पांच कविताएं

प्रियदर्शनी वैष्णव


चिन्ता नहीं चिन्तन करो
मातृशक्ति यदि नहीं बची तो
बाकी यहां बचेगा कौन?
प्रसव वेदना, लालन-पालन
सब दुःख दर्द सहेगा कौन?
मानव हो तो दानवता त्यागो
और मुझे यह उत्तर दो
इस नन्हीं सी जान के दुश्मन
को इंसान कहेगा कौन
ममता, करुणा, त्याग की मूरत
मासूमों सी उसकी सूरत
कहती माँ मुझको भी आना
दुनिया का हर अनुभव पाना
पर जुल्मी हैवान के रहते
इसे पनपने देगा कौन? ?

मुखौटे
मुखौटों के भीतर
तुम क्या झांक पाओगे?
मुखौटे हटाकर भी तुम
क्या जान पाओगे?
क्योंकि
हटा भी लिया अगर मुखौटा
तो एक और मुखौटा पाओगे
मुखौटे पर लगे
मुखौटे ही मुखौटे
मुखौटे ही मुखौटे
हटाते ही जाओ
फिर भी
असली चेहरे को
किसी भी कदर
ना पहचान पाओगे। ?
मौसम
उस दिन
घन-घोर घटा छाई थी
दिल में मेरे
यह बात आयी थी
‘‘निश्चय ही बरसेगा पानी’’
पर उसी वक्त
कलयुग की याद आयी थी
मेरे सामने
इस युग की धोखे बाजी उभर आयी थी
घटाओं को देखकर
फिर यही निराशा छाई थी
‘‘शायद धोखा कर जाये’’
ये मौसम भी ?

व्यथा
महंगाई होती
कुछ ना होता
गरीबी होती
तो भी
कुछ ना होता
मगर
ये दहेज ना होता
तो मैं
यूं ना रोता ?

नश्वरता
फूल खिलते हैं सदैव
मुस्कुराने के लिए
किसी का दिल बहलाने के लिए
भ्रमर को शबनम पिलाने के लिए
नन्हें उपवन की शोभा बढाने के लिए
और तो और
फूल खिलते हैं इसलिए भी
अपनी सारी महक लुटा कर
सुगंध बांटकर फिर से
मुरझाने के लिए ?
ई-१६१, हुडको क्वाटर्स, कमला नेहरु नगर, जोधपुर
मो. ०८८७५४१०५३७, ०७७४२१२९१०७
•¤ãUæÙè