नाजो

चाँद ‘दीपिका’


पर्वतमालाओं से घिरे गाँव थन्नामंडी में बस जब खडी हुई तो पहाड की कन्दील पर चांदी का शमादान जल चुका था। चांद की पीली रोशनी में समूचा गाँव किस्से कहानियों में वर्णित परीदेश की भाँति नजर आ रहा था। पानी में डूबे धान के खेतों से झांकता तारों भरा आकाश रत्नजटित गलीचे से कहीं अधिक अप्राप्य और अमूल्य प्रतीत हो रहा था। परिलोक के संगीत सा मादक स्वर बिखराते दरिया का अपना ही अन्दाज था। उसे देखकर किसी अलबेले, अलमस्त पथिक की स्मृति बरबस हो आती थी।
कहते हैं दीपक तले अन्धेरा। शैल शिखिर के नीचे सचमुच अन्धेरा था। प्रकाश ने अभी सडक पर पग धरा न था। आश्रयस्थल ढूँढने की चिन्ता न होती तो मेरा भावुक मन सीमेंट की छोटी सी सीट पर बैठ कविता-गजल-शैर के मोती बीन कर ही उठता।
सडक पर अटैची उठा निपट एकाकी चलना मेरे लिए किसी रोमांचकारी अनुभव से कम न था। दूर एक साया चला आ रहा था। समीप हुआ तो देखा एक लडकी थी।
‘‘यहाँ लडकियों के स्कूल की सैकेन्ड मिस्टरेस के घर पहुँचा सकोगी?’’मैंने उसे सम्बोधित करके एक प्रश्न किया।
सडक को सिजदा करती उसकी दृष्टि सहसा ऊपर उठी सिर से लेकर पैर तक मेरा निरीक्षण कर उसका मुँह खुला ‘‘मैं तो किसी को जानती नहीं। संभवतः अम्मी को पता हो।’’
अन्धे को चाहिए दो आंखें वो जैसी ही मिली मैं जनशून्य सडक पर उस अपरिचित लडकी के साथ चल पडी। सडक के एक ओर हटकर पत्थरीली गली थी। उसे पार कर वो एक अन्य संकरी गली में होती हुई किसी के आंगन में जा पहुँची। हमारे पैरों की आहट सुन खट् से ब्लब जला फिर एक स्त्री छोटे से शिशु को कंधे से सटाये आई और मेरे चेहरे पर दृष्टि पडते ही चकित हो बोल उठी-आभा दीदी, आप।
अपना नाम अपरिचित के मुख से सुनकर मैं हतप्रभ रह गई। स्त्री ने मेरे निकट आकर कहा-‘‘पहिचाना नहीं दीदी? मैं अन्दलीप हूँ। पुंछ स्कूल की आपकी चहेती छात्रा।’’
पुंछ स्कूल का नाम सुनकर मन पर से विस्मृतियों की पडी धुंध तनिक छटी मैंने अन्दीलीप को पहिचान मुस्कुराते हुए कहा-‘‘शैतान लडकी तूँ यहाँ और इस हाल में।’’
अन्दलीप हंस पडी-‘‘आज वर्षों पश्चात् इधर?’’
‘‘अपने गाँव के अन्नजल से पूछ लो जिसने मुझे जम्मू में टिकने न दिया।’’
‘‘तो आप हैडमिस्टरेस बन गई।’’
फिर एकाएक अन्दलीप जैसे सोये से जागी-‘‘मेरे मुँह में खाक। मेरी मैडम सफर करके आई हैं, मैं हूँ कि बकर बकर बोले जा रही हूँ।’’
इससे पूर्व में कुछ जान पाती उसने मुझे खींच भीतर बिठा दिया।
‘‘इस समय विदा दो अन्दलीप। सुबह मिलेगी।’’
‘‘मेरे होते हुए आपकिसी के घर ठहरेगी। न
बाबा न।’’
हडबडी में मेरी अटैची बाहर पडी रह गयी थी। अन्दलीप ने आवाज देकर कहा-‘‘नाजो, दीदी का अटैची भीतर लेती आ।’’
लडकी संभवतः बाहर मेरी प्रतिक्षा कर रही थी। अपना नाम सुनकर वो अटैची उठा भीतर चली आई।
परदेस में आवास की व्यवस्था न केवल अन्दलीप ने अपने ही घर में कर दी अपितु घर-गृहस्थी के योग्य उसने छोटी मोटी वस्तुएँ भी प्रयत्न कर जुटा दी। नया-नया अपग्रेड स्कूल में कार्य की भरमार, आने जाने वालों का तान्ता ढंग से खाना बनाने और खाने का समय ही न मिल पाता। फलस्वरुप ज्वर ने मुझे आ घेरा। सप्ताह भर के ज्वर ने मुझे इस कदर तोडकर रख दिया कि दर्पण में चेहरा देखकर भी भय लगने लगा। अन्दलीप कभी मुझे संभालती तो कभी अपने नन्हें बिग्रेड-लडका-लकडी से जूझती रहती। उसे त्रिशंकु की भांति-अधर में लटका देख मैंने कहा था-‘‘मैंने तो चारपाई पकड रखी है। तुमने पकड ली तो कयामत आ जायेगी। स्टाफ भी बेचारा कब तक साथ देगा तुम कहीं से लडकी का प्रबन्ध कर दो।’’
