चार कविताएं

अनिल चतुर्वेदी


प्रेम निवेदन
मेघों ने आकाश में उमड-घुमडकर
किया ही था प्रेम निवेदन
कि क्षणभर में
घास की नोक से फिसलती ओस
के गाल सुर्ख हो आए थे
पहाडों की पगडंडियों से धुल-पुंछ कर आई जलधार भी
लजा गई थी
मुझे सहसा याद पडा
जाडों में भी जब घिर आते थे कजरारे मेघ
तब किसी अनजान से मद में
शीत के पाँव
इधर-उधर पडते देखे थे
गर्मियों में कहाँ चले जाते हैं मेघ
जब धरती के होंठ दो फाड हो पपडा जाते हैं
जब घास की विरह वेदना भट्टी सी सुलगती है
जब जलधार के बिछोह में
पहाडी पगडंडियों का हृदय सूखने लगता है
अभी फिर जब घुमडेंगे मेघ
तब देखना
प्रकृति पूरे प्राणों से
प्रेम निवेदन की बाट जोह रही होगी। ?

नींद
जब वह जागती हैं
मैं नींद की सपनीली दुनिया में पहला कदम रख रहा होता हूँ
यूँ
उसके जागने और मेरे सोने में
कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है
रात भर जागने वाले प्रेत भी तो सोते होंगे
आँगन में बोगनवेलिया भी अलसभोर ही जाग जाता है
जब वह जागती है
मैं समुन्दर किनारे रेत के घर बना रहा होता हूँ
बर्फीले पहाडों के रास्ते में हांफ रहा होता हूँ
भरी बरसात में नंगा नहा रहा होता हूँ
सूरज के मुंडेर पर चढ आने का मतलब
सवेरा नहीं होता
मैं जब जागता हूँ
तब नींद को सोया हुआ पाता हूँ
हम दोनों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। ?

दस्तक
तीन पीढियों का गवाह
बूढा बरगद
जेठ की आग में आखिरी साँसें लेता
देखता है सूनी-थकी आँखों से
गाँव में पसरी नीरवता
उसकी दारूण साँसे
अपनी बची खुंची हिम्मत बटोरकर
मीलों के सफर के बाद
देती हैं दस्तक
वातानुकूलित लेखन कक्ष के द्वार पर
जहां कवि रच रहा है ?

भूलना
समय की अनंत धारा में
फूल
सहेजते चले आ रहे हैं
सुवास, रंग और दमकता सौंदर्य
वृक्ष
जो बचाए हुए हैं आदिकाल से
हरापन, सुकूनी छाया और पक्षियों का कलरव
अपने अंतरतम में
और शीतल जल ने
नहीं बिसारा है युगों बाद भी
तृप्त करना
क्यों केवल आदमी ही
भूल गया है
मनुष्य होने का गुणधर्म? ?
२८, कल्याण नगर, सांगानेर रेल्वे स्टेशन के पास, रामपुरा रोड
सांगानेर, जयपुर(राज.)-३०२०२९