भीष्म साहनी कहानियों में मानवीय संवेदना

डॉ. पंकज साहा


हिंदी साहित्य जगत् में विगत कुछ वर्षों से साहित्यकारों की जोर-शोर से जन्म-शताब्दी मनाने का सुखद चलन आरंभ हुआ है। हिंदी के अनेक साहित्यकार जो सदियों से अचर्चित रहे होते हैं, अपनी जन्म-शताब्दी में अचानक चर्चाओं एवं विमर्शों के केंद्र में आ जाते हैं। हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार, नाटककार एवं नाट्यकर्मी भीष्म साहनी इसके अपवाद हैं।
प्रेमचंद की जनवादी परंपरा की जमीन पर यशपाल की माक्र्सवादी दृष्टि की खाद डालकर हिंदी कथा-साहित्य म एक नयी कलम उगाने का सर्वप्रथम स्तुत्य कार्य भीष्मजी ने ही किया। यों तो भीष्मजी ने ‘‘लिया विषय जो हाथ, उसे दूर तक निबाहा’’ उक्ति को अपने रचना-कर्म में सार्थक किया है, परंत उनको पाठकीय प्रसिद्धि सबसे अधिक कहानीकार के रूप में मिली। भीष्मजी ने १२५ कहानियाँ लिखी हैं जो उनके १२ कहानी-संग्रहों में संकलित हैं। ‘चीफ की दावत’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘वाङ्चू’, ‘ओ हरामजादे’, ‘पाली’, ‘साग-मीट’, ‘पहला पाठ’, ‘त्रास’ आदि उनकी अत्यंत चर्चित कहानियाँ हैं।
भीष्मजी नई कहानी की प्रगतिशील धारा के कहानीकार हैं। ‘‘नई कहानी की प्रगतिशील धारा के कहानीकारों में रोमानियत थी, उनकी यथार्थ-दृष्टि अविकसित थी और उनकी भाषा में अनवाश्यक काव्यत्व का मोह था, पर इसके साथ यह भी सही है कि उनमें सामाजिक भमि पर टिकने का प्रयत्न था और वे सामाजिक यथार्थ को समझना तथा सामाजिक शक्तियों के द्वंद्व को पहचानना चाहते थे। वे उच्चतर मानव-मूल्यों में निष्ठा रखते थे, भाषा को यथार्थवादी स्तर तक उठाना चाहते थे और कहानी के रूप को सुरक्षित रखने के पक्ष में थे। इन कहानीकारों में भीष्म साहनी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने धीरे-धीरे नई कहानी के प्रगतिशील कहानीकारों की सीमाओं को जीता और सच्चे अर्थों में एक प्रगतिशील यथार्थवादी कहानीकार के रूप में अपना विकास किया।.....यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि नई काहनी की प्रगतिशील परंपरा ने कहीं सार्थक परिणति प्राप्त की है तो वह भीष्मजी की कहानियों में।’’१
भीष्मजी ने देश-विभाजन के पूर्व के समाज को देखा, विभाजन की त्रासदी को झेला एवं विभाजन के बाद के बदलते समाज के वे साक्षी रहे। इसीलिए उनकी कहानियों में वास्तविकता अधिक है, काल्पनिकता कम। वे इस मायने में अपने समकालीन एवं परवर्ती कहानीकारों से पृथक दिखते हैं कि अत्यंत सहज ढंग से एवं ठंडे शब्दों द्वारा रचना करने के बावजूद पाठकों के मन में बेचैनी एवं हलचल पैदा कर देते हैं।
भीष्मजी की कहानियों के केंद्र में मानव है। मानव एक सामाजिक प्राणी है। समाज का सबसे बडा सत्य मानव-सत्य है। मानव -सत्य के केंद्र में मानवता है। प्रेमचंद की तरह भीष्मजी भी साहित्य में मानववाद के पक्षधर हैं। उन्होंने अपनी ‘‘पाली’’ कहानी में उस इन्सानी रिश्ते को महत्व दिया है, जो धर्म-संप्रदाय, वर्ग और वर्ण की दीवारें लाँघकर आदमी और आदमी के बीच एकात्म कायम करता है। संवेदना के जिस बिन्दु पर पहुँचकर किसी का धर्म, जाति, सम्प्रदाय-सब पृष्ठभूमि में चला जाता है। उजागर होता है, निर्मल-निश्छल अनुभूति का वह रिश्ता, जहां कोई भेद नहीं, दीवार नहीं।’’२
