प्रजातांत्रिक नाटककार ः विष्णु प्रभाकर

राजेन्द्र जोशी



हिन्दी में लोक नाट्य की परम्परा बहुत पुरानी हैं। सन् १९५० से पूर्व निश्चित नहीं हो पा रहा था कि हिन्दी नाटक का प्रारंभ कब और कैसे हुआ ? डॉ. दशरथ ओझा के अनुसार प्रथम बार हिन्दी नाटक का आदि स्रोत वैष्णव और जैन रास सिद्ध किया गया। राजस्थान और गुजरात के जैन मन्दिरों और स्थानकवासों में गैय सुकुमारदास, भरतेश्वर बाहुबलि रास आदि के चौदहवीं शताब्दी में अभिनय के प्रमाणों से और पन्द्रहवीं के अन्त में असम के अंकिया नाटकों की भाषा और अभिनय स्थलों की खोज से हिन्दी नाटक के आदि स्रोत खोजने में सहायता मिली। मैथिली, मगही, भोजपुरी के नेपाल में उपलब्ध शताधिक नाटकों से यह दृढ हो गया कि हिन्दी नाटक का उद्भव लोक-नाट्य-धारा और संस्कृत परम्परा के मिलन से राजदरबारों में हुआ लेकिन मंदिरों में मूलतः जन भाषा के माध्यम से जैन देवालयों में और संस्कृत का पुट देते हुए लोक भाषा के द्वारा वैष्णव रास-लीलाओं से हुआ। हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार हिन्दी नाटकों के विकास के अध्ययन के लिए जिस प्रकार पुराने साहित्य के इंगित सहायक हैं, उसी प्रकार लोक परम्परा के अनेक मनोरजंन नाट्य रूप भी सहायक हैं।
विसंगत नाटकों का आकर्षण यूरोप में सन् १९६० के आस पास जाता रहा। प्रो. एसलिन, रूसी एडामाव प्रो. राबर्ट कारगिन भी उसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं जिस पर भारतीय आचार्य पंहुचे थे।
अर्थात् विसंगत नाटक की सृष्टि ही अव्यावहारिकता और व्यवहार लुप्तता के माध्यम से होती हैं। प्रो. कारिगन कहते हैं कि हम नाट्यशाला में कुछ पाने के लिए जाते हैं। थियेटर में जाने का प्रयोजन ही कुछ न कुछ पकड में आना दी एब्सर्ड-अनल्डि हिचफिल भी नाट्य-चिन्तन का विश्वव्यापी स्वरूप समझाने का प्रयास करते हैं।
हिन्दी नाटककारों में अनेक नाटककार हुए हैं जिन्होंने हिन्दी के नाटक को समृद्ध करने का भरपूर प्रयास किया है। इनमें हम श्री विष्णु प्रभाकर का नाम उल्लेखित कर सकते हैं। विष्णु प्रभाकर के आगे-पीछे अथवा समकक्ष श्री सुरेन्द्र तिवाडी, हमीदल्ला, जगदीश चतुर्वेदी, प्रताप सहगल एवं कुसुम कुमार के नाटकों को भी देखा जा सकता है।
विष्णु प्रभाकर ने स्वयं अनेक नाटक लिखे और सम्पादित भी किए, समकलीन लघु नाटक के संदर्भ के दौरान स्वयं विष्णु प्रभाकर ने कहा कि छठवें दशक तक हिन्दी के अधिकांश नाटक पठनीयता की दृष्टि से तो जरूर श्रेष्ठ थे परन्तु उनका रंगमचीय उपयोग सन्देहपूर्ण था। हिन्दी नाटक को रंगमंचीय स्वरूप इसके बाद ही प्राप्त हुआ। प्रभाकरजी स्वंय इस दौर में मोहन राकेश और लक्ष्मीनारायण लाल जैसे कथाकारों को नाटक से जुडने के कारण नाटक को उभारने को स्वीकार
करते हैं।
