज्ञान की रूपरेखा’, ‘गद्य संरचनाः शैलीवैज्ञानिक विवेचन’, ‘भारतीय काव्यशास्त्रः शैलीवैज्ञानिक संदृष्टि’ आदि पुस्तकें लिखीं। प्रथम दो को राजस्थान साहित्य अकादमी ने आलोचना पुरस्कार से सम्मानित किया, तब से यह क्रम ऐसा चला कि अब तक चल रहा है।
दीपमाला ः शैलीविज्ञान के आधार पर आपने गद्य की विधाओं का और कविताओं का अध्ययन विश्लेषण किया। दोनों के अध्ययन में क्या अन्तर है?
प्रो. शर्मा ः पहले तो आपको मैं यह बतला दूँ कि शैलीवैज्ञानिक दृष्टि का तात्पर्य भाषिक एककों का सांख्यिकीय परिगणन मात्र नहीं है बल्कि भाषागत विशेष प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर संवेदनात्मक मूल्यांकन इसका लक्ष्य है। काव्य के एतद्विषयक विवेचन में चयन, विचलन, अग्रप्रस्तुति जैसे उपादानों को विशेषतः आधार बनाया जाता है। गद्य संरचना में उपवाक्य और उससे बडी इकाइयों जैसे- अनुच्छेद आदि का प्रयोग होता है तो गद्य संरचना के विश्लेषण में उपवाक्यों के प्रशाखन, संरचनागत विश्लेषण आदि पर विशेष ध्यान दिया जाता है। डॉ. लक्ष्मीलाल जी वैरागी के शोध निर्देशन के प्रसंग में मैंने यह अनुभव किया कि रचनाकार कथ्य के विशेष संदर्भ में कतिपय विशेष संरचनाओं को प्रयुक्त करने का अभ्यस्त हो जाता है। जहाँ-जहाँ रूप वर्णन के प्रसंग आते हैं, वहाँ संरचनाएँ अलग होती हैं, वस्तुवर्णन में संरचनाएँ विवरणात्मक होती हैं, यहां तक कि उन संरचनाओं का, संदर्भ के आवर्तन में रचनाकार संरचनाओं का भी आवर्तन करता है। यह बात मैंने गद्य संरचना वाली पुस्तक में काफी उदाहरण देकर स्थापित की है और संदर्भबद्ध संरचनाओं को मैंने उस रचनाकार के शैली चिह्नक के रूप में पहचाना है। मेरे द्वारा प्रयुक्त शैलीचिह्नक शब्द का आधार *स्ह्ल4द्यद्ग रूड्डह्म्द्मद्गह्म्* शब्द है। तो यहाँ आफ प्रश्ा* का उत्तर मिलता है कि काव्य के विश्लेषण में जहाँ चयन, विचलन, अग्रप्रस्तुति को केन्द्र में रखा जाता है वहाँ गद्य संरचना में शैली चिह्नक को आधार बनाकर विश्लेषण किया जाता है।
दीपमाला ः आपका मत है कि शैली वैज्ञानिक आलोचना ने समीक्षक के मूल धर्म को फिर से उठाया है। इससे आपका क्या आशय है?
प्रो. शर्मा ः आलोचना आलोच्य वस्तु के प्रति सुधि पाठक की प्रतिक्रिया है। अपने प्रारम्भिक रूप में यह एकान्तिक रूप से वैयक्तिक होती थी। कालान्तर में पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के सम्फ में आने के बाद मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय, स्वच्छन्दतावादी दृष्टियों से साहित्य की विभिन्न विधाओं का विश्लेषण किया जाने लगा। इनमें मनोवैज्ञानिक आदि सिद्धान्त और दृष्टियाँ प्रमुख हो गईं। साहित्य, जिन पर इन्हें प्रवृत्त होना था-गौण। जबकि सही बात तो यह है कि कोई भी आलोचना साहितय को केन्द्र में रखकर, साहित्य में से गुजरकर, साहित्य की भाषा से टकराकर होनी चाहिए। शैली वैज्ञानिक प्रविधि मनोविज्ञान, इतिहास, समाज आदि से प्रभावित हुए बिना भाषा के रूप में जो कुछ सामने है उसी को केन्द्र में रखकर चलती है और शायद विश्लेषण के अनन्तर संश्लेषण आलोचना का लक्ष्य और धर्म है। इसलिए मैंने कहा- ‘‘शैली वैज्ञानिक आलोचना ने समीक्षक के मूल धर्म को फिर से उठाया है।’’ परन्तु आज तो स्थिति यह है कि आलोचना के नाम पर यथाकथंचित ही लिखा जा रहा है। आज ज्ञान-विज्ञान के प्रभाव और शैली वैज्ञानिक संदृष्टि आदि सब अतीत की बातें हो गई हैं, आलोचना अपने मूल अर्थ को ही खो बैठी है।