दिन बीते। एक दिन अन्दलीप ने आकर कहा-‘‘आभा दीदी, यह नाजो आपका काम कर देगी। यदि आप परहेज न करें तो यह आपका खाना भी बना देगी। अन्यथा कोई और हल सोच के रखूँगी।’’
तब अन्दलीप के पीछे लाज से दुहरी हो जाती नाजो को मैंने आंख भर कर देखा था। साधारण नैन नक्श, मुरझाया पीला चेहरा, बुझी-बुझी आंखें, जीर्ण पर स्वच्छ वस्त्र, सिर पर दुपट्टा मैंने नाजो को देख शोख स्वर में कहा था-‘‘तुम परहेज की बात कहती हो अन्दलीप अरे नाजो के नाजुक हाथों की चाय हो जाये तो मैं हैडमिस्टरेसी भी कुरबान कर दूँ।’’
अन्दलीप ठहाका मार हंस पडी थी। मैंने पलकों के कोरों से देखा नाजो के सख्ती से भिंचे पत्थरीले होंठों पर हंसी की धूप उतर आई थी।
हॉल की भांति विशाल कमरे में पार्टीशन कर मैंने किचन कम डायनिंग रुम का रूप दे दिया था। पर्दे के पीछे खुसर पुसर तथा बर्तनों की उठापटक की मन्द आवाजें आती रही। फिर अन्दलीप ने बाहर आकर कहा-‘‘अच्छा तो अब मैं चलूं दीदी।’’
‘‘अरे ओपनिंग सेरिमनी का आनन्द तो उठाती जाओ,’’ मैंने आग्रह किया।
उसने चलते-चलते कहा-‘‘मेरे सर्टीफिकेट (बच्चों) का गुलगपाडा (शोर) सुन रही है न दीदी। एक सैकेन्ड भी और जो रुकी तो कोर्ट मार्शल खडे-खडे हो जायेगा।’’
नाजो ट्रे में चाय ले आई थी। मैंने कप उठाकर कहा-‘‘अन्दलीप तो चली गई। बाकी चाय तुम पी लेना।’’
मेरे देखते नाजो ने दरिया से पानी ला बाल्टियां भरी। चिरकाल से अस्त-व्यस्त कमरे को ठीक किया। वस्त्र बदलने में मेरी सहायता की। बिस्तर की चद्दर बदली। मनीप्लांट ठीक किया। गुलदस्तें में कहीं से नरगिस के ताजे फूल लाकर रखे फिर मैले कपडों का गट्ठर अलमारी में रख किचन की सुध लेने चली गई।
कमरे के प्रत्येक कण में नाजो के कुशल हाथों की छाप स्पष्ट झलक रही थी। बिस्तर पर लेटे मुझे लग रहा था जैसे किसी ने धीरे से मुझे पुष्पों की शैय्या पर लिटा दिया हो।
नाजो के नाजुक कन्धों ने मेरी नन्ही सी गृहस्थी बडी तत्परता से संभाल ली थी। खाना-पीना ओढना सब उसे पता था। अलमारी में मैंने उसकी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कुछ रुपये रख छोडे थे। वो वहीं से निकाल लेती। नया स्कूल, काम की भरमार। स्कूल का काम निपटाते दस बज जाते। कभी स्कूल का क्लर्क भी आ जाता। नाजो मुझे खाना खिला रात का दूध दे घर जाती। किसी दिन अधिक बिलम्ब होने लगता तो मैं किचन में बैठी नाजो को खाना खा घर चले जाने के लिए कह देती।
एक दिन गजब हो गया। स्कूल से लौटी तो मारे थकान के अंग-अंग टूट रहा था। मारे भूख के सिर दर्द भी हो चला था। द्वार पर नाजो प्रतिक्षारत खडी थी। मैंन पर्दा हटा पर्स कुर्सी पर फेंका और अरर धम करती तख्तपोश पर ढेर हो गई।
‘‘नाजो सबसे पहले मुझे चाय का कडक कप बना दो। फिर उसके बाद खाना ले आना।’’
‘‘नाजो को आदेश दे मैंने दिवार पर लगे दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखा बुखार के कारण मुँह जरा सा निकल आया। मैंने स्वयं से परिहास किया-वाह मोटे, क्या चेहरा निकल आया है। अपने प्रतिबिम्ब को आंख मार मैं सिर दर्द से कराही-हाय। खेल-खेल में मैं अपने प्रतिबिम्ब को और मेरा प्रतिबिम्ब विचित्र भाव भंगिमा एवं मुद्राये बना चिडाता रहा। नाजो थी कि चाय तो क्या पानी का गिलास तक न लेकर आई।
‘‘नाजो-’’, मैंने पुकारा, ‘‘यह चाय बन रही है अथवा कुश्ती लडी जा रही है।’’
‘‘जी’’
नाजो का स्वर समीप से आता सुन मैंने करवट बदलकर देखा नाजो अपने स्थान पर अविचल खडी थी। सिर दर्द से फटता पा मेरी सारी शोखी पल भर में काफूर हो गई। मैंने दर्द को पीते हुए कहा-‘‘यह क्या नाजों अभी
खडी हो?’’
