दो गजल

प्रवीण कुमार दर्जी



मेरे अल्फाज किताबों में रोते मिले।
एक अजनबी के लिए आँखें भिगोते मिले।
जागे रहे जिनके लिए हम रात भर,
वो हमें सुकून की नींद सोते मिले।
आज भी आबाद है मुस्कान उनके होठों पर,
हम ही अपना वजूद खोते मिले।
कैसे कहूँ यह सा*ाश थी जमाने की,
मेरे ‘अपने’ राहों में काँटे बोते मिले।
मुहब्बत में हर बाजी जीती है हमने
जिसके सामने हारा, तुम इकलौते मिले। ?

एक दूसरे से बिछडकर, हम कितने रंगीले हो गये।
आँखें मेरी लाल हुई हाथ तेरे पीले हो गये।
मुहब्बत मेरी अश्क बहाने का सफर भर था,
रूमाल मेरे भीगे हैं, दुपट्टे तेरे गीले हो गये।
बिखरे हाल में आबाद हैं आज भी आशियाना मेरा,
बस जो ख्वाब थे, वो सारे नशीले हो गये।
सपनों का कत्ल हुआ, टूटी मेरी उम्मीदें सब,
एक तेरी चाहत के लिए, ये कितने सिलसिले हो गये।
कदम बेगानी गलियों में पडने से कतराते हैं,
तेरी चौखट तक आने वाले, रास्ते अब कंटीले हो गये। ?
मु.पो. दाँतवाडा, तह. रानीवाडा, जि. जालोर(राज.)-३४३०४०
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