अपना-अपना सुख

कुसुम अग्रवाल



सुबह उठकर चाय के कप के साथ दिनभर के कार्य की रूपरेखा तैयार करना रोहित की आदत में शुमार था। सुबह-सुबह ऊर्जा से भरपूर तन और शांत मन से यह कार्य जितनी कुशलता से किया जा सकता था उतना दिन के किसी अन्य वक्त नहीं।
रोमा, जरा मेरी इंश्योरेन्स वाली फाइल पकडा देना, देखूं किस-किसकी डेट ड्यू है आज? - रोहित ने चाय का कप रोमा के हाथों से लेते हुए कहा।
रोमा अंदर के कमरे में गई और जब लौटी, उसके हाथों में रोहित का मोबाइल और फाइल दोनों थे।
यह लिजिए अपनी फाइल और मोबाइल दोनों क्योंकि मैं जानती हूं कि आप दो क्षण बाद मुझसे यही मंगवाने
वाले थे, रोमा ने दोनों चीजें रोहित को पकडाते हुए कहा और चाय का कप पकडने के लिए हाथ बढाया ही था कि रोहित फिर बोला-
प्लीज मेरा पेन भी पकडा दोना। हां एक नैपकिन भी लेती लाना। हाथों में बहुत पसीना हो रहा है। बाप रे। कितना उमस भरा चिपचिपा मौसम है।
रोमा ने चाय एक ओर रख दी और बिना किसी प्रतिरोध के पैन और नेपकिन लाने चली गई। हालांकि वह जानती थी कि इन सब कामों के बीच उसकी मनपसंद लेमन टी का नाश हो रहा है।
सॉरी, तुम्हारी चाय तो ठंडी हो गई होगी। कोई बात नहीं दूसरी बना लो। हां मेरे लिए भी एक और बना देना। पहले वाली में कुछ खास मजा नहीं आया। थोडी कडक कम थी।
रोमा चुपचाप रसोई में चली गई। उसके लिए नई बात नहीं थी। यह रोहित की रोज की आदत थी।
दूसरी चाय पीकर रोहित अपना काम तन्यमयता से करने लगा था कि अचानक मबाईल बजा। रोहित ने कॉल रिसिव किया।
- हेलो रोहित, यार मैं समीर बोल रहा हूं। कैसा है?
- अच्छा हूं। तू बता तू कैसा है? आज इतने दिनों बाद तुझे मेरी याद कैसे आई?
- आ गई या ये समझ ले कि मेरी जरूरत ही खींच लाई।
रोहित इंसान बडा स्वार्थी है या ये कहो कि उसे स्वार्थी बनना पडता है वरना वह इस दुनिया में सरवाइव ही नहीं कर सकता। परंतु कई बार मुझे इंसान की इस मजबूरी से बडी घुटन सी महसूस होती है।
- तुम बिल्कुल नहीं बदले। वही दार्शनिकों जैसी बातें। चल छोड यह सब और मुद्दे पर आ। बोल क्या काम
है मुझसे?
- एक बार तूने मुझे बताया कि तू इंश्योरेंस एजेंट भी है। यार अपनी गाडी का इंश्योरेंस करवाना था।
- गाडी? गाडी कब खरीदी तूने? और तेरी बाइक, उसका क्या हुआ?
- कुछ ही दिन हुए बाइक देकर एक नई होंडा सिटी ले ली है। यार गाडी में ऑफिस जाने का मजा ही कुछ और है। तेरे पास कौन सी है?
- यार अपना तो वहीं बजाज-लाजबाव। उसे कैसे छोड दूं? रोहित ने हंसकर कहा हालांकि उसकी इस हंसी के पीछे उसकी आर्थिक विवशता छिपी थी वरना गाडी का तो उसे भी शौक था।
- हां तू इंश्योरेंस की बात कर रहा था ना। हो जाएगा गाडी की पूरी डिटेल्स चाहिए।
- मिल जाएंगी। तू ऑफिस के लिए निकलते समय मेरे से ले लेना और इसी बहाने हमारा नया घर भी देख लेना।
- नया घर कब बनवाया? बडा छुपा रुस्तम निकला तूं तो। क्या लॉटरी-वॉटरी हाथ लग गई तेरे?