नाजो मौन खडी रही। भूख से बेहाल हो मैंने कहा-‘‘चाय नहीं तो खाना ही ले आओ। सिरदर्द और भूख के मारे जान निकल रही है।’’
‘‘ठण्डी चाय और खाना सूखने के लिए मुझे नहीं बनाना है। यह फाईल रजिस्टर पडे हैं ना इन्हें चबा कर भूख मिटा लीजिये।’’
नाजो का अधिकारपूर्ण स्वर और सुप्त ज्वालामुखी से निकलता लावा मेरे लिए आश्चर्य से कम न था। मेरी आंखें तो जैसे फटी रह गई। मेरे खाने का परदेस में बैठी छोटी सी लडकी इतना ध्यान रखेगी मैंने स्वप्न में सोचा तक न था। मैंने अविश्वास में भर नाजों की ओर देखा उसका चेहरा पहले की भंाति सपाट एवं भावविहीन था। दया माया करुणा का वहाँ स्थान तक न था।
बात किसी भी प्रकार बनती न देख मैंने अनुनय भरे स्वर में कहा-‘‘सॉरी,नाजो भूल हो गई। काम के कारण खाना-पीना नहीं हो पाता है।’’
‘‘आपको पता है न डाक्टर ने क्या कहा था आराम और समय पर खाना जरूरी है।’’ उसने मुझे डपट कर कहा।
‘‘नाजो प्लीज........’’ मैंने कान पकडे।
उसके आंसू छलक आये। मुझसे छिपाती वो भाग खडी हुई।
एक क्षण भी व्यर्थ में गवाये नाजो पर्द के पीछे गर्मागर्म चाय के साथ खाना भी ले आई। खाना खाकर मुझे जैसे अद्भुत तृप्ति मिली। पलके मून्द सोने का प्रयास कर ही रही थी कि किसी की अंगुलियों ने बालों की राह मांस को छुआ। मैंने अधखुली आंखों से देखा नाजो मेरे सिर में तेल से हल्की-हल्की मालिश कर रही थी। रोने से उसकी आंखें लाल हो गई थी।
उस दिन के पश्चात् नाजो मुझे परिवार के सदस्य की भांति प्रिय लगने लगी। उसकी छोटी सी बात मुझ से टाली न जाती। कामकाज बढता जा रहा था। मुझे काम करते समय लग जाता तो वो खींझ कर मेरा चश्मा उतार अलमारी में बन्द कर देती। फायल या पत्र को एक ओर पटक मेरे हाथ में चाय का कप पकडा देती। किसी दिन थकान से चूर हो मैं सो जाती तो आगन्तुकों को मेरे बिन बताये ही बाहर से भेज देती। चपरासी और ऑफिस ट्रे (दफ्तर की सामग्री रखने वाली नन्ही सन्दुकची) से उसे इतनी घृणा थी कि उसका बस चलता तो तो वो उन सबको चलता कर देती।
कई दिनों से वर्षा लगातार बरस रही थी। स्कूल से घर घर से स्कूल चक्करघिनी की भांति (लट्टू)घूम कर बोर हो चली थी। बादल तनिक छितराये तो प्यारी गुनगुनी धूप निकल आई। घर से निकलने से पूर्व मुझे चाय की प्रतिक्षा थी। नाजो अब आती ही होगी। यह सोच मैंने ट्रांजिस्टर का स्विच ऑन कर दिया। सदाबहार पुराने गाने आ रहे थे आल इन्डिया रेडियो से। बहुत दिनों के पश्चात् मस्ती और आनन्द के क्षण आये थे। मेरा मन मयूर नाच उठा था। किसी की आहट से मस्ती भरा तिलिस्म टूटा था।
‘‘तुम्हारी प्रतीक्षा में छोटी अन्तडिया बडी को हडप कर गई और एक तू है कि अब आ रही हो नाजो।’’
पचास-साठ वर्ष की मेहन्दी रंगे लाल बालों वाली महिला को धडधडा कमरे में आते देख अगले शब्द मेरे मुँह में रह गये। मुझे झेंपता वो औरत अचकचा कर बोली-‘‘मेरी लडकी सबीहा आफ स्कूल में पढाती है मैडम जी। उसके मुँह से आपकी तारीफ सुना करती थी। आज आपकी खिडकी खुली देखी तो मिलने चली आई।
उसे कुर्सी पर बैठने को कह मैंने गाउन उतार वस्त्र पहिन लिये। मुझे तैयार होता पा वो उठ खडी हुई आप घूमने के लिए जा रही हैं। मैं भी चलती हूँ।
वर्षा की बून्दों ने पडोसी की टीन की छत पर थिरकना आरम्भ कर दिया था। धूप को बादलों की ओट सिर छिपा भागते देख मैंने कहा-‘‘अब इस बारिश में घूमना फिरना कहाँ हो पायेगा। आप आई हैं तो कुछ देर बैठ जाईये आपकी सोहबत में मेरा समय भी कट जायेगा।’’
औरत को कुर्सी पर बैठने को कह मैं चाय
बना लाई।
‘‘यह चाय की क्या जरुरत थी?
