चार गजलें

हरि शंकर ‘हरीश’




(१)
बालपन, पीरी, जवानी देख ली,
यानी पूरी *ांदगानी देख ली।
साथ मेरे रब मुसीबत में रहा,
दोस्तों की मेहरबानी देख ली।
लोग जिनके वास्ते बेताब थे,
शय जगत की सारी फानी देख ली।
सरदी, गरमी, बादलों का कारवां,
धूप तीखी, रुत सुहानी देखली।
देखने को जब बचा कुछ भी नहीं,
अपनी फोटो कुछ पुरानी देख ली।
फिर भी आंखें रह गई प्यासी ‘हरीश’,
जब से इक मूरत नूरानी देख ली। ?
(२)
राधा रही ना राधा श्याम, श्याम है,
प्यार कितना हो रहा बदनाम है।
दर्शन हो, प्रशाद तय है कीमतें,
बन गए दुकान तीरथ धाम है।
क्या जमाना आ गया है आजकल,
मांगता हर रिश्ता अपना दाम है।
जो फरिश्ता बन के इस युग में रहा
हो गया वह भीड में गुमनाम है।
फ*ार्, सेवा, बंदगी को भूलकर,
रह गया बस धन कमाना काम है।
बच सके तो बच ले इस बाजार से,
माल नहीं यहां सिर्फ बिकता नाम है।
पुत्र रहा इस दौरे में वो ही ‘हरीश’
शर्म है ना जिसके दिल में राम है। ?
(३)
बताए कोई ये सचाई बताए,
गए कितने मासूम यहां पे सताए।
जिसे देखिए वो दिखाता है सपने,
सपनों को सच भी तो करके दिखाएं।
क्या होगा जन्नत बनाने से दुनिया,
अगर गीत धरती न खुशियों के गाए।
वहां आबरू आदमी की क्या होगी,
दौलत से हर शय जहां तोली जाए।
चलना कठिन बहुत सेवा के पथ पर,
यहां कोई अपने ना होते पराए।
करो कोई तो काम ‘हरीश’ ऐसा,
हंसे ये जमीं आसमां मुस्कराए। ?
(४)
भला देखता ना बुरा देखता हूं,
खडा सामने मुद्दआ देखता हूं।
कभी देवता से भी ऊंचा था मानव,
उसे आज इतना गिरा देखता हूं।
कहां गुम हुई वो सचाई की ताकत,
सूली पे सच को चढा देखता हूं।
जमीं है वही चांद-सूरज वही है,
जमाने की बदली हवा देखता हूं।
सितम है कहीं पर, कहीं पर दगा है,
रहम देखता, ना वफा देखता हूं।
पता क्या दिखाएगी किस्मत क्या आगे,
अभी तो गिरेबां फटा देखता हूं। ?
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