श्री विष्णु प्रभाकर के नाटकों और एकांकी को हम देखें तो आज स्थिति बदली है, उनका नाटककार रंगमंच से भी जुडता है और उनके नाटक रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे प्रतीत होते हैं।
‘‘कितना गहरा कितना सतही’’ नाटक में विश्वविद्यालय में राजनीति की व्यापकता देखने को मिलती हैं, उस दौर में भी छात्र राजनीति का स्वरूप आज की छात्र राजनीति से एकदम अलग दिखायी पडता है, परन्तु समानता भी है जब छात्र विश्वविद्यालयों में बैठकर सिगरेट एवं जाम छलकाते हैं। इस नाटक के एक पात्र श्याम कस्बे के कॉलेज में लेक्चरर है और डॉक्टरेट की तैयारी कर रहा है, अपनी पीएच.डी. के विषय ‘‘विद्यार्थी आन्दोलन कितनी गहरा, कितना सतही।’’ का विषय तलाश रहा हैं, पूरे नाटक को समझने से लगता है कि श्याम को उसका विषय मिल गया है।
विद्यार्थी आन्दोलन में हेमन्त की छात्र राजनीति का उद्भव तो होता है परन्तु जो कि पुलिस के साथ पुलिस स्टेशन जाने से भी बिना डर के स्वयं जाता है, कैम्पस में पुलिस का आना और चिल्लाना। पूरे विद्यार्थी आन्दोलन की राह बेरोजगारी दूर करने के संबंध में हेमन्त स्पष्ट कह रहा है कि नौकरी नहीं है तो कॉलेज क्यों खोल रखे हैं ? सरकार क्यों है? नौकरी है तो वेतन नहीं, वेतन है तो बाजार में चीजों के भाव आसमान को छूते हैं। कौन जिम्मेदार है इसके लिए ? लघु नाटक में विद्यार्थी आन्दोलन का तरीका अन्य नाटकों से भिन्न बनाता है। विरोध का नाटक बनाता है कि जिससे नाटक का वातावरण बदलता नजर आता है। हालांकि अन्य पात्र और दूसरे विद्यार्थी अपनी राजनीति की चिन्ता करते हुए हेमन्त के अकेले जाने से भी
खफा होते हैं।
नाटक में प्रभाकर जी सपाटपन दिखाते हुए दर्शाते हैं कि अन्य राजनीतिक नेता लोग छात्र राजनीति के माध्यम से अपनी रोटिया सेंकते है और पुलिस को भी छात्र सचेत करते हैं कि तुम भी अपने अधिकारों के लिए यूनियन बना रहे हो, क्या तुम्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सकता? नाटक में मंचीय मुहावरों और कौशल के दर्शन यहां भी होते हैं। छात्र राजनीति के बहाने प्रभाकर जी ने अद्भुत नाटक
प्रसंग बुना हैं।
प्रभाकर जी ने अनेक नाटक लिखे हैं जिनमें पात्र आपस में जोरदार संवाद करते नजर आते हैं। विष्णु प्रभाकर का बन्दिनी एक ऐसा नाटक है जो भाषा के लिहाज से आसानी से खेला जा सकता हैं, यह उन महत्वपूर्ण नाटकों में है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन और गहराईयों को छू लेता हैं। हालांकि विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि बन्दिनी नाटक मेरी कल्पना की उपज नहीं है और मैंने अपनी इच्छा से भी नहीं लिखा।
श्री विष्णु प्रभाकर के चर्चित एवं प्रमुख नाटकों में नवप्रभात, डॉक्टर, युगे युगे क्रांति, टगर, सत्ता के आर पार एवं केरल के क्रांतिकारी को रखा जा सकता है।