मैंने चाय का कप उसकी ओर बढाते हुए कहा-‘‘चाय नाजो ही बनाती है। आज न जाने क्या हुआ? दोपहर की गई अभी लौटी नहीं है।’’
चाय की चुस्कियों के मध्य छिटपुट दुनिया जहान की बातें चलती रही। औरत भी घाघ थी। बातों ही बातों में उसने न केवल मेरे विषय में आवश्यक जानकारी एकत्रित कर ली, अपितु घर-परिवार की कहानी भी मुझे सुना दी।
‘‘देखो, बेटी सबीहा का घरवाला तहसीलदार है। खाते पीते खानदान घर का लडका है। मेरी फूटी किस्मत लडकी को एक आंख भाता नहीं है। कहती है नौकरी छोड कहीं दूर चली जाऊँगी।
फिर औरत ने दुपट्टे से आंसू पोंछ कहा-अब आप ही कुछ कीजिये मैडम जी। लडकी आप को बहुत मानती है। इसका घर बस जाये तो मुझे सकून (शान्ति/चैन) मिले।
तभी दूर कहीं बिजली गिरी। ट्रांजिस्टर का स्विच ऑफ कर मैं पुनः कुर्सी पर आ बैठी। ‘‘नाजो आपसे घुलमिल गई लगती है।’’ औरत बोली।
‘‘परदेस में किसी को तो अपना बनाना पडता है अम्मा। जैसी मेरी बेटी सारिका वैसी नाजो।’’
इससे पूर्व मेरा मुहँ खुले वो अपनी भूल सुधारते हुए बोली-आप तो ठहरी परदेसी। कहीं आई गई भी तो नहीं। फिर जानेगी कैसे? हमें दो वर्ष तक खुद पता न चला।’’
मैंने असमंजस्य में उसकी ओर देखा।
‘‘नाजो कुआरी मां है।’’
अनपेक्षित सत्य का उद्घाटन होते ही मैं चौकीं।
‘‘दो साल पहले घर में सुपरवाईजर किरायेदार रखा था। उसी से मुँहकाला कर लिया मुँहजली ने। सुपरवाईजर एक दिन बिन बताये गायब हो गया। अफवाह उडी की नाजो को लडका पैदा हुआ है। जिसे खुद जाने कहीं फैक दिया गया अथवा गला घोंट कर मारा डाला गया।’’
मच्छर - मक्खियों सी भिनभिनाहटे मेरे कानों में चिरकाल तक गूँजती रही। फिर लगा जैसे सब समाप्त
हो गया।
‘‘दीदी................’’
नाजो का स्वर सुन मैं जैसे सोकर जागी। खाली कुर्सी रोशन कमरा, तख्त पोश के साथ वाली दिवार का सहारा लेकर खडी रुआंसी नाजो। मुझे बार-बार पलके झपकाता पा वो भयभीत स्वर में बोली-‘‘आपको क्या हुआ दीदी? अन्धेरे में बैठी रही। लाईट तक नहीं जलाई?’’
‘‘ वो सबीहा की अम्मी............’’। बडी मुश्किल से मेरा कंठ स्वर फूटा।
‘‘मैं जब यहाँ आई तो कमरे में कोई न था। केवल आप ही तो कुर्सी पर बैठी थी। खाना बनाकर कब की अवाजें दे रही हूँ। आप है कि बोल ही नहीं रही।’’
नाजो की उडी-उडी रंगत, रोया चेहरा, अपना दुख भूल मैंने उसे अपनी ओर खींच स्नेहिल स्वर में पूछा-
‘‘क्या हुआ?’’
उसके बोलने से पूर्व पर्दा हिला, पर्दे के आरपार कुछ मन्द स्वर में बात हुई। फिर पर्दा ठीक कर नाजो
चली गई।
उसके जाते ही मैं भी झपट कर बाहर निकली। आंगन में अन्दलीप खडी थी। मैंने पूछा-‘‘नाजो के यहाँ सब कुशल तो है?’’
