दो कविताएं

डॉ. प्रदीप कुमार ‘दीप’



नारी-गरिमा
सोचती हूँ!
जब भी मैं!
एकांत में...
निर्निमेष होकर
कि आखिर कौन हूँ मैं?
जो सहती रहती हूँ!
अपने ही तन-मन पर!
कभी अन्याय!
तो कभी शोषण!!
कभी वेदना!
तो कभी दर्द!!
आखिर मुझमें भी है,
गरिमा!!
वह गरिमा!
जो सदियों से मैंने
खुद बनाई है!!
बनाया है मैंने
खुद बनाई है!!
बनाया है मैंने
अपना इतिहास!
और अपनी सभ्यता!
जिस पर नर ही
एकाधिकार रखने लगा है।
तार-तार करता है
मेरी मर्यादा और
मेरी गरिमा को!!
सो नहीं पाती हूँ!
अकसर रातों को!
जब समझता नहीं कोई?
मेरे सूक्ष्म जज्बातों को!!
जब होगी कलाई सूनी!
एक भ्राता की!!
पूछूँगी उस दिन?
जब होगी रूसवाई?
एक माता की!!
पूछूँगी उस दिन?
जब होगी तन्हाई!
जन्मदाता की!!
थक जाऐंगे ढूंढते-ढूढते
बेटे के लिए बहू!
तब पूछूँगी मैं!
जब प्रतीक्षा होगी
जामाता की।। ?

रोटी
रोटी की क्या बात करें?
रोटी तो रोटी होती है।
पतली-पतली गेहूँ की!
मक्के-बाजरे की मोटी है!!
कही सिकता!
तंदूर तडपकर!!
कही तवे पर लोटी है।।
किसी के साथ दाल नहीं!
किसी के साथ बोटी है।
गोल-गोल है...
कभी तिकोनी!
कभी बडी...
कभी छोटी है।।
कोई भीगी पसीने में!
कोई कमाई खोटी है।
कहीं ओवन में फूल रही!
कहीं अंगारों में ओटी है।।
एक घर में!!!
कीमत नहीं?
पिचके पेट में टोटी है!!
इस रोटी के रंग अनेक...
रोटी तो आखिर रोटी है।। ?
लक्ष्मणगढ क्रय विक्रय सहकारी समिति लि., लक्ष्मणगढ
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