दो गीत

डॉ. कमलाकान्त शर्मा ‘कमल’


जहाँ न कोई छलता हो
जग से उस ओर चलो प्रिय मेरे
स्नेह नयन से झरता हो!
अब उस ठोर चलो हमराही
जहाँ न कोई छलता हो।।
बहुविध रंग बदलते देखे
प्रतिपल प्रतिदिन जीवन में।
अब पडाव उस मोड बने जहां
कपट द्वेष ना पलता हो।।
अब उस ठोर चलो हमराही, जहां न कोई छलता हो।।
मुस्कानों के संग यहां पर
निशिदिन धोखे खाये हैं!
हरदम रंग बदलती दुनिया
कितने घाव लगाये हैं!!
इन लोगों से दूर चले जहां
कमल प्रेम का खिलता हो!
अब उस ठौर चलो हमराही
जहां न कोई छलता हो!!
चन्दा की उ*ाली रातों में
काले कल्मष काम किये!
शब्दों में अपनत्व भरा था
आँखों से अंगार झरे!!
कथनी और करनी की दूरी
जहां न कोई रखता हो!
अब उस ठौर चलो हमराही
जहां न कोई छलता हो!!
समय चक्र की धारा में
सब कुछ लील लिया जाता है!
मनुज भूल कर इनसे आगे
अपनी राह बढा जाता है!!
बढ लें हम भी उसी दिशा में
*ाख्म जहां ना मिलता हो!
अब उस ठोर चलो हमराही
जहां न कोई छलता हो!!
इस जीवन के कितने लेखे
रिश्ते-विश्वास बदलते देखे!
श्वास श्वास में राम सिमरते
स्वार्थ साधते उनको देखे!!
रिश्ते टूटे भले सभी से
विश्वास जहां ना मिटता हो!
अब उस ठौर चलो हमराही
जहां न कोई छलता हो!!
झुके शीश अब उसके आगे
जो जीवन का तारक है!
उसको नहीं जो हाथ थामकर
छुरी चलाता मारक हैं!!
सि*ादा उसका करें सभी अब
जो जीवन का भर्ता हो!
जग से उस ओर चलो अब साथी
जहां न कोई छलता हो!! ?
मैंने अपनी राह चुनी है
बाधाओं का वक्ष चीरकर
मैंने अपनी राह चुनी है!
जग समझे चाहे जो मुझको-
जीवन चादर सही बुनी है!!
बाधाओं का वक्ष चीर कर, मैंने अपनी रहा चुनी है!!
पग पग पर कांटे बोये हैं
पथ में कांटे बिखराये!
उन लोगों के कर्म सदा ही-
मेरे सम्मुख छितराये!!
अपनी दिशा सोचकर मैंने
कांटे बिखरी राह चुनी है, बाधाओं का वक्ष चीर कर....!
बिलख रही मानवता देखी
अन्तस पीर सिसकती देखी!
जाने कितनी आशाएं नित-
धूल धरा में मिलती देखी!!
सम्बल उनका बनूं ठान कर
जख्मों वाली राह चुनी हैं, बाधाओं का वक्ष चीर कर....!
रंग बदलते रिश्ते की सब
मर्यादाएं टूट-गई!
भाईचारा, स्नेह-प्रेम की
सब धाराएं सूख गई!!
नेह नीर आंखों से रूठा
मैंने भीतर की बात सुनी हैं, बाधाओं का वक्ष चीर कर....!
सौदागर ये राष्ट्र धर्म के
द्वेष कपट के फन्दे रचते!
स्वार्थ पूर्ति में सभी जुटे हैं-
केवल अपनी झोली भरते!!
इन लोगों को सबक सिखाने-
देश-प्रेम की राह चुनी हैं, बाधाओं का वक्ष चीर कर....! ?
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