‘‘उसकी अम्मी की तबीयत बिगड गई है। शायद उन्हें हास्पिटल ले जाना पडे।’’
अन्दलीप नाजो के यहाँ जा रही थी। मैं भी उसके साथ चल पडी। छोटी सी गली पार कर टीन की छत पडी कोठरी, में जब मैंने पग रखा तो वहां जीवन और मृत्यु में सांप नेवले की भांति संघर्ष चल रहा था। रोगिणी की जीर्ण शीर्ण शय्या के पास दो भोले-भाले बच्चे सहमे खडे थे। पैरों के पास खडी थी नाजो जो असहाय खडी अपना सर्वस्व लुटता देख रही थी।
अन्दलीप को ढूँढता उसका पति शमशाद चला आया था। मेरे कहने पर डॉक्टर को बुला लाया। इन्जेक्शन दवाईयां रात गये चलती रही। रोगिणी की दशा संलते ही डॉक्टर फिस लिये बिना शमशाद सहित चला गया। मैंने अन्दलीप को भी साथ भेज दिया। उन्हें विदा कर मुडी ही थी कि पैर चौखट पर रुक गये।
‘‘रोज कहती हो आज पेट भर रोटी दूँ पर देती फिर भी नहीं।’’
‘‘शी......चुप्प........’’
‘‘हमें भूख लगी है।’’
तडाक............... थप्पड की आवाज गूँजी। बच्चों के रोने के साथ कराहने की आवाज आई या खुदा मुझे मौत दे। बच्चों का भूख से बिलखना मुझसे और देखा नहीं
जा रहा।
चौखट पर अधिक देर तक मुझे खडा न रहा गया। भीतर बच्चे सिसक रहे थे। अपना दुख छिपाने के लिए रोगिणी ने आँचल से मुँह ढक लिया। नाजो अपराधिनी बनी एक और सिर झुकाये खडी थी। मैंने उसके समीप जाकर कहा-‘‘रोजीला के साथ ले जा। वहाँ कमरे में फल, दूध-बिस्कुट खाने का सामान लेती आ। भूखे पेट तो यहाँ खडे नहीं हुआ जा रहा है।’’
खाने के सामान के साथ टिफिन में खाना अन्दलीप ने भी भेजा था। भूखे बच्चे मिन्टो में खाना चट्ट कर मां की चारपाई पर अलग बगल लुडक कर सो गये। नाजो की अम्मी को दूध का कप पकडा मैं नाजो की ओर मुडी-‘‘चली अब तूँ ही कुछ खा ले।’’
ना-नुकर करते कौर हाथ में पकडते ही नाजो की आँखें बरस पडी। मैने थपथपा दिलासा देते हुए कहा-‘‘दुःख मुसीबत किसके यहाँ नहीं आती पगली। साहस से काम ले। गर्दिश जैसे आई है चली भी जायेगी।’’
जैसे तेसे कौर मुँह में ठूंस नाजो उठ खडी हुई आपको तकलीफ हुई दीदी। आईये मैं आपको घर छौड आऊँ। आपने कुछ खाया पिया भी नहीं।
मैंने उसे खींच कर अपने समीप बिठाते हुए कहा-‘‘रात काफी बीत चली है अब तू सोजा। वैसे भी शाम की चाय भारी हो गई थी। तू चिन्ता ना कर अम्मी को मैं दवा
दे दूँगी।’’
किंचित काल के पश्चात् नाजो मेरी कुर्सी के पास सो गई। लैम्प की पीली रोशनी में नाजो का चेहरा देवताओं की भंाति चमक रहा था। नाजो जैसी स्वाभिमानी और मासूम बच्ची को अवश्य ही उस नीच सुपरवाईजर ने उसके भोलेपन का लाभ उठा अपनी हवस का शिकार बनाया होगा। आह, नाजो जैसी ने जाने कितनी ही अबोध लडकियाँ आदमखोर भेडियों के गुनाह का बोझ अपने कन्धों पर लाद कर जी रही होंगी। खेल कूद-शरारतों के दिन हवस की आग में झोंकने वालों को संसार-समाज कब तक बख्शता रहेगा। क्या
उन्ह कभी दण्ड नहीं मिलेगा। विचारों में डूब मेरी हूँक निकल गई।
