सूने घर में

राजेन्द्र उपाध्याय



कुछ भी तो नहीं छोडा
अपने घर में मां ने मेरे लिए
पिता की तस्वीरें
धूल भरी रामचरित मानस
और उनके भगवान
बस
मैं ढूंढता रहा
एक एक कमरा
एक एक ची*ा
कहीं भी कुछ भी तो नहीं मिला
काजू बादाम न भुनी मूंगफली
के चंद दाने
किसी शीशी में कुछ नमकीन
भी नहीं था वहां
यहां तक कि रोशनी भी नहीं
मुझसे कहा था
सूने घर में दिया जला आना।
किसके लिए
किसके लिए?
मां तो वहां नहीं थी
फिर एक गिलहरी
वहां क्या करने आई थी
और फिर जा नहीं रही थी। ?

जेबें
जेबें होती हैं हरेक के पॉकेट में
शर्ट में, कोट में, पतलून में,
पाजामे में, ओवरकोट में, कुर्ते में,
छतरी में, पर्स में, झोले में
जेब के भीतर जेब होती है
एक नहीं कई जेब होती हैं।
बनियान के भीतर जेब
कच्छे में जेब
जूते में जेब
मोजे में जेब
टोपी में जेब...
जेबों का यह संसार विचित्र है
हर जगह जेब है
उसके पास भी जिसके पास पैसे नहीं।
करोडों रुपये वालों की भी जेबें देखीं खाली,
भिखारी की भरी हुई...
मंदिर में पुजारी की जेब
तो जेल में बंद कैदी की वर्दी में जेब
साहूकार की जेब, कारीगर की जेब
फोटोग्राफर की जेब
बचपन में अक्सर खाली रहती जेबें,
तब कटती नहीं थी।
फटती थीं...
उसमें रखने को बहुत कुछ था
वह भी जो पैसे से नहीं खरीदा जा सकता
फिर भी कीमती था...
मोरपंख, रुई, फूल, कलियां, तितलियां, खोटे सिक्के
टूटे शंख, कंचे, बीज, चांद, धूप, छाया,
किरणों...
पैसे आने के बाद जेबें छोटी पड गई
उनमें ये सब रखने को जगह नहीं रही
फिर कटने लगी जेबें
उनमें कुछ भी काम का न रहा। ?
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