समाज के आईने में साहित्य

सीताराम पाण्डेय


भारतीय साहित्य, व्योम की तरह विस्तृत और गंगा के समान गौरवपूर्ण एवं पवित्र है, जिसकी आत्मा में लोक-कल्याण की भव्य-भावनाएँ हिलोरें मारती रहती हैं। साहित्य का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘हित-सहितम-साहित्यम्’ - ‘सहितस्य भावः साहित्यम्।’ जो मनुष्य जाति के लिए कल्याण की सम्पूर्ण भावनाएँ समेटे हो अर्थात् जो मानव-जाति के लिए हितकर, सुखकर और श्रेयष्कर हो, उसे हम साहित्य की संज्ञा से विभूषित करते हैं।
मस्तिष्क को क्रियमान रखने तथा उसके विकास और वृद्धि में सहायता पहुँचाने के लिए साहित्य रूपी भोजन से मनुष्य का मानसिक परिपोषण होता है, जैसे- भौतिक शरीर की उन्नति पंचभूतों के कार्य-रूप, प्रकाश, वायु, जलादि की उपयुक्तता पर निर्भर है। वैसे ही मनुष्य का बनना-बिगडना साहित्य पर अवलम्बित है। अतः सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक विकास में साहित्य का प्रभूत योगदान है।
किसी देश की संस्कृति और सभ्यता जानने के लिए वहाँ के साहित्य का सम्पूर्ण रूप से अध्ययन आवश्यक है। साहित्य देश, जाति, व्यक्ति के विकास का बीज है। उसमें मानव-कल्याणार्थ धार्मिक विचारों, सामाजिक-संगठन, ऐतिहासिक घटना तथा राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिबिम्ब परिदृश्य है।
साहित्य से अधिक कल्याण और किसी कला से नहीं। यही एक मात्र सहज आधार है, जिसमें व्यक्ति त्रिकालिक ज्ञान हासिल कर सकता है। भारतीय साहित्य में समाज पर प्रभाव डालने की अद्भुत क्षमता होती है। उसमें ऐसी शक्ति समाहित है कि वह सीधे देश की जनता में जागृति का मंत्र फूँक दें। इस तरह हम देखते हैं कि मानवीय मूल्यों से मंडित साहित्य में बादशाह की बादशाहत को पलट देने की अपरिमित शक्ति संगुंफित हैं।
शास्त्रानुसार -साहित्य - संगीत - कलाविहीनः साक्षात्पशुः पुंच्छविषाणहीनः
तृन्नखादन्नपि जीवमानः इति भागधयं परम पशुनाम्।।
श्रीभृतहरि ने साहित्य और संगीत कला से विहीन व्यक्ति की तुलना पशु से की है और कहा है कि साहित्य-संगीत-कला से विहीन व्यक्ति, सींग और पूंछ से हीन साक्षात पशु के समान होता है और वे मानव रूपी पशु घास नहीं खाते हुए भी जीवित रहते हैं। यह पशुओं के लिए परम सौभाग्य की बात है।
साहित्य मनुष्य को सन्नमार्ग पर चलने की शिक्षा देता है। किट्स के कथन से स्पष्ट है कि ‘संगीतकार और साहित्यकार वस्तुतः दुखों की जिन्दगी में सुखानन्द प्रदान करते हैं। ग्रन्थों का संख्या-बाहुल्य ही किसी साहित्य की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं होता, बल्कि जिस साहित्य में आम जन-जीवन का प्रतिबिम्ब दिखाई पडे और मानवतोन्मुख स्वर समाहित हो तथा पारिवेशिक प्रासंगिकता के साथ-साथ मानवीय कल्याणात्मक भाव संगुफित हो, वह साहित्य सार्थक एवं समाजोपयोगी माना जाएगा। किसी ने कहा भी है-
अंधकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है,
मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नहीं है।