ख्यात्नाम साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर उन बिरले लेखकों में शुमार है जिन्होंने नाटकों के अतिरिक्त एकांकी भी खूब लिखे, बाल एकांकी, रेडियो रूपक भी प्रमुख हैं। प्रो. प्रकाशचन्द्र गुप्त ने १९३८ ई. में ‘हंस’ एकांकी विशेषांक एवं हिन्दी एकांकी में डॉ. सत्येन्द्र ने एकांकी को समझाने का प्रयास किया है। मत मतांतरों के बाद सर्व सम्मति से प्रसाद का ‘‘एक घूंट’’ नाटक को प्रथम एकांकी के रूप में माना जाता है, हम विष्णु प्रभाकर के एकांकी की बात करें उससे पहले एकांकी का लक्षण और उसका तंत्र समझ लें कि जो नाटक एक अंक में समाप्त होने वाला, एक सुनिश्चित लक्ष्य वाला, एक ही धरना, एक ही परिस्थिति एक ही समस्या वाला हो, जिसके प्रवेश में कौतूहल और वेग, गति में विद्युत सी वक्रता और तेजी, विकास में एकाग्रता और आकस्मिकता के साथ चरम सीमा तक पहुंचने की व्यग्रता हो और जिसका पर्यवसान चरम सीमा पर ही प्रभाव की तीव्रता के साथ हो जाता हो, जिसमें प्रासंगिक कथाओं का प्रायः निषेध, घटनाओं की विविधता का निवारण तथा चारित्रिक प्रस्फु टन में आदि मध्य और अवसान का वर्जन हो, उसे एकांकी कहना चाहिए।
श्री विष्णु प्रभाकर के लगभग सभी एकांकी में ये पुट स्पष्ट मिलता है। रेडियो रूपक जो कि एकांकी शैली में रखे जाते हैं। उदयशंकर भट्ट विरचित ‘‘मेघदूत’’ ‘‘विक्रमोर्वशी’’ ‘‘शकुन्तला’’ ‘‘राधा’’ आदि गीतिनाट्य बार-बार कई रेडियो स्टेशनों से सफलतापूर्वक प्रसारित हुए हैं। इसी प्रकार सामाजिक, मनोवैज्ञानिक समस्या, प्रहसन आदि समय-समय पर प्रसारित होते रहे। उस समय आचार्य चतुरसेन के चार रेडियो रूपक प्रकाशित हुए हैं-‘‘सीताराम’’ ‘‘हरिशचन्द्र’’ ‘‘श्री भरत’’ और ‘‘राखी’’। ठीक उसी समय श्री विष्णु प्रभाकर के भी चार रेडियो रूपक (१) उपचेतना का छल (२) मुरब्बी (३) सरकारी नौकरी और (४) क्या वह दोषी था, मुद्रित हुए। इनमें उपचेतना का छल और क्या वह दोषी था मनोवैज्ञानिक नाटक हैं, जिनका अभिनय सफलतापूर्वक रेडियो स्टेशन दिल्ली से हुआ
ध्वनिनाट्य -
वाचिक अभिनय आधारित नाटकों को ध्वनिनाट्य के रूप में भी श्री विष्णु प्रभाकर ने लिखे इसमें कथनोपकथन का प्राधान्य रहा, ध्वनिनाट्य प्रभाकरजी का ‘‘बीमार’’ इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। हालांकि इसे अन्धों का सिनेमा भी कहते है।
स्वोक्ति -
एकांकी के रंगमंच से भिन्न एक पात्रीय नाटक जिसमें कथावस्तु का सुसम्बद्ध होना जरूरी नहीं माना जाता, परन्तु रेडियो पर कथा सुसम्बद्ध होनी चाहिए। इसमें प्रभाकरजी का ‘‘सडक’’ नाटक प्रमुखता से देखा जा सकता है।
फैण्टेसी (भावनाट्य) -
उदयशंकर भट्ट इसे ऋतु संबंधी नाटक मानते हैं। सिद्व हस्त नाटककार विष्णु प्रभाकर का मत है कि जीवन में किसी अमूर्त तथ्य पर आधारित रोमानी चित्रण फैण्टेसी (भावनाट्य) हैं। इनमें भावनात्मक पुट चित्रत किया है। विष्णु प्रभाकर के दो नाटक ‘‘अर्द्वनारीश्वर’’ और ‘‘शलभ और ज्योति’’ उत्तम भावनाट्य हैं।
