मई जून की धूप

अशोक आनन


देह-कुशन में
पिन-सी चुभती-
मई-जून की धूप।
सूरज
उडेल रहा धरा पर-
आसमान से लावा।
बूढा बरगद कर रहा-
घनी छाँव का दावा।
मन-मछलियाँ
गटक रहीं-
रेत-नेह का सूप।
बिना निचोड ही
सूख गया-
तर-रूमाली मन।
गर्म तवे-से
तप रहे-
पथरीले घर के दामन।
भील कन्या-से
अब सुखाने-
ताल-नदी और कूप।
लू की धूनी ताप रहे
साधक पेड-
दोपहरी में।
बदन, बर्फ-से
पिघल रहे-
सूरज की कोर्ट-कचहरी में।
सज-धजकर निकली
हर सुबह का-
बिगड गया रंग-रूप। ?
धूप का कहर
दूर-दूर तक पसरा-
बे-शरम सन्नाटा।
पत्ते उतारकर
पेड खडे-
दिगम्बर-से।
सुबह से
आग बरस रही--
अम्बर से।
धूप तक निकली
बाँध मुँह पर दुपट्टा।
सडक
पानीदार हुईं-
नदियाँ रेत।
प्राण संकट में
लेटे-
मुँह फाडकर खेत।
ग्रीष्म-समय
लू का- सैर-सपाटा।
धूप का कहर
हैं सांसत में-
मछलियाँ।
बहुत आतंकित हैं
प्राणों की-चिरैया।
आसमान से
धरा तक है-
सूरज का पट्टा। ?
आग लगी गर्मियां
लौट आईं
आग लगी-
ये गर्मियाँ फिर से।
गर्म हवाओं के-
पंख निकल आए।
सूरज ने-
लू के अलाव जलाए।
आँखों में
धूल झोंक रहीं-
आँधियाँ फिर से।
पानीदार नद के-
कण्ठ सूखाने।
पानी के-
मिट गए वंश-घराने।
धरती
कराह रही-
फटी बिवाइयाँ फिर से।
कहीं न दिखे-
छाँह की गौरैया।
बे-लगाम हुआ-
मौसम का कन्हैया।
दाखिल हुईं
छुट्टियों की-
अर्जियाँ फिर से। ?
पानीदार रहे न
बढती तपीश की
उफ!
ये तीखी मार।
सूखे ने-हरियाली के घर झाँका।
गर्मी ने-
घर-घर डाला डाका।
छाँव के
अब उजड गए-
घर-बार।
धरती वीरान है-
और खेत तडके।
खामोशी ओढे-
लेटी हैं सडकें।
हवाओं को भी चढा
आज-
ते*ा बुखार।
पानीदार रहे न-
अब कुएं-नदियाँ।
उजड गईं-
पानी की आज बस्तियाँ।
तन, तप्त धरा
मन-
सावन की फुहार। ?
मक्सी-४६५१०६, जिला-शाजापुर (म.प्र.)
मो. ९९८१२४०५७५