बुडापे का बोझ जवान कन्धों पर उठा चलती नाजो को देख मेरी आंखें भर आती। स्टोव से निकलती नीली लौ से उसका अन्तर सुलग उठता। पतीले में सूं सूं पानी करता तो लगता मानो उसके भीतर लावा उफन रहा हो। घृणा, आऋोश, विद्रोह, तिरस्कार और न जाने कैसे-कैसे भाव उसके चेहरे पर नाचा करते। चकले पर रोटी बेलते उसके हाथ मशीन के घूमते चक्के लगाते। कलछुल चलता तो लगता जैसे लड झगड रही हो। छुट्टी के दिन मैं वहीं किचन में बिछी दरी पर लेटी नाजो की बनती बिगडती मुख-मुद्राओं को मूकदर्शक बन देखा करती। चित्रकार नहीं थी अन्यथा रंग और तूलिका के सहारे उसके दर्द को दर्शाने वाले ऐसे दुर्लभ चित्र बनाती कि लोग मोनालिजा की अनुपम कृति को भी भूल जाते।
नाजो के अधर-अधर न होकर जैसे एक दूसरे के ऊपर टिका कर रखी शिलायें थी। क्या मजाल कि एक आध वाक्य के अतिरिक्त कोई अन्य वाक्य भी बाहर निकल पाता। उसकी खामोशी से कभी-कभी तो मुझे भय तो कभी खींझ भी हो जाती थी। दिल करता उसके मन मस्तिष्क पर पडा आवरण खींच उसे आजाद कर दूँ।
दो मास का ग्रीष्मावकाश परिवार संग बिता जब मैं थन्ना मंडी पहुँची तो नाजो ने वर्षों बिछुडी बेटी की भांति मेरा स्वागत किया। मेरा अटैची उठाये वो भी सडक पर ऐसे चलती गई जैसे हाथ में अटैची न हो गुलाब का फूल लिये जा रही हो।
उस रात पेट भर खाना खिला दूध का गिलास हाथ में थमा वो भागी नहीं अपितु मेरे तख्तपोश पर लेटते ही वो धीरे-धीरे मेरे बालों में अंगुलियों से कंघी करती रहती।
‘‘नाजो मेरी अटैची में पडे दो बडे से पैकेट निकाल लाओ।’’ मैंने सिरहाने के नीचे से चाबियाँ निकाल उसे पकडाते हुए कहा। नाजो अटेची से पैकेट निकाल लाई। मैंने उठकर एक पैकेट का कागज उतार उसमें से दो सूट निकाल उसके हवाले करते हुए कहा-‘‘अपनी मनपसन्द का कोई एक सूट पहन कर तो दिखाओ।’’
उसने दोनों सूट उठा टेबल पर रख दिये। उसे सिर झुकाये देख मैंने मीठे स्वर में डांटा सूट रखने के लिए नहीं पहने के लिए दिये हैं।’’ उसने संकोच में भर कर कहा-‘‘आगे आफ अहसान कम है जो यह उठा लाई। मेरे पास आफ दिए बहुत कपडे हैं आप इन्हें सारिका दीदी के लिए रहने दीजिये।’’
‘‘तूझे हर काम में अहसान नजर आता है
प्यार नहीं।’’
मुझे नाराज होती देख नाजो बौखला गई। उसे बोलता न पा मैंने करवट बदल ली। कुछ पल निस्तब्धता छाई रही। फिर नाजो की ठन्डी उँगलियों ने मेरी पीठ का स्पर्श जैसे ही किया मैने उसकी ओर मुड कर देख हरे रंग के फूलदार पिन्ट में नाजो का चेहरा चमेली के फूल की भांती निखर आया था। उसके आनन पर स्नेहभरा चुम्बन जड मैंने दूसरा पेकेट खोल उसकी ओर बढाया यह भी तुम्हारे लिए।
नाजो की अँगुलियाँ पुस्तकों के सैट पर फिरती रही।
फिर वो स्वतः ही बोल पडी-‘‘अब यह मेरे किस काम की। मैंने तो पढना कब का छोड दिया।’’
‘‘पढना छोड दिया तो क्या हुआ आज अभी इसी समय से आरम्भ कर लो।’’
नाजो बोली नहीं। उसके घर की दयनीय अवस्था को याद करते हुए मैंने कहा-‘‘तुम्हारी अम्मी को शाहदरे स्कूल में नौकरी मिल गई है। रोजीला को भी छात्रवृति मिल जायेगी। रही तुम्हारी बात तुम भी तो अपना जेब खर्च निकाल लेती हो। अब सोचो-वोचो मत। कल मेरे साथ स्कूल चली चलो।’’
‘‘मेरा स्कूल जाना न हो सकेगा दीदी’’।
‘‘मैं पूछती हूँ क्यों’’?
‘‘आगे ही लोग बातें करते हैं।’’
‘‘उनका कहना सच्च है?’’