श्री विष्णु प्रभाकर के एकांकी आधुनिक संवेदनाओं को बोध कराने में अधिक सफल प्रतीत होते हैं। प्रभाकरजी एकांकी में नए-नए विषय और नई-नई टेक्नीक निकालने का प्रयोग करते हैं। ‘‘दृष्टि की खोज’’ एकांकी में वे बाजारवाद और दृष्टि को खोजने को बडे ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करते है। किस प्रकार बाजार में आगन्तुक को अपने को बचाए रखना पडता है। इस नाटक में अपना अपना माल बेचने के लिए ग्राहक की महत्वपूर्ण दृष्टि की बिना परवाह किए मात्र पैसा कमाने के लिए खराब चश्में बेच रहे हैं। प्रभाकरजी द्वारा इस एकांकी में एक साथ दुकान करने वाले दुकानदारों जो कि पहले तो मित्रवत है लेकिन ग्राहक को मूर्ख बनाने के लिए उनकी विरोधी प्रतिस्पर्धा भी शानदार तरीके से दर्शायी गयी है। इसी एकांकी में प्रभारकरजी ने मधुरिमा और मानवेन्द्र को अनूठे ढंग से दृष्टि की खोज करते हुए बाजार आपस में लडते थे वे सब एक साथ एक स्वर में कह उठते है कि दृष्टि की खोज तो वही कर सकता है जिसके पास अपनी दृष्टि हो। अंत में मानवेन्द्र सभी को गुमराह कर सकने वालों का प्रमाण पत्र प्रदान करके हंस कर चलते हुए डॉक्टर को भी संदेह भरी दृष्टि से देखते हैं।
एक और बानगी देखें, एकांकी रसोई घर में प्रजातन्त्र में विषय वस्तु एकदम सामान्य है जो कि एक ही घर को देश के निर्णयों की भांति बनाने का प्रयास है। प्रभाकरजी अपने एकांकी में कठिन, बोझिल एवं जटिल विषयों से परहेज करते दिखाई देते हैं। वैसे कहा जाता है कि एकांकी गुदगुदाने का नाम है एकांकी चंद मिनटों में पढने का नाम है। इसी तरह विष्णु प्रभाकर रसोई घर में प्रजातन्त्र में भी ऐसे ही प्रयास और प्रस्तुत करते दिखते हैं।
जहाँ पर रसोई घर के महाराज को सबकी सुननी पडती है और प्रजातन्त्र की तरह से इतनी अधिक सुनते-सुनते वो किसी का कोई काम नहीं कर पाता, हाँलाकि महाराज बडे से छोटे के हुक्म की लाइन बनाने का प्रयास करता हैं। लेकिन घर के सभी सदस्य महाराज को अपनी-अपनी फरमाईश करते हैं और महाराज परेशान होकर बिना कुछ बनाए रसोई घर से अपने घर चला जाता है।
इसी प्रजातंत्र के दूसरे दृश्य में प्रभाकरजी लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाते हुए रसोईघर में लोकतंत्र स्थापित करते है जो कि उनके लिए ही नुकसान देह हो जाता है। इस लोकतंत्र में वे रसोईघर के बाहर एक बॉक्स रखते हैं जिसमें घर के सभी लोग बिना नाम लिखे अपनी-अपनी पसंद के नाश्ता, खाना दोनों समय के खाने के लिए परची डालते हैं फिर जिस मीनू को अधिक वोट मिले वही मीनू बनाया जाता है, जिसमें अपनी पसंद का सामान नहीं मिलने पर घर के अधिकांश सदस्य बिना खाए चले जाते हैं। बहुमत के साथ सभी को चलने के लिए बॉक्स था परंतु घर के मुखिया श्यामनाथ को बैंगन की पकौडिया मिलती हैं जो कि उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं और अब स्वयं प्रजातंत्र के मुखिया ही इस व्यवस्था के खिलाफ दिखाई देते हैं।