यह तो सर्वविदित बात है कि मनुष्य पहले वन्य-जीवन व्यतीत करता था। कन्द-मूल-फल से उसकी क्षुधा निवृत्ति होती थी और निर्झर के नीर से उसकी प्यास शान्त होती थी। पर्वत की कन्दरायों एवं पेडों की छाया में वह रात्रि व्यतीत करता था। वर्षा, शीत और गर्मी से वह अपने को बचाने के लिए इनका ही आश्रय लेता था।
प्रकृति और परिस्थिति से संघर्ष करता हुआ मानव जंगली-जीवन से सभ्यता का अनुगामी हुआ। उदर के क्षुधा-निवृत्ति के साधन में भी परिवर्तन और परिष्कार हुए। अब मनुष्य मस्तिष्क और उदर की भूख से व्याकुल होने लगा।
विचार और भावना के विविध रूपों की अनुभूति, व्यंजन और विनिमय की गंगोत्री से साहित्य-सरिता का उद्भव हुआ। जिसमें अवगाहन कर धरती का मानव सुरलोक का देवता बनने का दावा करने लगा। मानव को असभ्यता और अंधकार से सभ्यता और प्रकाश के पावन क्षेत्र में लाने का श्रेय साहित्य को ही है।
समग्र मानव-समाज को सुसंस्कृत करने का एक-मात्र साधन साहित्य ही है। साहित्य भावना को व्यापक और विस्तृत बनाता है। वह विचारों की विभिन्नता दिखलाकर विचार करने की प्रेरणा प्रदान करता है और तदनुसार आचरण करने की शक्ति को संचारित करता है।
आदिकाल से आधुनिक काल तक मानव ने ज्ञान के दुर्गम क्षेत्र में व्याप्त आलोक की जितनी उपलब्धि प्राप्त की है, उसी को साहित्य की संज्ञा से विभूषित किया गया है। तात्पर्य है कि मानव-समाज के युग-युग से संचित ज्ञान-भंडार को ही साहित्य कहा जाता है।
इस प्रकार साहित्य सुन्दर विचारों और सद्भावनाओं को उद्भुत कर, समाज को संतुलन, संगठन और शक्ति प्रदान करता है। यह सामाजिक कुरीतियों और पाखण्डों का पर्दाफाश करके सत् आचरण और उच्च विचारों का स्फुरण करता है। समाज के शुभ और अशुभ, श्वेत और श्याम पक्षों का सम्यक उद्घाटन करके समाज को स्वस्थ और प्रगतिशील बनाता है। यथार्थ स्थिति के आधार पर आदर्श एवं अनुकरणीय परिस्थिति का सुन्दर स्वरूप प्रस्तुत करके प्रगति के लक्ष्य-बिन्दु का विधान करता है।
साहित्य समाज का दर्पण है। जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण में मनुष्य को अपने शरीर का प्रतिबिंब सही रूप से प्रतिबिम्बित होता है। यदि हमारे मुख मंडल पर कोई विशेष सौन्दर्य की विशिष्ट कान्ति है, तो वह स्पष्ट रूप से दर्पण में दिखलाई पडेगी। ठीक उसी प्रकार सामाजिक सद्गुण और दुर्गुण तथा उसकी शक्ति साहित्य रूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित होती है। साहित्य रूपी दर्पण में समाज के दुगुर्ण और विकृति भी अंकित हो जाते हैं।
साहित्य के विभिन्न रूप-भेद के कारण ही विभिन्न कालों में समाज की परिवर्तित परिस्थिति परिदृश्य है।
हिन्दी साहित्य की ओर हम दृष्टि डालते हैं तो देखते हैं कि एक हजार वर्ष पूर्व का हिन्दी साहित्य, वीर काव्यों से भरा-पडा है। कहीं सम्राट् पृथ्वीराज की अमर-गाथा है, तो कहीं हम्मीर और विसलदेव की वीरता का विशद् ओजपूर्ण वर्णन है। वह वीर-रस का प्रबल-प्रवाह समाज के शोर्य-वीर्य की गतिविधि का ही प्रतिबिम्ब है जो साहित्य रूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित हो रहा है और लोक-जीवन के लिए प्रेरणा-स्रोत है।