‘‘हां’’
उसके उत्तर से मैं स्तब्ध रह गई। मैंने तडप कर कहा-‘‘तिस पर भी तूँ चाहेगी कि दरिन्दे तेरी कमजोरी का लाभ उठा तुझे लूट जाते रहे।’’ नाजों की आंखों से हिस्र चमक उभरी पर प्रतित्रि*या में एक शब्द भी उसके मुँह से न निकला। मैंने पहली बार कडक कर कहा-‘‘जहन्नुम में जा नाजो। आज से तेरा मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।’’
वो रात मैं क्रोध से जलती भुनती रही। सुबह नाजो ने बैड टी दी तो मैंने पी नहीं। सुबह का नाश्ता और दुपहर का खाना भी पडा सुखता रहा। उससे बिना बोले मैं जहाँ-जहाँ घूमती रही। सांझ गये घर जो लौटी तो आशा के विपरीत नाजो ने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया। नये सूट में उसका चेहरा खिल खिला लग रहा था। मुझे बोलता न पा वो अलमारी से पुस्तकों का सैट और कापियां निकाल लाई।
‘‘नाराज ही रहेगी। इन पर मेरा अपना नाम
अपने हाथों से लिख कर नहीं देगी।’’ उसन मनुहार करते
हुए कहा।
नाजो के शब्दों से मेरा क्रोध क्षण भर में काफूर हो गया। फिर खाने की थाली, चाय की प्याली एक और सरका मुझसे उठा न गया।
नाजो न तो स्कूल गई और नहीं मैने विवश किया। खाली समय जैसे ही मिलता मैं उसे पढाने बैठ जाती। रात जब मैं किसी मैगजीन (पत्रिका) के पन्नों में खोई होती वो मेरे पैरों के पास बैठी अपना पाठ याद कर रही होती। छह महीने नाजो ने न दिन देखा और न रात देखी। सैर सपाटा, मिलना जुलना सब छोड दिया। स्कूल का काम अब मैं स्कूल में ही निपटा आती।
नाजो को परीक्षा भवन में बैठा पा लोगों को कम आश्चर्य न हुआ था। बिजली गिरी थी उनके दिलों पर। मुझे भी मना किया गया था पर मैं रुकने वाली कहाँ थी उसके लिए मैं जमाने भर से जूझने को उद्यत हो उठी थी।
पाँच वर्ष पश्चात मेरी ट्रान्सफर का आर्डर आया था। मुझे विदा करते समय उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। गला भर आया था। मैंने प्यार से नाजो का कांपता हाथ दबा कर कहा था-‘‘नाजो पढना मत छोडना।’’
जीवन की राह पर चलते कितनी ही पंगडंडियां और मोड आये। उमडती घटाओं, नरगिसी फिजाओं और शैल शिखरी से घिरी पुंछ की धरती ने मुझे आवाज दे जैसे ही बुलाया नाजो की स्मृति के बुझे दीप फिर रोशन हो गये। उसे थन्ना मंडी स्कूल में छोडे मुझे आठ वर्ष हो चले थे। संसार परिर्वतन के लिए एक सेकेन्ड ही पर्याप्त होता है फिर यहाँ तो वर्षों का अन्तराल था। नाजो नौकरी करने लगी थी इसकी मुझे तृप्ति थी। ट्रान्सफर और परमोशन साथ हुए थे। अतीत की स्मृतियों के पन्ने पलट रही थी कि सताईस वर्ष की सुन्दर युवती को बडे ही प्यारे बच्चे के साथ खडे पाया। इससे पूर्व मैं संभल पाती युवती ने झुककर मेरे पैर छू लिये।
‘‘यह.......... यह आप.........।’’
‘‘जिसकी एक झलक पाने को मन तडपता रहा। मनौती मनाता रहा आज उस देवी को पा मेरा सिर झुके नहीं यह कैसे हो सकता है?’’ उसने एक बार फिर से पैरों में सिर झुका मेरे मुख पर स्नेह चित चुम्बन अंकित कर दिया।
मुझे चकित खडा छोड वो बच्चे की ओर मुडी-‘‘घर पर मासी-मासी की रट लगा रहे थे अब दुआ सलाम
भी नहीं।’’
लडके ने समीप आ मुझे सलाम की और फिर लान में खिले फूलों पर उडती तितलियों पकडने बाहिर भाग गया।
मुझे हैरान परेशान देख युवती शोख स्वर में बोली-‘‘कभी किसी के नाजुक हाथों की चाय पीने को लोग अपनी हैडमिस्टरेस कुरबान करने को तैयार हो जाते थे
आज हायर सैकेन्डरी स्कूल की प्रिसीपल बन पहिचानते तक नहीं है।’’
कुदरत रंग रुप भले ही बदल डाले आवाज तो छिपाते छिपने वाली नहीं है। मैंने युवती को बाहों में भर भावातिरेक स्वर में कहा-‘‘नाजो मेरी बच्ची, मेरी बहिन।’’
