पांच कविताएं

कविता मीणा


मन कहीं दूर उडा ले चल वहाँ
जहाँ तनिक विश्राम कर लूँ
जीवन की डगर पर अनवरत चलते हुए
दो पल अपना भी अहसास कर लूँ।
कभी सोच पाऊँ, कभी समझ पाऊँ
अपने को कभी कुछ पल दे पाऊँ
कर्त्तव्यों की भीड से निकलकर कभी
अपने अस्तित्व की पहचान कर लूँ।
मन कहीं दूर उडा ले चल वहाँ
जहाँ तनिक विश्राम कर लूँ।
निरन्तर भीड में खो जाना ही जीवन नहीं
सबके लिए हरपल बिताना भी अच्छा नहीं
सुकून के दो क्षण अपने लिए भी तू ढूँढ ले
उन पलों में, मैं अस्मिता की पहचान कर लूँ।
मन कहीं दूर उडा ले चल वहाँ
जहाँ तनिक विश्राम कर लूँ।
कुछ पलों का विश्राम जीवन की गति समझायेगा
*ान्दगी की रवानगी के मुझे उपाय बतायेगा
जीवन क्यों अनमोल है मेरा वह मूल्य समझायेगा
यह सोच अपनाकर, मैं जीने की राह अपनी बदल लूँ।
मन कहीं दूर उडा ले चल वहाँ
जहाँ तनिक विश्राम कर लूँ। ?
जीवन का सफर वह बीत गया
वह अल्हडपन, वह निश्छल मन
वह मासूमियत, वह भोलापन
कहते हैं जिसको सब बचपन
जीवन का सफर वह बीत गया।
मिट्टी के भांडों में दिखते थे स्वप्न
उन्मुक्त विचार थे उडते गगन
ना परवाह किसी की, ना था कोई गम
हठीलेपन का सफर वह बीत गया।
चिंतारहित, उमंगित वह बालमन
आनंद की किल्लोल से भरा बचपन
साथियों के संग से पुलकित हो उठते थे अंग
बेफिक्री का सफर वह बीत गया।
वह अक्खडपन, वह चंचलमन
अंगडाईयों से भरा वह आलसपन
यौवन का वह पागलपन
ख्वाबों का सफर वह बीत गया।
बैठे-बैठे कहीं खो जाता था मन
देखा करता था जब दिवास्वप्न
प्रणयाकुल विचलित रहता था मन
प्रिय के इंतजार करने का सफर वह बीत गया।
कुछ करने को उद्यत रहता था मन
उलझनों को सुलझाने का प्रयत्न
कभी आंनदित था, कभी विचारमग्न
हौसला और उम्मीद रखने का सफर वह बीत गया। ?
सावन की हरिताभ आभा
सावन की हरिताभ आभा
बहते झरनों का सरगम।
रिमझिम बरखा की फुहारें
पंछियों का उडता संगम।।
सरस, रम्य, मनोरम प्रकृति
निखर उठा सतरंगी रूप।
करता मतवाला, लाता तन्मयता
भू का आनंदित, माधुर्य रूप।।
तरुवर पल्लवों से सज्जित
झुरमुट कुसुम माला से मंडित।
प्रतिपल बहते मलयानिल से
नव स्वर हो उठते हैं गुंजित।।
धरा-स्वर्ग की इस आभा से
विषाद की स्याह मिटने लगी।
मेघों की गर्जन से भयभीत प्रिया
देखो साजन से मिलने लगी।। ?
भूल जमाना करता रहा...
किसी ने आवारा कहा, कोई पागल समझता रहा
वह दिवाना प्यार में बेफिक्र, मतवाला बनता रहा
मुश्किलों का जाल अकसर उसे जकडता रहा
चाहत की उस सौगात को ना समझने की ही
भूल *ामाना करता रहा।
बरसा बादल धरा की प्यास मिटाने को
पंछी हुआ बेताब पवन संग उड जाने को
मचल उठी सरिता समंदर में मिल जाने को
इस प्रेम- विवशता को ना समझने की ही
भूल *ामाना करता रहा।
भ्रमर मिट जाता है पुष्प के आगोश में
बैठा रहता है चकोर चंद्र के विश्वास में
बेताब है प्रेमी प्रिय मिलन की आस में
बैचेनी के इस दर्द को ना समझाने कीही
भूल *ामाना करता रहा। ?
अबला ही रहने दो मुझको
अबला ही रहने दो मुझको
क्यों सबला की मुहर लगाते हो?
बल तो अब भी नहीं मुझमें
क्यों झूठे स्वप्न दिखाते हो?
जीवन मेरा वही अब भी
सदियों से जो जीती आयी
पंख देकर मुझको
फिर उडने से तुम डराते हो।
अबला ही रहने दो मुझको
क्यों सबला की मुहर लगाते हो?
काग*ा और कलम से सबला किया
फिर भी तो तुमने मेरा दमन किया
मेरे जीवन की बेहतरी की
झूठी दिलासा दिलाते हो।
अबला ही रहने दो मुझको
क्यों सबला की मुहर लगाते हो?
प्रेम, त्याग, साहस का मेरा तुम सम्मान दिखाते हो
अपमानित करने से भी पर बाज कहां आते हो
मूरत देवी की बनाकर, झूठा गुणगान गाते हो।
अबला ही रहने दो मुझको
क्यों सबला की मुहर लगाते हो?
अधिकार बराबरी का कभी न दिया
कर्त्तव्यों की बेडी से मुझे जकड लिया
कुछ कहा तो चुप मुझको किया
सबला होने का केवल तुम फरमान सुनाते हो।
अबला ही रहने दो मुझको
क्यों सबला की मुहर लगाते हो? ?
१०-जी-१६, महावीर नगर-तृतीय, कोटा (राज.)
मो. ९३५१९१५९२२