छः गजल

शम्मी-शम्स वारसी



(१)
ये इश्क का जुनून तो क्या-क्या बना गया।
राधा बना गया कभी मीरा बना गया।
इक पेड पर फले हैं मगर लू का ये असर,
कडवा मुझे तो भाई को मीठा बना गया।
ऊँचा समझ रहा था जो दस्तार बांध कर,
उसका सुलूक ही उसे बौना बना गया।
तलुवों से उसके आँखें मलीं गाँव लौटकर,
इक शख्स माँ का टूटा जो चश्मा बना गया।
अच्छे घरों के बच्चों को नीले धुँअे का शोक,
चाबी से चलने वाला खिलौना बना गया।
पैरों में अब हमारे भी जंजीर डाल दो,
गर्दिश का हाथ रेल का डिब्बा बना गया।
‘ऐ शम्स’ खुदकुशी के लिये आया था वो मगर,
बच्चों के खेलने को घरौन्दा बना गया। ?
(२)
दहलीज से डरा कभी अंगनाई से डरा।
अपने ही घर में अपनी ही परछाई से डरा।
झूठो-फरेब से न में सच्चाई से डरा।
जब भी डरा हूँ मैं किसी अच्छाई से डरा।
दरिया से, झील से न कभी खाई से डरा।
बच्चों की बात में छुपी गहराई से डरा।
देखे बहुत हैं आँखों ने मं*ार विदाई के,
ताउम्र इसलिये ही मैं शहनाई से डरा।
बरगद-मिजा*ा लोग मेरी बस्ती को खा गये,
मैं हर घने दरख्त की परछाई से डरा।
मुझकों डरा न पायी सदा आबशार की,
खमोश पानियों पे जमी काई से डरा।
जब माँ के बाद भाई ने सर पर रखा जो हाथ,
पहली दफा मैं अपने बडे भाई से डरा।
निस्बत *ामीन की मुझे थामे हुए हैं ‘शम्स’,
बारिश से, धूप से न मैं पुरवाई से डरा। ?

(३)
शोहरत के साथ खोने का इक डर भी आयेगा।
झाँकोगे परबतों से तो चक्कर भी आयेगा।
तुम इन्ति*ाार मत करो, कोशिश करो मियां,
जो साँप छुप गया है वो बाहर भी आयेगा।
देखो किसी बुराई के अन्दर न झाँकना,
आँधी चली तो आँख में कंकर भी आयेगा।
ये धूप और प्यास तो इक इम्तिहान है,
सहरा जो आ गया है तो पोखर भी आयेगा।
आते हैं जिस तरफ से वतन में उकाब आज,
इक रो*ा उस तरफ से कबूतर भी आयेगा।
भाई तो ‘शम्स’ शहर में आकर चला गया,
मैंने कहा था माँ से मेरे घर भी आयेगा। ?
(४)
शहरी हुआ तो गाँव के जीवन से कट गया।
चौपाल-गाँव-घर-गली-आँगन से कट गया।
बस एक बार ही तो उठी थी गलत निगाह,
फिर वो तमाम उम्र को दरपन से कट गया।
आयीं बहुत ही याद वो पीतल की चूडियाँ,
जब हाथ उनका सोने के कंगन से कट गया।
मिट्टी के बरतनों की महक भी अ*ाीब है,
जिसने छुआ वो चाँदी के बरतन से कट गया।
माँ-बाप तो हैं खुश ये कमाई को देखकर,
बच्चा मगर ये अपने ही बचपन से कट गया।
सर को झुका के ‘शम्स’ निकलना न था कुबूल,
बस इसलिये ही सर मेरा गरदर से कट गया। ?
(५)
कहो तो शहर में क्या-क्या दिखाई देता है।
कहीं से गाँव का रस्ता दिखाई देता है।
*ारा सा गौर से देखो हर एक चेहरे पर,
सजा-धजा सा मुखौटा दिखाई देता है।
जो कह रहा है कडी धूप से न घबराओ,
उसी के हाथ में छाता दिखाई देता है।
इन्हें गरीबों के चिफ शिकम भी दिखलाओ,
इन्हें गरीबों का रोना दिखाई देता है।
परख के देखा है दिल उसका खूबसूरत है,
वो शक्ल से तो घिनौना दिखाई देता है।
दिलों में *ाहर जो भरता है ‘शम्स’ उसके ही,
मकां में साँप का फेरा दिखाई देता है। ?
(६)
हाथों में हाथ दे कि ये जं*ाीर चाहिये।
दुनिया को भाईचारे की तस्वीर चाहिये।
कदमों तले रखी हुई जन्नत को छोडकर,
बच्चों को वालिदैन की जागीर चाहिये।
बच्चा जो चाँद माँगे तो देते कहाँ हैं चाँद,
*ाद्दी मेरे पडौसी को कश्मीर चाहिये।
भारत की खूबसूरती दिखती नहीं इन्हें,
इनको तो बस गरीबों की तस्वीर चाहिये।
पाकी*ागी *ारूरी है ‘ऐ शम्स’ सोच में,
अच्छी ग*ाल को अच्छी ही तहरीर चाहिये। ?
छोटी मस्जिद के पास, आबूरोड (राज.)-३०७०२६
मो. ०८२९०१८०१७६