तीन कविताएं

डॉ. सरस्वती माथुर


खामोश सिन्धु सी
क्यों अदृश्य रह मैं
जबकि मैं स्वयं दृश्य हूँ
उन पहाडों का
जहाँ से पिघल कर बर्फ
झरना बन जाती है
और एक राह बनाती हुई
मीठी नदी तक जाती है
और सिन्धु में घुल
खार सोंख कर
मर्यादित हो जाती है
उसी सिन्धु से मैं
सीपी में मोती सी
जड बैठ जाती हूँ
फिर बाहर आकर
जन्म लेती हूँ और
समुद्री चिडिया बन
तैरती रहती हूँ
खामोश सिन्धु के ऊपर
अपने भीतरी शोर के साथ। ?
मौन विदाई
बसंत को विदा दी
तो मौसम का दर्द
पतझड के पीले पत्तों पर
कुछ यूँ छलक आया
मानो उसकी विदाई
वह सह नहीं पाया
मुरझाये चेहरे से
सन्नाटे बुनत है
हवा को गुनता है
पीले से सरसर पत्ते
जब दूर उड जाते हैं
ठूंठ सा होकर
इंत*ाार करता है
नन्हीं कोपल से
पत्तों के स्पर्श की
बहार तो सच एक,
हवा का झौंका है
क्रमबद्ध आती जाती है
मन दुखता है
फिर हरा हो जाता है
लुभाता हर्षाता है
मन मोह ले जाता है। ?
संबोधि
समय मेरे भीतर का
मान सरोवर है
जिसमें मैं तलाशती हूँ
भावनाओं का हंस जो
मेरी अनुभूति के
मोती चुगता है
फिर उड जाता है
निस्सीम सीमा के बाहर
तब मधुमास मदमस्त हो
मौसम पर छा जाता है और
मन के खाली कुम्भ को
महा नदी बन
भरने लगता है
उसके भरते ही न जाने क्यों
संवेदना का जल
भीतर तक खाली हो जाता है
और बाहर उमडने लगता है
सहस्त्र धारा पर
अस्तित्व के सशक्त उद्गम पर
तय नहीं कर पाता कि क्या करे
तितली बन जीवन के फूल पर
मंडराए या मुक्त पंछी सा
दूर गगन में उड जाए? ?
ए-२, सिविल लाइन्स, जयपुर, (राज.)-३०२००६