फिर हिन्दी साहित्य में हम रस का अजस्र प्रवाह पाते हैं। मुस्लिम विजेताओं के प्रबल-आक्रमण के समक्ष पराजित हिन्दू-जाति को लोक-रंजक और लोक-रक्षक भगवान को छोडकर कोई दूसरा सहारा नहीं था।
एक ओर सूर सर्वशक्ति सम्पन्न ईश्वर के चरणों की बन्दना करते हैं तो दूसरी ओर तुलसी समग्र संसार को ‘‘सिया-राममय’’ समझकर श्रद्धान्वत होते हैं। इस प्रकार हम अपने साहित्य में भक्ति-भावना का प्रबल-प्रवाह पाते हैं। क्योंकि निस्सहाय हिन्दू-समाज के हृदय में अब संघर्ष के लिए साहस और शक्ति नहीं थी, तब वह भगवान के चरण-शरण में अपना त्राण ढूंढ रहा था।
समाज की यह भावना ही साहित्य रूपी दर्पण में प्रतिबिम्बत हुई है। अतः हम देखते हैं कि साहित्य, समाज की परिवर्तित परिस्थिति उसकी विचार-प्रणाली और भाव-दशा को सही रूप में अपने पारदर्शी हृदय में संजोकर
रखता है।
साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं, वह पथ-प्रदर्शक भी है। जब समाज की चेतना कुण्ठित हो जाती है और उसकी विवेक-शक्ति मुख मोड लेती है, तब ऐसे आडे समय में साहित्य ही हमारा पथ-पदर्शन करता है और अवरूद्ध प्रगति-पथ को आलोकित कर आगे बढने की प्रेरणा भी देता है। जब समाज अपने अभियान के क्रम में पथ-भ्रष्ट हो जाता है तो साहित्य का पावन-प्रकाश खोए हुए मार्ग का पता बताता है।
नव वधू की रूप-माधुरी के सुधा-पान में आत्म-विस्मृत महाराजा जयसिह को साहित्य की छोटी-सी दो पँक्तियों ने आत्म-जागरण का संदेश दिया। महाभारत के मध्य कुरूक्षेत्र विजेता अर्जुन को जब सांसारिक मोह-माया ने विवेक-हीन बना दिया और उस विवेकीनता से कर्त्तव्य भ्रष्ट होने लगे तब गीता के साहित्य ने, मार्ग-विस्मृत अर्जुन को उचित पथ का ज्ञान कराकर मानवता की विजय-पताका फहरा दी।
देश-भक्त राणा प्रताप वन में जब अपनी संतान को भूख से बिल्लाते देखकर व्यथित हो गये और अपनी गौरवमयी प्रतिज्ञा का परित्याग करने हेतु कटिबद्ध हो गये, तो साहित्य ने आगे बढ, अपना आलोक विकीर्ण कर, उनका पथ-प्रदर्शन किया।
इन सभी तथ्यों पर दृष्टिपात करने से हम निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘साहित्य समाज और व्यक्ति’ में चोली और दामन का संबंध है। अतः वह अभिन्न और समरूप हैं।
जिस तरह जल के बिना चाँदनी नहीं छिटक सकती? उसी तरह समाज के बिना साहित्य नहीं रह सकता और साहित्य के बिना समाज नहीं रह सकता। समाज एक चक्र है तो साहित्य उसकी धूरी। जिस तरह पृथ्वी अपने कक्ष पर घूमती है उसी तरह साहित्य, समाज रूपी कक्ष पर चक्कर काटती है।
साहित्य दो प्रकार हैं-उपयोगी साहित्य और ललित साहित्य। वे सभी उपयोगी साहित्य के अन्दर आते हैं, जिनका हमारे अन्तर्देश से रंचमात्र भी संबंध नहीं है, जो संसार के भिन्न-भिन्न तत्वों और तथ्यों का निरपेक्ष संकलन मात्र है।
ललित साहित्य के अन्दर वह साहित्य आता है, जो हमारे हृदय में आलोकित होने वाले भाव-धाराओं और भावना-तंरगों का रागात्मक रूप उपस्थित करता है, जिसमें भाव की प्रधानता होती है और जीवन के अन्य रूप उसकी पृष्ठभूमि में परिवर्द्धित होते है।
