चार कविताएं

दिनेश रावत



दुनिया नई बसायें
आओ मिलकर
एक चिराग नयी जलायें
इस धुप्प तिमिर में
रोशनी नई फैलायें
बहुत जल चुका है देश
जाति, धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर
आओ! सब मिलकर
दुनिया नई बसायें।
शोषण, अत्याचार, दमन की
नित खबरें आ रही हैं
दहेज की चिता पर
नव वधुएं झुलसती जा रही है
उन्हें रोकने को चतुर्दिक से
आत्मा की पुकार आ रही है
हे! भारत के नौजवानों
देखो! माँ भारती बुला रही है।
हवश के खुँखार भेडिये
रोज बलात्कार कर रहे हैं
एक मासूम-सी कली को
हो निर्मम मसल रहे हैं
इनके कुकृत्य से हरपल
मानवता कराह रही है
माँ भारती के सीने से
करुण चित्कार आ रही है।
कब तक सोये रहोगे
यूँ ही अज्ञानता के आगोश में
उठो! जागो! एक नई प्रभात
दिशायें सजा रही है। ?
रहने दो
रहने दो मुझे
ऐसे ही फटेहाल में
मत डालो
माया के जंजाल में
अभी कम से कम मैं
अपनों को तो पहचानता हूँ
पीडा क्या होती है,
किसी गरीब की
ये तो जानता हूँ
मेरी रोटी
मुझे मिल-बाँटकर खाने दो
साथ लेकर सभी को
पथ पर अभी बढ जाने दो
मैं नहीं चाहता
रौंद कर किसी को आगे बढूँ
चित्कार से किसी के
सपने सुनहरे गढूँ
नसीब से अधिक कुछ भी
मुझे नहीं मिल जायेगा
होगी यदि कुछ सत्कृति जीवन की
तो जीवन पुष्प स्वयं खिल जायेगा
मैं जहां हूँ, जिस हाल में हूँ
ठीक ही हूँ।
कम से कम पांव जमीन पर
बीच अपनों के तो हूँ।। ?
अच्छा है
अच्छा है हम दूर हैं
उस दहशत भरे माहौल से
जहाँ इन्सान,
इन्सान होते हुए भी
होता नहीं इन्सान
सवार रहती है
सिर पर
हैवानियत हरदम
बना रहता है
लहू पिपाषु
इन्सान का ही
हो चुकी होती हैं
शून्य
संवेदनाएं सारी
इसलिए
बातों ही बातों में
चल जाते हैं
चाकू-छूर्रे, बन्दूक, गोले व तमचे
कर देते हैं काम तमाम
छोटी-सी बात पर
उजड जाती है किसी की
बसी-बसायी दुनिया
अहंकार के दावानल से।
यहां चैन है, सुकून है
आत्मीयता है, बंधन है
भय है, संस्कार हैं
शालीनता है, संवेदनशीलता है
इसलिए उठते नहीं हैं हाथ
आसानी से किसी के
किसी पर भी और
होती नहीं अनहोनी मानव जनित। ??
सजग प्रहरी
सीमा के सजग प्रहरी
मुस्तैदी के साथ
संभाले हुए हैं मोर्चे ठिकानों पर
उन्हें भेजा गया है जहाँ
निभाने को
फर्ज अपना।
संसाधनों के अभाव में भी
कर रहे हैं गुजर-बसर
किसी तरह।
बस! आस एक
बन जाये भविष्य
अपना और उनका
जिनके खातिर पडे हैं
दूर इतने।
दिखे परिणाम
कुछ सार्थक
होने के दूर
अपनंांे से।
पूरे हो अरमान सभी के
जो गढे हैं नेक सपनों से। ?
रा.प्रा.वि. मेतली, पो. मेतली, वाया-जौलजीबी, जनपद, पिथौरागढ, उत्तराखण्ड-२६२५४४, मो. ०९९२७२७२०८६