तीन गजल

ओमप्रकाश अडिग


एक मीठे बोल से भी जीत सकता है तू दिल
एक दिए का चित्र भी जो तू बनायेगा।
तो अंधेरा जिन्दगी से भाग जाएगा।।
फिर किसी बच्चे को आओ गोद में लें लें।
आपका बच्चा भी उसमें मुस्कुराएगा।
कोई मिट्टी म लगाकर फूल तो देखो,
आपका भी नाम फिर खुशबू लुटाएगा।
एक मीठे बोल से भी जीत सकता है तू दिल
कौन फिर दुनिया में बोलो बम बनाएगा।
जिन्दगी के हाशिए को फिर सही कर दे,
काल भी फिर गीत तेरा गुनगुनाएगा। ?
प्रश्न होते हैं
प्रश्न होते हैं, मगर उत्तर नहीं होते।
आकाश छूते हैं, हमारे पर नहीं होते।।
हमारी दृष्टि ही संसार का निर्माण करती है,
चित्र लेकिन आँख के भीतर नहीं होते।
हम जहाँ होते वहीं पर जिन्दगी होती,
पहचान लेने के भले अवसर नहीं होते।
हमारी ही विलक्षण कल्पना के भाव होते हैं,
मूर्ति होती है जहां, पत्थर नहीं होते।
कुछ देर अपने पास में बैठ कर देखें,
वेद मंत्रों में बडे अक्षर नहीं होते। ?
प्यार अजनबी
बाहर रहने वाली दुनिया के भी रंग निराले थे।
घर जाकर सबके सब रोए जितने हंसने वाले थे।।
मैंने भी कब जाना चाहा उस घर की चौखट पर,
जिसके घर से आँसू मेरे फिर फिर गए निकाले थे।
कोई नियम काम कब आता है चलती बाजारों में,
अंधकार के विज्ञापन पर सपने दीपक वाले थे।
जिसको गौरा समझा उसका मुँह धुलते ही पोल खुली,
बाहर की चमडी का क्या है, दिल तक उसके काले थे।
प्यार अजनबी के लिबास में बाहर बैठा रहता है,
कडे करकट घर में रखकर हम सन्दूक संभाले थे। ?
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