चार गजलें

रमेश मनोहरा


(१)
सलूक करते हैं वे दुश्मनों की तरह
कडक रहते हैं फिर चट्टानों की तरह
हो गये हैं रिश्ते अब कितने खोखले
रहने लगे घर में मेहमानों की तरह
कैसी अजीब सभ्यता हो गई है ये
पडौसी खुद रहते अनजानों की तरह
भूखे पेट हैं फिर भी देखिये ये आलम
हरदम रहते हैं वे मस्तानों की तरह
ढह जाते हैं उनके सभी ही अरमान
जब भी आते है वे तूफानों की तरह
टी.वी. का असर इस कदर पड गया है
बच्चें भी बातें करें सयानों की तरह
आ गया है रमेश में कितना बदलाव
रहता है वो ऊँचे मचानों की तरह ?
(२)
करें तरक्की ये अवाम अपना
कीजिए ऐसा ही काम अपना
चुराकर दूसरों का जो पढते
बताकर जब उसे कलाम अपना
देकर अपने वालों को धोखा
निकालते हैं यहाँ काम अपना
बैसाखियों का लेकर सहारा
चलाते हैं फिर भी नाम अपना
दूजों का माल हडपकर भी वे
बतलाते हैं फिर तमाम अपना
वे अपराधी हैं फिर भी देखिए
पता बतलाते गुमनाम अपना
करें देश का अगर नुक्सान वे
ऐसो पर लगाए लगाम अपना
सच्चा फनकार बनकर रहे तू-
फिर करें हासिल मुकाम अपना
तेरे रंग में ही रंग जावे रमेश
पिता दे प्यार का जाम अपना ?
(३)
घरों की शोभा तो बेटियाँ हैं
फुदकती हुई सभी तितलियाँ हैं
काजू-किशमिश खाते रहे आप
हमारे लिए सूखी रोटियाँ हैं
शून्य से जिनका गहरा नाता
यही उनके लिए उपलब्धियाँ हैं
सयानी बेटी हो जाती विदा
पिता के घर शहनाईयाँ हैं
सब करें वाह! वाह जिसे सुनकर
ग*ालों में जो गहराईयाँ हैं ?

(४)
आता है जिसे जोर राहतीर उठाने में
कैसे हैं वे लोग यारों इस *ामाने में
भूल गया है सारे रिश्तों को वो यहाँ
लगा हुआ है ध्यान उसका बस कमाने में
जो पहले से ही है डरा हुआ यहां पे
फिर भी आता है मजा उसे डराने में
सभी योजनाएँ हो जाती उस समय असफल
होता नहीं टकसाल आफ खजाने में
बन जाता है आजकल आदमी बहुरुपिया
इसलिए मुश्किल आती है पहचान पाने में
खूब खाकर भी रहते वे भूखे के भूखे
फिर भी भरता नहीं पेट इतना खाने में
पडोसियों को लडते देख होते बहुत खुश
आता है मजा उसे और भी लडाने में
देखकर भी अनदेखा कर निकल जाते हैं
आते नहीं रमेश को कोई बचाने में ?
शीतला गली, जावरा, जिला रतलाम-४५७२२६ (म.प्र.)
मो. ०९४७९६६२२१५