छः कविताएं

दीपचन्द सुथार



इन्द्रधनुष के रंग
मेरी कविताएँ-
हवा के साथ उडते
मानसूनी बादल नहीं
न स्कूल जाते-
बच्चे के पीठ पर रखा
बस्ते का बोझ है।
वह तो-
व्यथित व्यक्ति के
आहों से जले
हृदय के फफोले हैं
कोहरे से आच्छादित
आकाश से-
फलों पर गिरी
ओस की बूँदें हैं
उपवन में खिलते
चारों ओर-
मधुर महक फैलाते
सौम्य सुमन हैं।
पथिकों के-
पैरों तले कुचलीजते
पतझड के पत्ते हैं
तो कोई-
वातावरण के तानों-बानों से बुने-
भावों के कलकल बहते
झरने हैं
यथार्थ में मेरी कविताएँ-
इन्द्रधनुष के रंग हैं। ?
आशाओं के सपने
जिस परिवेश में
पल रहे हैं
पग-पग पर
विकृतियाँ-
दृष्टिगत हो रही हैं
जिसका जन्म
स्वार्थ के गर्भ से हुआ है
अब अहर्निश-
खा-
घुन की तरह रही है
इसलिए अपने ही प्रयासों से
कोशिश-
दूर करने की करे।
धागों की तरह
उलझ कर गाँठें पड गई हैं
तो धैर्य के साथ विवेक के हाथों से
खोलने का यत्न करे
जिससे ये क्षण-
एक-दूसरे के
सुख-दुःख के भागीदार बन
यादगार के अन्तर्गत
अतीत के हाथों में
सुरक्षित रहते
कल के सवेरे की रोशनी में
आशाओं के सपने
सँवार सकें। ?
वक्त के काग*ा पर
पढे खत को
व्यर्थ समझ
तत्काल फाड कर फेंक देते हैं
हवा में लहराते हुए
काग*ा के टुकडे
फिर जमीन पर गिरते रहते हैं
वैसे ही-
लक्ष्य विहीन विचार
इधर-उधर उडते
जीवन को बोझिल बना देते हैं
क्योंकि-
जिज्ञासाओं के दाँत
चूहे के दाँतों की तरह नुकीले होते है
जो हमें-
चौराहे की भीड में
सम्मिलित करने के लिए
मजबूर कर देते हैं।
लेकिन-
जिस किसी ने अपने सोच की
बंद पडी-
खिडकियाँ, दरवाजों व रोशनदानों को
खोल दिया
तो-
वक्त के काग*ा पर
स्वतः रेखांकित होते सुकृत्य
पल-दो-पल
कहीं जाने वाली *ान्दगी को
बदल
अतीत की राहों में देते हैं। ?
स्वावलम्बी
वे लोग-
कितने अच्छे थे
जो सदैव पास बैठे रहते
जीवन को-
फूलों-सी महक देते
आशा की पतंग को
विश्वास की डोर से
ऊँचाइयाँ देते रहते।
धैर्य के अभाव वश
लाभ-
अवसर का उठाकर
अपने-अपने स्वार्थ में
व्यस्त हो गए।
अकेला देख-
परिस्थिति ने उँगली पकड
चलना सिखाया
भीतर के मित्रों ने
कर्त्तव्य का निर्वाह करते
हौसले को बढाएं रख
अन्ततः
पैरों के नीचे की *ामीन को ढूँढ
स्वावलम्बी बना दिया
निरन्तर बढते रहने का सूत्र सीखा कर
सफलता के द्वारों को
सदैव के लिए खोल दिया। ?

शेष नहीं रहा है
बुढापा-
जीवन सफर का
महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है
तन की प्रत्येक झुर्री
इस कथन की-
कसौटी पर कसी
परिचायक-
अनुभव की है।
परिवेश के प्रभाव से-
प्रतिस्पर्धा की दौड में
प्रतिफल संलग्न रहा
अतीत की स्लेट पर
दो-शब्द लिखना चाहता था
वह भी, शीघ्रतावश-
लिख नहीं सका।
जवानी के जोश में-
की गई भूलों के काग*ा
इन्हीं की दरा*ा में
रखे हुए हैं
वृद्धावस्था की निकम्माई में
अब इन्हें पढने का-
अवसर मिला है।
परन्तु बीता वक्त
लौटकर नहीं आता
इसलिए-
हाथ मलने के अतिरिक्त
और कोई विकल्प
शेष नहीं रहा है। ?

शब्द
शब्द-
सरस्वती की वीणा का
सुमघुर स्वर
तथा-
संगीत, साहित्य व कला का
स्वरूप है।
साधना में लीन रह-
जिस किसी ने
पल-पल
समर्पित किया
उसी का जीवन
वसंत-सम
मुखरित हुआ है।
यह-
ज्ञान का सिन्धु
सृष्टि का सौन्दर्य
स्वरों का माधुर्य
आनन्द का कोष
अन्तस का स्पंदन
और-
दिव्य ज्योति की
उज्जवल रश्मियाँ हैं
यथार्थ में यही-
कर्म, धर्म, प्रेम, गति व विश्रांति का
अन्तिम सोपान है। ?
द्वारा श्री हेमन्त कुमार जाँगिड, दयाल भवन के पास, उम्मेद चौक
ब्राह्मणों की गली, जोधपुर-३४२००१ (राज.)