दीपमाला ः शैलीवैज्ञानिक आलोचना के आधार पर कृति का विश्लेषण कठिन माना जाता है, इसे सरल बनाने का प्रयास आपने किया है। इस सम्बन्ध में कुछ बताएँ-
प्रो. शर्मा ः प्रारम्भ में डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, डॉ. रमानाथ आदि ने जो विश्लेषण किए थे वे पूरी तरह सांख्यिकी थे। सर्वनामों की गणना, निपातों की गणना, क्रियापदों के अर्थ जैसा काम ही अधिक होता रहा। इसीलिए यह प्रणाली आगे चली भी नहीं। जब तक विश्लेषण के अनन्तर सहृदयात्मक संश्लेषण नहीं होगा, आलोचना का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आलोचना भी एक अच्छी रचना है, सर्जना है इसीलिए उसमें सहृदय पक्ष अनिवार्य है। मेरी दृष्टि के अनुसार व्याकरण और भाषाविज्ञान का उपयोग उसी सीमा तक होना चाहिए जो कृति के मर्म को उजागर करने में सहायक हो। व्याकरण और भाषाविज्ञान तो साधन हैं, साध्य तो कृति का मर्म ही है। मैंने ज्ञानेन्द्रपति, अरूण कमल, राजेश जोशी, चन्द्रकान्त देवताले आदि की कविताओं के विश्लेषण में इसी पद्धति को अपनाया है। मेरी कोशिश रही कि आलोचना की यह भाषानिष्ठ प्रणाली और भी पल्लवित होती, परन्तु मैं खुले मन से स्वीकार करता हूँ कि आलोचना की अन्य दृष्टियों की ही तरह यह प्रविधि भी मेरे और प्रो. शशिभूषण शीतांशु के साथ ही समाप्त हो रही है।
दीपमाला ः आपने समकालीन कविता का शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। आपने इस अध्ययन हेतु समकालीन कविता को ही क्यों चुना?
प्रो. शर्माः ‘मैंने समकालीन कविता को ही क्यों चुना’- यह तो इसलिए किया है कि मैं समकालीनों के बीच जीवित हूँ। ज्ञानेन्द्रपति जैसे कवि ने मेरी सहृदयतापरक वस्तुनिष्ठ और किसी राजनीतिक धारा से मुक्त दृष्टि को सराहा है। देवतालेजी उज्जैन में मिले थे और मेरी विश्ा*ेषण प्रविधि की प्रशंसा कर रहे थे। आप क्या समझती हैं, मैं समकालीन हवा में साँसें भरकर घनानन्द की कविता का विश्लेषण करूँ।
दीपमाला ः आपने गद्य के शैली वैज्ञानिक अध्ययन के लिए शैलीचिह्नक विचारणा का प्रयोग किया।
शैलीचिह्नक अवधारण क्या है?
प्रो. शर्माः यद्यपि शैलीचिह्नक के बारे में संकेत मैंने आफ पूर्व प्रश्ा*ों के उत्तर में कर दिया है फिर भी सुनें- मैं संदर्भबद्ध अर्थात् एक संदर्भ विशेष के आवर्तन में समान संरचनाओं के आवर्तन को शैलीचिह्नक कहता हूँ, मानता हूँ। आप समझ गई होंगी।
दीपमाला ः क्षमा करें! किन्तु मैं यह जानना चाहती हूँ कि आप स्वयं को आलोचक मानते हैं या अध्यापक?
प्रो. शर्मा ः दीपमाला जी, आपने यह पूछकर मेरे मन को छू दिया है, तो सच यह है कि मैं मूलतः अध्यापक हूँ। आप अभी अध्यापक बनी नहीं हैं, बनेंगी तो जानेंगी कि अध्यापक अध्येता, अभिनेता, सहृदय व्याख्याता होता है तभी अपने विद्यार्थियों के मन में उतरता है। कोई ठूँठ अध्यापक नहीं बन सकता। मैंने जितना-सा भी पढा, जितना-सा भी लिखा, वह सब मेरे विद्यार्थियों के लिए ही किया है, उन्हीं को समर्पित भी है। किसी पुरस्कार या सम्मान के लिए मैंने कभी नहीं किया। ?
३६६, शिव कॉलोनी, हिरण मगरी से. नं. ६, उदयपुर (राज.)
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