इस प्रकार विष्णु प्रभाकर ने ऐसे अनेक एकांकी नाटक लिखे हैं वर्ष १९८३ में ‘दृष्टि की खोज’ एकांकी संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें पाठकों और दर्शकों को आकर्षित करने वाले सात एकांकी (१) सूली पर टंगा श्वेत कमल (२) तीसरा आदमी (३) कितना गहरा कितना सतही (४) दृष्टि की खोज (५) रसोईघर में प्रजातंत्र (६) साँप और सीढी और (७) दरारों में द्वीप प्रकाशित हुए।
जाने-माने रचनाकार श्री विष्णु प्रभाकर ने बच्चों के लिए भी अलग से बाल एकांकी भी खूब लिखे जो बच्चों के मध्य भी चर्चित और भाव विभोर करने वाले हैं। स्वयं विष्णु जी दादी-नानी की कहानियों से रंगमंच, रेडियो या सिनेमा के नाटकों को अधिक प्रभावशाली मानते हैं। वे कहते हैं कि बच्चों को नाटक अपनेपन का आभास करवाता हैं। प्रभाकरजी बाल एकांकी में स्पष्ट करते हैं कि बच्चों को उपदेश की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है रोचकता की, सहजता की, कौतूहल की। बाल एकांकी के रूप में प्रभाकर जी ने बच्चों की शरारतों, हँसने, माता-पिता, भाई-बहनों और दोस्तों के व्यवहार से संबधित एकांकी लिखे हैं जिनके अर्थ स्वयं बालक आसानी से समझ सकते हैं।
‘‘जादू की गाय’’ नाटक जो कि एक लोककथा पर आधारित नाटक है यह लोककथा सारिका में प्रकाशित हुई थी। जादू की गाय की कथा में एक व्यक्ति के पास एक ऐसी गाय है जो सोना देती है। जब राजा को पता लगता है तो राजा तक कह देता है कि मेरे राज्य में जो सबसे कीमती वस्तु है वह मेरी है। गाय के लिए पंचायत बुलाई जाती है वहाँ पर गाय देने वाले साधु भी आते हैं। उससे पूर्व ही पंचायत में भी राजा के पक्ष में फैसला होता है और राजा का अधिकार गाय पर हो जाता है फिर पंचायत में चारों साधु आते है और पुनः पंचायत बैठती हैं जहाँ साधुओं की तरकीब से राजा पराजित हो जाता है। राजा भी हार मान बैठता है और प्रजातंत्र की जीत होती है। वापस गाय समीर को मिलती है और गाय सोना नहीं देती मीठी-मीठी दूध देती है। दादी अम्मा के गीत के साथ नाटक तो समाप्त होता है। प्रभाकरजी अपने एकांकी नाटकों में प्रजातंत्र के विषय अधिक दर्शाते न*ार आते हैं। इस संग्रह के चौदह नाटकों में न्याय, ईमानदार लडका, पंच परमेश्वर और रामू की होली भी ऐसे ही प्रजातांत्रिक नाटक हैं शेष नाटकों में बहुत कुछ सीखाते हैं और मनोरंजन के माध्यम से सिखाते है। प्रभाकरजी के विषय पाठक-दर्शक पर ऊपर से आरोपित करते नहीं दिखाई देते बल्कि सहज अभिनय और कथा के अंतर में से प्रस्फुटित होते हैं। ?
संदर्भ-
(१) हिन्दी नाटक उद्भव और विकास, डॉ. दशरथ ओझा
(२) समकालीन लघु नाटक
(३) दृष्टि की खोज
(४) जादू की गाय तथा अन्य बाल एकांकी
तपसी भवन, नत्थूसर बास, बीकानेर
मो. ९८२९०३२१८, ९४१४१२९६८७