- अरे यार लॉटरी तो उसी दिन लग गई थी जिस दिन नीता से रिश्ता पक्का हुआ था। तुझे तो पता ही है मैडम बैंक में है और 6॰,॰॰॰ महीने पक्के हैं। बता इसे बडी इससे और क्या होगी।
- तू सही कह रहा है। ठीक है मैं आता हूं कहकर रोहित ने फोन काट दिया। मन की शांति भंग हो गई थी और बना बनाया मूड बिगड गया था। सुबह से अपने सानंद गृहस्थ जीवन का आनंद ले रहे रोहित को जैसे किसी ने मीठी नींद से झंझोड कर उठा दिया हो। समीर की आर्थिक संपन्नता के सन्मुख अपनी साधारण कमाई, किराए का घर व पुराना स्कूटर रोहित को अपने आर्थिक अभाव का बोध कराने लगे। यकायक रोमा की सारी सुघडता, उसका पति व परिवार के प्रति समर्पण और अनुराग समीर की कमाऊ बीवी के सम्मुख उसे बेमानी से लगने लगे और उसे अपना अतीत स्मरण हो आया।
रोहित और समीर सहपाठी थे और आम युवकों की भांति महत्वाकांक्षी भी थे। अच्छी पगार गाडी, बंगला उनकी भी ख्वाहिश थी।
- यार इस महंगाई के जमाने में एक मध्यवर्गीय इंसान के लिए यह जुटा पाना टेढी खीर है- वे अक्सर सोचते और इसी बीच जब समीर के लिए नीता का रिश्ता आया तो उसने इस रिश्ते के लिए यही सोचकर खुशी-खुशी हां कर दी थी कि दोनों कमाएंगे तो सब आसान हो जाएगा क्योंकि नीता बैंक में जॉब करती थी।
- यार तेरा तो जुगाड हो गया अब कुछ अपना भी हो जाए तो बात बने, रोहित ने एक दिन समीर को अपने मन की बात कही।
- हो जाएगा तेरा भी। थोडा सब्र रख और फिर समीर अपनी गृहस्थी व काम में व्यस्त हो गया था।
पर कहते हैं ना कि जोडिया तो आसमान से बनकर आती हैं हम तो मात्र कठपुतलियां हैं, वही रोहित के साथ भी हुआ और उसका रिश्ता सुंदर, सुशील, सभ्य रोमा के साथ तय हो गया। रोहित को रोमा में बस एक कमी नजर आई थी कि वह घरेलू लडकी थी यानि दोहरी कमाई की कोई उम्मीद नहीं थी।
- जल्दी से मेरे कपडे निकाल दो। आज मैं थोडी जल्दी निकलूंगा। रास्ते में समीर के घर भी रुकना है, रोहित ने विचारों के जाल को तोडते हए कहा और बाथरुम की ओर चल दिया।
रोमा ने कपडे निकाल कर रख दिये थे और लंच-बॉक्स भी पैक कर दिया था। समयाभाव को देखते हुए उसने रोहित के जूतों पर ब्रश भी मार दिया था।
- शाम को जल्दी आ जाना। आज खाना खाकर पार्क चलेंगे, निकलते समय उसने रोहित को प्यार भरी हिदायत भी दी।
हांलांकि रोज रोहित भी मुस्कुराकर बॉय कहता था परंतु आज वह बिना कुछ कहे निकल गया। कुछ तो उसे जल्दी थी कुछ उसके मन में अभी भी विचारों की जंग चल रही थी। विचारों में डूबे-डूबे ही वह कब स्कूटर को किक मारने लगा पता ही न चला। जब दो-तीन बार किक मारने पर भी स्कूटर नहीं स्टार्ट हुआ तो उसे झुंझलाहट होने लगी। उसकी आंखों के सामने समीर की नई होंडा सिटी की छवि नाचने लगी और उसने गुस्से में आकर स्कूटर को लात मारी। स्कूटर का तो रोज का यही खेल था पर आज बडी रेखा के सम्मुख उसकी रेखा छोटी हो गई थी।
यदि रोमा की जगह कोई कमाऊ बीवी होती तो आज वह इस स्कूटर से माथापच्ची करने की बजाए किसी लग्जरी गाडी में ऑफिस जा रहा होता है। हाय री किस्मत सदा ही धोखा दिया। ना ही बडा जॉब, ना ही पैतृक सम्पति और ना कमाऊ बीवी, कुछ भी तो नहीं दिया तूने। रोहित जितना अधिक सोचता उतना ही उसकी नजरों में समीर का वैभव बढता जा रहा था।
लात खाकर स्कूटर स्टार्ट हो गया था और तकरीबन आधा घंटा उस मरियल ट्टटू की सवारी करने के बाद रोहित समीर के घर पहुंच गया।
बाहर से बंगला अधिक आलीशान तो नहीं कहा जा सकता था परंतु सुख-सुविधा पूर्ण नजर आ रहा था क्योंकि बाहर चमचमाती गाडी खडी थी और तीन एयर कंडीशनर लगे साफ नजर आ रहे थे।
कॉल बेल बजाकर रोहित सकुचाया सा एक ओर खडा हो गया।
ऐसा क्यों होता है? स्वयं से स्मृद्ध व्यक्ति को देखते ही हमारे मन में हीन भावना क्यों घर कर लेती हैं? हम सभी से अपना तुलनात्मक अध्ययन क्यों करते रहते हैं? शायद इसी कारण हमारे सुख हमारे पास आते आते ठहर जाते हैं।
दरवाजा समीर ने ही खोला और रोहित को अंदर ले गया। अंदर का दृश्य रोहित के आशानुरुप ही था। बढिया सोफा, डाइनिंग-टेबल सब कुछ अपनी-अपनी जगह पर वैसा ही था जैसा की एक संपन्न घर में होना चाहिए।
कुछ देर की बातचीत के बाद समीर ने गाडी के सारे कागजात रोहित को सौंप दिए और बोला-सॉरी यार, आज चाय के अलावा मैं तेरी कोई और खातिरदारी नहीं कर पाउंगा। तू इतने दिनों बाद आया है मन तो बहुत था पर क्या करुं, तेरी भाभी तो बैंक गई है और मुझे भी निकलना है, थोडी जल्दी है।
- कोई बात नहीं फिर कभी आऊंगा तब जम के खातरी कर लेना। हां तूने तो कुछ खा लिया ना?