उपयोगी साहित्य की श्रेणी में इतिहास शास्त्र, नागरिक शास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और विज्ञान की सभी शाखाएँ आती है। राजनीतिशास्त्र, इतिहास आदि की उपयोगिता तो सर्वविदित है। उपयोगी साहित्य की उपयोगिता तो साहित्य संज्ञा के पहने लगे उपयोगिता-विशेषण से ही व्यंजित होता है। उसी प्रकार ललित साहित्य की कोटि में काव्य, उपन्यास, कथा, कहानी, नाटक आदि की गणना की जाती है।
वस्तुतः काव्य, उपन्यास आदि ललित साहित्य की सीमा की सामग्रियों के विषय में साधारण धारणा यही है कि ये सब केवल मनोरंजन और आत्मानन्द की वस्तुएँ हैं। इसमें जगत की ठोस धरती की वास्तविक विषम समस्याओं का न समावेश ही है और नहीं उनके समाधान का कोई मार्ग ही प्रदर्शित किया गया है। मानव के जीवन-संघर्ष के लिए इसके पास कोई समाधान और मार्ग-दर्शक प्रकाश का साधन नहीं है। लेकिन, यह भ्रान्ति पूर्ण धारणा है और इस धारणा में कोई ठोस तथ्य नहीं है।
ललित साहित्य में लोक-जीवन की ठोस धरती की विषमताओं का प्रभावकारी, वास्तविक एवं मनोवैज्ञानिक चित्र है और उसके समाधान और विकास परिष्कार की प्रचुर सामग्री संचित रहती है। काव्य और उपन्यास आदि में हमारे अन्तर की भावभूमि पर जीवन की वास्तविकता अपनी समस्याओं और समाधानों के साथ गाँठ बाँधे प्रतिष्ठित परिलक्षित होती है। यहाँ मानव का मानस, हृदय की सहानुभूति की सरस-धारा में अवगाहन कर परिष्कृत और विकसित
होता है।
युग-युग की विभिन्नताएँ?साहित्य के दर्पण में प्रतिबिम्बित होती है और अतीत और भविष्य-वर्तमान के पार्श्व-द्वय में विराजमान होकर व्यक्ति एवं समाज के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर प्रगति में पूर्णता लाने की ओर प्रेरित करती है।
साहित्य-सर्जन का प्रेरक तत्व क्या है, इस विषय पर विभिन्न मनीषियों के विभिन्न मत हैं। जीवन की गति के क्रम को शब्दों में बाँधकर शाश्वत रूप देने के प्रयास को ही साहित्य-सृष्टि का प्रेरक कारण माना जाता है।
ग्रीक पंडित अरस्तू का मत है कि ‘‘मानव की अनुकरण वृत्ति ही साहित्य का उद्गम स्थल है।’’ र्क्रोचे की दृष्टि में ‘‘आत्माभिव्यंजन ही साहित्य-सृष्टि का मूल स्रोत है।’’ कुछ विद्वानों का विचार है कि ‘‘सौन्दर्य की अनुभूति’’ और ‘‘आनन्द का अतिरेक’’ की व्यंजना ही साहित्य प्रणयन का मूल कारण है।’’ एक कारण यह भी कहा जा सकता है कि ‘‘मानव-जीवन की अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाने का प्रयास ही साहित्य-सर्जन का आधार बिन्दु है। फ्रायड के सिद्धान्त के अनुसार-‘‘साहित्य प्रणयन के कारण शमित-वासनाओं की मानसिक तुष्टि ही है।’’
साहित्य के उद्गम, विकास और प्रसार का कारण या रूप जो भी हो, किन्तु इतना तो निश्चित ही है कि यह मानव-जाति की अनुपम शक्ति और जीवन-दाता है। यह स्वर्गीय सुधा-कलश है, जो जीवन के समग्र रूप को सदा हरा भरा रखता है। जीवन-लता को सूखने का अवसर आते ही अपने हृदय की अमिय-धार उडेल कर अमरत्व की ओर अग्रसर करता है। साहित्य स्वर्गीय विभूति है, जिसमें सारी धरती के अधिवासियों के कल्याण की शक्ति निहित है। व्यक्ति के व्यक्तित्व को विकसित कर समाज के गठन और प्रगति का विधान रचता है।