अगले ही पल नाजो और मैं दो अन्तरंग सखियों की भांति बैडरुम में लेटी थी। नाजो का स्वर मिलराब बन मेरी हृत वीगा को झुनझुना रहा था-आफ चले जाने के पश्चात मैं आफ पत्रों की रोशनी में आगे बढती रही। बी.ए. करने के पश्चात बी.एड. और फिर एम.ए. भी कर ली। छिटपुट स्थानों से ब्याह के पैगाम भी आये। पर मैंने हामी न भरी। नानी अपने गाँव के सरपंच के लडके के लिए पैगाम लाई थी। सुहेल मेरा बी.एड. का सहपाठी था, हर प्रकार से योग्य लडका था। पर मैंने यह रिश्ता भी ठुकरा दिया। मां ने मुझे वास्ते आग्रह किये। नानी ने कोसा पर मैं हठ पर
अडी रही।
राजौरी में काम से गई थी। बस से लौटी तो झकाझक सफेद कपडों में सुपरवाईजर को मैंने पहिचान लिया। सवारियां उसे सलाम बजा रही थी। मेरे पीछे बैठी सवारी किसी को बता रही थी कि अब वो बी.डी.ओ. बन गया है। कैसी बिडम्बना थी कि मुझ अबोध लडकी के साथ उसने गुनाह किया था और जिल्लत मैं उठा रही थी। मैं अन्धेरों में बैठी सिसक रही थी और वो सरे आम सीना ताने चल रहा था। पुस्तक में मुँह छिपा सोने का अभिनय करती हुई मैं गुपचुप रोती रही। अपनी किस्मत को कोसती रही।
थन्ना मंडी पहुँचने पर बस लगभग खाली हो चुकी थी। ब्रीफकेस उठा मुँह में दबा सिगरेट बस के फर्श पर मसल जैसे ही वो बस से उतरने को हुआ मैंने पीछे से धक्का दे दिया। रात भर वर्षा होने के कारण सडक के किनारे बना बडा सा गड्ढा पानी से भर चला था। वो वहीं जा गिरा। प्रयत्न कर जब वो बाहिर निकलने को हुआ मैने उसे बालों से पकड पकड पानी में डुबोते कहा-गुनाह कर अपना दोष औरों पर लाद भाग जाना कितना आसान है। तुमने सोचा नाजिमा को बदनामी के डर से घर वालों ने मार डाला होगा। अथवा शर्मिन्दगी में डूब उसने अपना मुँह बन्द कर लिया होगा। देख आखें फाड देख नाजिमा मरी नहीं तुम्हारे गुनाहों का बदला लेने को अब भी जिन्दा है। वो आखें मिच मिचा कर मुझ पहिचानने का प्रयास कर रहा था। पर मैं तो चण्डी बन गई थी। मेरी सैडिलों की मार ने उसके होश गुम कर दिये थे। स्त्री पुरुषों की भीड से लग रहा था थन्ना उमड आया था। एक आध राहगीर बीच बचाव हेतु आगे बढे थे मैंने चिल्लाकर उन्हें दूर ही रोक दिया। और दीदी, मै पत्थर से उस फीनियर नाग का सिर ही कुचल/फोड कर दम लेती कि तभी न जाने कहाँ से सुहेल ने मेरी बांह पकड कहा क्रोध में आकर यूँ किसी गुनाहगार की जान लेने पर उतारु हो जाया करते हैं। पूरा थन्ना इस सख्स पर थूँ-थूँ कर रहा है। अब सारी उमर इसे पछतावे की आग में जलने दें।
खाई की कीचड से सने सुपरवाईजर के बाहिर निकलते ही मैंने उसकी कमर पर दो चार सैंडिले जड
दी और घृणा से उसके मुँह पर थूंक मैं सुहेल के साथ
चल पडी।
उस दिन के पश्चात मेरे अन्तर में वर्षों से धधकता ज्वालामुखी शान्त हो गया। मैंने थन्ना मंडी स्कूल की नौकरी छोड दी। अब यहाँ पुंछ कालेज में सर्विस कर रही हूँ। वहाँ थन्ने वाला मकान किराये चढा मैंने अम्मी और भाई बहिनों को यहाँ बुला लिया। एक रात लैकचर तैयार कर सोने ही वाली थी कि कोई मेरी पीठ पर झूलकर बोला-मुझे और डैडी को अपने साथ रहने की इजाजत न दोगी अम्मी। एक और मन्द-मन्द मुस्कुराता सुहेल तथा दूसरी और पाँच/छह वर्ष का गोलमटोल बालक। मैंने चकित हो देखा द्वार के उस पर मां और नानी खडी थी। नानी ने आगे बढ बच्चे को मेरी गोद में डालकर कहा-नाजिमा यह तेरा नन्हा आरिफ है। जिसे सुहेल ने यतीमखाने से ढूँढ नई जिन्दगी दी है। फिर मुझे कुछ कहने की आवश्यकता न पडी। एक बडे ही सारे समारोह में सुहेल के साथ नन्हा आरिफ भी मेरा हो गया। शादी हुए 2 वर्ष बीत गये है। सुहेल की सोहब्बत (साहचर्य) ने मेरे पिछले जखम भर दिये हैं।
आरिफ की चहकती आवाज से हम दोनों सपनों की दुनिया से निकली। मैंने देखा उसके हाथ में गुलाब के सुन्दर फूल के साथ कली भी मुस्कुरा रही थी।
नाजो का आनन इन्द्र धनुषी रंगों से जगर मगर कर रहा था। मेरे हाथ ऊपर उठे जैसे नाजो और नन्हे आरिफ के उउउचेहरे से नजर उतार रहे हो। ?
क्वाटर नं. 323, कोटली अस्ती रिहाडी कॉलोनी, जम्मुतवी-18॰॰॰5