दो गीत

डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’


रूप और नयन
रूप दिया है तुमको जिसने हमें उसी ने नयन दिये हैं।
झूम रही है दृष्टि तुम्हारी
वहीं कमल वन झूम रहे हैं,
झूम रहीं अंगूर लताएँ
मधुपों के मन झूम रहे हैं,
झूम रहा है मलय समीरन कंटक वन भी रूप पिये हैं।
सुंदर है जो चंद्र गगन पर
तो अवनी पर है चकोर भी,
रूप कहाँ होता इस जग में
नयन न होते छवि विभोर भी,
आज रूप पर पर्दा डाले क्यों नयनों की ओट किये हैं।
गंगा में डूबा लज्जित शशि
क्षीण क्षीणतर होकर क्षण क्षण,
सीकर के मिस निशि अंचल पर
बरस बरस जाते अमृतकण,
जीवन के लोभी लोचन ये बूँद बूँद को हार किये हैं।
कौन बतायेगा पतिता है
किसी दृष्टि से दृष्टि हमारी,
रूप देखते हैं हम केवल
इसी रूप तक सृष्टि हमारी,
रूप दरस के प्यासे नयना मरते मरते आज जिये हैं। ?
देश की माँग
सन् ब्यालिस का था यह नारा ‘अंग्रेजों यह भारत छोडो।
आज देश की माँग यही है भारत जोडो भारत जोडो।
संप्रदाय की अंधभक्ति ने
दिल में नफरत का विष घोला,
हिन्दू, मुस्लिम सिक्ख सभी ने
भडकाया हिंसा का शोला,
अब सारा संघर्ष मिटाओ हिंसा से अपना मुख मोडो।
जाति पाँति के भेदभाव ने
सदा हमें कमजोर बनाया,
ऊँच नीच के मनमुटाव ने
फूट डालकर हमें लडाया,
राष्ट्र एकता अपनी मंजिल भेदभाव के बंधन तोडो।
क्षेत्रवाद के क्षुद्र स्वार्थ ने
भारत को टुकडों में काटा,
भाई ने भाई से लडकर
भारत माँ का आँचल बाँटा,
शान्ति-प्रेम का वादा करके टूटे हुए दिलों को जोडो।
भाषा के विवाद को लेकर
झगड रहे हम भाई-भाई,
इसी फूट का लाभ उठाकर
अंग्रेजी सिर पर चढ आई,
लगा स्वदेशी का फिर नारा अंग्रेजी की गुलामी छोडो ?
१४३६/बी, सरस्वती कॉलोनी, चरीताल वार्ड
जबलपुर(म.प्र.)-४८२००२