- हां कुछ दूध कॉर्नफ्लैक्स लिए थे। खाना कैंटिन में खाऊंगा। आज नीता को जल्दी थी इसलिए खाना नहीं बना सकी।
रोहित ने घर पडे सामान पर नजर डाली। घर में पडी महंगी-महंगी वस्तुएं अपने अकेलेपन और मालकीन की उपेक्षा की कहानी कह रही थी। दरवाजे पर जमीं धूल दीवारों पर लगे जाले भी उसकी व्यस्तता की दास्तां बयान कर
रहे थे।
समीर की नजरों से रोहित का यह निरीक्षण छुप
न सका।
वह बोला-यार कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पडता है। नीता बैंक के कामों में इतनी व्यस्त रहती है कि चाह कर भी घर की साफ-सफाई और साज-सज्जा की ओर ध्यान नहीं दे पाती है। कई बार तो उसे स्वयं के खाने-पीने का होश भी नहीं रहता। सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक खाने-पीने के बहुत से काम मुझे ही निपटाने पडते हैं। पर इसमें किसी का दोष भी नहीं है क्योंकि ऐसी जिंदगी मैंने स्वेच्छा से ही कुबूल की थी।
परंतु अब कभी-कभी ऐसा लगता है कि आर्थिक संपन्नता वह मृग-मरीचिका है जिसमें दूर से तो सर्वत्र जल ही जल दिखाई देता है परन्तु पास आकर इंसान और
अधिक प्यासा हो जाता है और यह प्यास ऐसी है जो कभी नहीं बुझती।
- अरे यार बहुत देर हो गई अब चलूं वरना ऑफि स में बॉस का लेक्चर सुनना पडेगा, रोहित ने एक नजर अपने पुराने मोबाइल पर डालते हुए कहा जिसे वह संकोच से अपनी जेब में छिपाए हुए था।
ऑफि स में लंच हो गया था। रोहित ने अपना लंच बॉक्स खोला। कोफ्ते की सब्जी, अंकुरित मूंग और लौकी का रायता था यानि सब कुछ उसकी पसंद का। रोहित की भूख और भी उग्र हो गई। वह खाने पर टूट पडा और खाना खाकर उसने रोमा को कॉल किया।
- रोमा आज खाना बहुत स्वादिष्ट था। मजा आ गया स्वाद-स्वाद में कुछ ज्यादा ही खा गया। किसे शेयर करने का मन ही नहीं हुआ। सच में इंसान बहुत स्वार्थी होता है। बोलते-बोलते आज वह भी समीर की तरह दार्शनिक हो
गया था।
- इसमें स्वार्थ कैसा? यह तुम्हारा अपना खाना था, तुम्हारा अपना सुख। तुम्हें उसे भोगने का पूरा-पूरा हक था। खैर अब ज्यादा बातें मत बनाओ और पेट भर गया तो मन लगाकर काम करो। हां शाम को जल्दी घर आने वाली बात याद रखना। जानते हो आज डिनर में भी तुम्हारे लिए सरप्राज-
डिश है।
और शाम को जब समीर अपनी होंडा-सीटी में किसी बढिया रेस्टोरेंट में खाना खाने जा रहा था, रोहित अपने पुराने स्कूटर पर घर जाते समय गुनगुना रहा था- टूटा-फूटा सही चल जाए ठीक है। ?
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