चार गीत

जया गोस्वामी


पाया तुमको
जिस लमहे ने पाया तुमको
रुका हुआ व लमहा मुझमें।
होती जाती मुद्दत जितनी
बढती जाती शिद्दत उतनी
पल-भर दूर न हो पाए तुम
फैली दूरी अब तक कितनी
धडकी रहा अहसास तुम्हारा
साँस-साँस की तरहा मुझमें।
अगर अँधरों की बातों में-
आकर धूप ढली रातों में
तभी कहीं से आ जाते तुम
जलती शमां लिए हाथों में
लो, यादों की बस्ती जगमग
कह जाता कुछ तनहा मुझमें।
मेरा चलना कदम तुम्हारा
मेरी छाया भरम तुम्हारा
होता जाता है मुतवातिर
हर लमहे में जनम तुम्हारा
कितने मिलन हो गए तुमसे
नहीं रहा अब बिरहा मुझमें। ?

भूल गए हम
तन सुगन्ध से रचे बसे हैं, मन सुगन्ध क्यों भूल गए हम?
दम्भ कुतरते अपने-पन को
लील रहा सूनापन मन को
बन्द घरों में सिमट गए सुख
मिूली न तरू छाया बचपन को
बह कर छल बल की धारा में, नेह गंध क्यों भूल गए हम?
कहां गए अनुशासन सारे
सदाचरण सद्भाव हमारे
जाने किस बेगाने डर से
अपने मूल्य बने बेचारे
बरसों के नैतिक नियमों का सुप्रबन्ध क्यों भूल गए हम?
बहुत हुई क्षत विक्षत ममता
फिर भी अन्तर्मह न थमता
क्यों जगती है प्यास अजानी
बची न जब पीने की क्षमता
दो तट तन-मन की तृष्णा के, यही द्वन्द्व क्यों भूल गए हम?
भौतिक सुख-सुविधा के पीछे
भाग रहे हैं आँखें मीचे
अन्तहीन आकर्षण ऐसे-
एक हटाओ दूजा खींचे
इस मरीचिका में लालच का कूप-अंध क्यों भूल गए हम? ?
धीर धर लिया
धीर धर लिया है इस मन ने,
मोह सदा व्यामोह रहा, वह मोह हटा डाला चिन्तन ने।
बाँध रहे थे जो आकर्षण, सिद्ध हुए वे निपट विकर्षण
सम्मुख प्रकट प्रवंचन देखा, मन जब कर पाया विश्लेषण
नाग-पाश की तरह रही वह गिरह खोल ली है बन्धन ने
राह दिखा दी विस्थापन ने।
पल पल संशय करने वाले, ममता का क्षय करने वाले
स्नेह, प्रभुत्व प्राप्त सुविधा का जो क्रय-विक्रय करने वाले
वे अब लज्जित हो बैठे हैं, जिनका सच खोला दर्पण ने
भरम हटाया मुख-दर्शन ने।
मलयज चित्रित फलक सजाकर, कहीं इत्र की पुलक जगाकर
कहीं बनाकर चिता स्वयं को, कहीं भाल पर तिलक लगाकर
अपने में जो रहा सुवासित, बाँट दिया वह सब चन्दन ने
सहज कर दिया उद्बोधन ने।
जन जन जहाँ स्वार्थ में रत है, जग पाखंडों की मूरत है
अधिकारों का हनन यहाँ पर, जीवन एक महाभारत है
कृष्ण कहीं हैं तो आयेंगे, चीर हर लिया दुःशासन ने
भेज दिया है स्वर क्रन्दन ने। ?
तेरे नाम
ओ सपनों के मीत अनाम
गीत हमारे तेरे नाम।
उगता सूरज चमक रहा
तेरी बिंदिया की थाली में
रंग कमल का धुला हुआ है
दो होठों की लाली में,
जुल्फों में उतरी है शाम, चाँद सितारे तेरे नाम।
इन्द्र धनुष अटकाया है
तूने लहराती चूनर में
खुली हवा को बाँध लिया
अपने लहँगे के घूमर में
बन्द हुए कुदरत के काम, हुए न*ाारे तेरे नाम।
ये मदमाते नयन बहाने लगे
सुरा जब चितवन से
बिना पिये खो गया धड-
कनों का वजूद अपने तन से
टकरा कर न*ारों के जाम, घूँट उतारे तेरे नाम।
सुर्ख मुहब्बत के कागज से
बिखर गई गुल की खुशबू
हर कागज पर दिल ही दिल है
हर खुश-खत में तू ही तू
भेज रहा कोई गुमनाम, ये खत सारे तेरे नाम। ?
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