पाँच कविताएं

मोहन थानवी



शून्य
दूर टिमटिमाते बिन्दु
गोलाकार
चमकती आशा
दुबकी बैठी प्यास
अजगर सी
गतिहीन सरसराहट
दिन-रात
अंतहीन को बांधने
निराकार का रूप तय करने
मशक्कत
सूरज-चांद की
धरती पर सागर
सागर में मोती
दोहन करने में जुटे
जलचर, नभचर, थलचर
शेष रहा शून्य
चारों ओर
निराकार अंतहीन ?
जन्माष्टमी
युद्ध और कर्म क्षेत्र को गीतों में ढालने वाले
ज्ञानामृत के सागर मीरां के लिए प्रेम के प्याले
पुराणों से मरीचिका बनती बिगडती
कथाओं से दुनिया इतिहास की बातें सुनती
चैन से बंसरी बजाने वाले
आ तेरी जरूरत है फिर आज
इतिहास से निकल आए हैं
कितने ही कंस
आतंकवाद का संहार करने वाले
इतिहास ने तेरे ही गुण गाए हैं
इतिहास है या दंतकथा
हे कृष्ण तू ही बता ?
भूख
तृष्णा के अंधकूप में
भ्रमरूपी मगरमच्छ
मत्स्य-मंडूक निगलते
भूख के नाम पर
हैवानियत का राज
तालाब किनारे
मृग-खग बिलखते
न्याय के नाम पर
फूल को शूल मिलते
वसीयत में
गुलाब के नाम पर
उदरपूर्ति के लिए
उदरस्थ कर रहा मानवीयता
आदमी-आदमी को ढूंढ रहा
भूख के नाम पर??
बादल बूंद
सूखी धरती
फैला आंचल
जल विहीन
दोपहर लगती प्रभात
मूक चौपायों की टोली
ढूंढ रही पानी
खेत बंजर
पेड बने ठूंठ
कुएं रीते
झरते रहे नयन
नहीं देखी बरसात
बादल नहीं सफेद बगुले देखे
अपने हल-बैल की चिंता में वह
मौन गुहार लगाता
बादल बरसा बूंद ...
सूखी धरती मांग रही पानी ?
होली
हवा में घुले खुशी के रंग
मिले गले भूले शिकवे गिले
पिचकारी से छूटी फूहार
लगे ठहाके
गोधुलि का समां
गुवाड हुई आबाद
पशुओं की भांत-भांत की बोली
पंछियों की चहचहाहट
घुली कानों में शहद
उमंग में आकर
दादी ने ली बलाईयां
ढांढ बनाया लडकों ने
बीनी सूखी लकडियां
प्रहलाद बनाई बेरी की झाडी
पंडितजी खुश
होलिका दहन की मिली दक्षिणा
उडी गुलाल, घुली खुशबू हंसी ठट्ठा हुआ
हवा में घुले खुशी के रंग ?
३२, सार्दूल कॉलोनी, बीकानेर ३३४००१