जीवन-पथ पर भूला-भटका मानव साहित्य के पुनीत प्रकाश से सही मार्ग पा जाता है और उस राह पर तीव्र गति से गन्तव्य स्थल की ओर अग्रसर होता है। व्यक्तिगत जीवन में भी जब कभी विषम परिस्थितियों की उलझनें बढती हैं तो साहित्य की सहायता मुक्ति का अभिनव मार्ग प्रस्तुत
करती है।
साहित्य राष्ट्र की धरोहर है। कोई भी राष्ट्र इसकी उपेक्षा करके प्रगति नहीं कर सकता। किसी देश का साहित्य ही उसके समाज, उसकी सभ्यता एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ का लिखित दस्तावेज होता है। चूँकि साहित्य में सहित का भाव है। सबकुछ खोकर भी अपनी जाति की तस्वीर साहित्य में देख सकते हैं। बिना साहित्यिक साक्षात्कार के हम समुद्र, नदी, पर्वत, वन, उपवन, चन्द्र-सूर्यादि पदार्थों का आन्तरिक सौष्ठव नहीं देख सकते। फूल को जितना साहित्यकार समझता है, उतना शायद भौरा भी नहीं समझता होगा। साहित्य के बिना हम प्राकृतिक सुषमाओं का रस लेने में असमर्थ हो जाते हैं।
कमनीय कामिनी-कटाक्ष और स्मितियुक्त भू-भंगिमा, शिशु की मन्द-मुस्कान, माननि का मान, कृषक-किशोरी का गान, रसलम्पट भ्रमरों का मधुपान, शरत् पूर्णिमा का धवल-विमल हास-विलास, तरंगित जीवन का मदोच्छ्वास, सुरभि-सुमनों का विकास, साहित्य के बिना अपनी अर्थवत्ता को खो बैठते हैं। साहित्य की तेजस्विता हमारे निष्प्राण जीवन में बिजली की शक्ति-संचालन कर कल्याण करती है।
आज भी हम साहित्य में एक ओर राम के धनुष का टंकार सुनते हैं तो दूसरी ओर अर्जुन के गांण्डीव घोष भी। एक ओर भीम के प्रचण्ड भुजदण्डों का गर्जन सुनते हैं तो दूसरी ओर मुरली मनोहर का मधुर मुरलीवादन। साहित्य के शब्दार्थमय शरीर में त्रिलोक और त्रिकाल की सारी स्थूल, सूक्ष्म, यथार्थ-कल्पित, विभिूतियों के दर्शन होते हैं। जहाँ रवि नहीं जा सकता, वहाँ साहित्यकार की पैनी दृष्टि चली जाती है। साहित्य की सुरभि समाज के पारस्परिक द्वेष की दुर्गन्धि को दूर कर देती है।
साहित्य में वह अद्भुत शक्ति है जो अतीत को वर्तमान और वर्त्तमान को भविष्य बना सकता है। वह काँच को कंचन कर सकता है। अदृश्य को दृश्यमान करना उसकी सहज प्रवृत्ति है। साहित्य की तेजस्विता हमारी निष्प्राण नसों में बिजली भरती है। उसी का संदेश हमें स्वतंत्र और जाग्रत होने के लिए प्रेरित करता है। यदि साहित्य हमारे जीवन-व्यापार के साथ नहीं चलेगा तो अपने पूर्वजों से संबंध टूट जाएगा।
भारतीय समाज जब अंग्रजों की दासता के पाश में पंगु और पुरुषत्वहीन होने लगा, तब भारतेन्दु एवं गुप्त के साहित्य ने उसे आत्म-जागरण का उमंग-संकुल संदेश दिया। जातीय जीवन के विकास-क्रम के साथ यदि साहित्य की गति समान्तर नहीं रही, तो वह जाति जीवन-हीन होकर गुलाम बन जायेगी। यदि गुलाम भारतीयों को दासता के दिन में साहित्य ने साहस और सर्वस्व त्याग का दिव्य-मंत्र नहीं दिया होता तथा गाँधी की अहिंसा का अमृत नहीं पिलाया होता, तो कभी भारत आज की आजादी को नहीं पा सका होता। अतः साहित्य में लोक-कल्याण की सीमा का विस्तार अपरिमेय है। ?
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