दो गजल

डॉ. ब्रिजेश माथुर



(१)
न दौलत, न तमगा, और ना ही नाम होता है,
सिर्फ सुकून-ए-दिल ही सबसे बडा ईनाम होता है।
इक अंधी दौड में मशगूल है ये सारी दुनिया,
असल में जो फकीर होता है वही सुल्तान होता है।
मखमली लिबासों पर जो रौनक बिखेरता है,
खारों में भी वो गुलाब फूलों का सरताज होता है।
काबा काशी जाने की *ारूरत ही क्या है दोस्तों,
मुहब्बत वाले तो घरों में ही हर धाम होता है।
दौलत की जगह जो इंसान उसूल चुनता है,
वही तो फिर गौतम, बुद्ध और राम होता है। ?
(२)
लडकपन की याद *ाहन में कुछ यूँ बसी रहती है,
जैसे सीप में मोती और फूलों में खुशबू छुपी रहती है।
कोई कितने भी परदे डाल दे अपनी फितरतों पर,
परवरिश बडी शोख है, सामने आकर ही रहती है।
इक लुकाछुपी सी लगी रहती है, किस्मत और इंसानों के बीच,
कभी इंसान किस्मत से तो कभी किस्मत इंसान से छुपी रहती है।
नफरतों की, न जाने कैसी आग है, इंसानों के बीच,
कि जब से, जमीं बनी है, मुसल्सल जलती रहती है।
बडे ही बेबस हैं पिंजरों में बंद ये मासूम पँछी, मगर
जुबाँ से मजबूर इनकी आँखें सब कुछ कहती रहती हैं।
जंग में चाहे कितनी भी मशगूल रहे ये दुनिया,
चिडिया चहकती और कली खिलती रहती है। ?
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