तीन कविताएं

सुभाष नागर ‘भारती’


हिम-बसंत के बीच...
खिली-खिली धूप
रूप-अनूप बसंत के
नवजीवन के कोर-कोर में
छुपा स्पन्दन, स्नेह का स्पर्श
दे रहा संकेत-
मौसम के आमंत्रण का
खिला तन-हर्षित मन
हिम-बसंत के बीच...।
मधुर स्मरण तुम्हारा
होता, रहा हर-पल तुम्हारा,
बस यूं ही,
संवरते-महकते रहे
जीवन के ‘आज’ और ‘कल’
ऐसे में आओ
हम और तुम बाँधें
नव-उमंग-नव-तरंग की गठरी
चलते रहें जीवन-पथ पर
साँझ-सवेरे
भविष्य की आस लिये।। ?

बस...समझें और समझायें...
वो अतीत की बातें
भविष्य का चिंतन
वर्तमान की व्यथाएँ
मुँह बायें खडी हैं
शायद... ले रहीं हों परीक्षा
किसी जन्म की,
ऐसा ही लगता रहा सदैव...
कब, क्या हो जाये?
सोच-सोच कर हारा हूँ
कौन कब तोड देता है दिल?
टूट जाती हैं सम्बन्धों की दीवारें
कभी-कभी घटनाक्रमों की
बाढ-सी आ जाती हैं।
इस खुशहाली में, सोना-जागना
उठना-बैठना, कुछ भी अच्छा नहीं लगता
तडपती है आत्मा
अपने ही तोड देते हैं दिल
मिलती नहीं है मंजिल...
आओ-
सम्बन्धों की सरगम को जोडें
स्वर से स्वर मिलाये
जन-गण मन गाये
मुख न मोडें...
दर्द का न कोई गीत गायें
बस... समझें और समझायें...।। ?

सर्द-दिन
सर्द-दिन
तुम बिन...!
घात-प्रतिघात
मन के द्वन्द्व
सफर चल रहा
बस...
यूँ ही अकेले...।।
धडकन की सरगम
बदली-बदली-सी
हवाएँ भी,
मचली-मचली-सी,
बदल गया परिवेश...
मैं फिर-
गिरा-उठा अनजाने रास्तों पर।
किसे कौन संभाले
केवल बातें ही उछाले
बस साथ हूँ-
मैं अपने विश्वास के
कल की आस के...।
तुम आओ तो
बनें टूटे/उलझे सम्बन्ध,
जुडावे हो,
मन से मन का
इन संघर्षो के बीच...। ?
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