इस कहानी में विभाजन की त्रासदी के बीच मानवीय संवेदना की तलाश लेखक ने की है। देश-विभाजन के पश्चात् मनोहरलाल और उसकी पत्नी तो भारत पहुँच जाते हैं, परंतु उनका बेटा पाली काफिले में ही बिछुडकर पाकिस्तान में रह जाता है। वह एक निःसंतान मुस्लिम दंपत्ति शकूर एवं जैनब के हाथ लगकर मुस्लिम बन जाता है एवं अल्ताफ के रूप में वहाँ उसकी परवरिश होती है। इधर मनोहरलाल और उसकी पत्नी अपने बेटे को भूल नहीं पाते हैं एवं उसकी खोजबीन जारी रखते हैं। अंततः भारत का एक खोजी दल पाकिस्तान में पाली को ढूँढ ही लेता है।
मनोहरलाल कुछ भारतीय अधिकारियेां के साथ शकूर के घर पहुँचता है। वहाँ वह पाली को देखकर भाव-विह्वल हो जाता है। परंतु पाली अपने अतीत को भूल चुका है और शकूर तथा जैनब को ही अपना अब्बा-अम्मी समझता है। मजिस्ट्रेट के सामने एक चित्र को देखकर वह अपने माता-पिता को पहचान लेता है। धर्म-संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। न तो शकूर और जैनब अल्ताफ को छोडना चाहते हैं और न मौलवी अल्ताफ को मनोहरलाल के हवाले करने को तैयार होता है। तब मनोहरलाल टाट के पर्दे के पास जाकर जैनब से विनती करता है, ‘‘बहन मैं तुमसे बच्चे की नहीं, अपनी घरवाली की जान की भीख माँगने आया हूँ। वह अपने दोनों बच्चे खो चुकी है। पाली के बिना वह पागल हुई जा रही है। वह दिन-रात तडफती रहती है। उस पर तरस खाओ।’’३
मनोहरलाल के इस कथन से जैनब पिघल जाती है और अपने दिल पर पत्थर रखकर कहती है, ‘‘ले जाओ अपने बच्चे को। हम नहीं चाहते किसी बदनसीब की बद्दुआ हमें लगे.....’’४
इस मानवीय संवेदना को व्यक्त कर भीष्मजी रूक नहीं जाते हैं। इसकी पराकाष्ठा तब दिखलाई पडती है जब हिदुस्तान में रह रहे अपने बेटे अल्ताफ के गम में आँसू बहाने वाली जैनब एक दिन अपने आँसू पोंछती हुई शकूर से कहती है, ‘‘क्यों जी, ईद पर आएगा न ? उसे वे लोग भेजेंगे न? क्या उससे मिलने नहीं जा सकते?.... तुम कहते थे न कि तुम्हारा कोई नाती बरेली में रहता है। हम उसके पास जा रहगे और बेटे से मिल आएँगे।’’५
इस कहानी पर टिप्पणी करते हुए डॉ. कृष्णा पटेल ने सत्य ही कहा है, ‘‘मानवीय संवेदना के स्तर पर लिखी गयी यह कहानी लेखक की मार्मिक कहानियों में एक है। लेखक ने इसमें सांप्रदायिकता की भयावहता से परे, मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा की है। बडी विश्वसनीयता के साथ भीष्मजी ने बच्चे को केंद्र में रखकर इन्सानियत की निश्छल-निर्मल छवि को उजागर किया है। विस्मय की बात तो यह है
कि इस कहानी पर समीक्षकों का ध्यान अब-तक गया ही नहीं।’’६
मानवीय संवेदना की दृष्टि से भीष्मजी की ‘झुटपुटा’ कहानी भी उल्लेखनीय है। इस कहानी की कथा स्व. इंदिरा गांधी की हत्या के उपरांत हिंदुओं का सिक्खों पर अमानवीय अत्याचार, उनकी हत्या, उनकी संपत्ति की लूट-पाट आदि पर आधारित है। उन घटनाओं की वीभत्सता का वर्णन करने के उपरांत कहानीकार भोर के झुटपुटे में दूध लेने की लाइन में खडे प्रो. कन्हैयालाल की संवेदनात्मक सोच को अभिव्यक्त करता है। दूध बूथ तक नहीं पहुँचा था, क्योंकि दूध पहुँचाने वाली लॉरी के सारे ड्राइवर सरदारजी थे। दंगे के उस माहौल में कोई भी सरदार ड्राइवर अपनी जान का जोखिम उठाने को तैयार नहीं था। लेकिन एक सरदार ड्राइवर अपनी जान की परवाह किये बिना दूध की लॉरी लेकर आता है। प्रो. कन्हैयालाल के पूछने पर वह कहता है, ‘‘बाबा, बच्चों ने दूध तो पीना है ना! मैंने कहा, चल मना, देखा जाएगा जो होगा। दूध तो पहुँचा आएँ।’’७
यह जाति, धर्म, संप्रदाय से अलग मानव की वह संवेदना है, जिसके कारण ही कोई भी समाज अपने उच्चतर मानव-मूल्यों के साथ जीवित रहता है। इस कहानी की मानवता के संदर्भ में श्री महेश दर्पण ने लिखा है, ‘‘१९८४ के दंगों के बाद अपनी कहानी ‘‘झुटपुटा’’ में भी भीष्म साहनी ने एक जिम्मेदार रचनाकार का स्वर प्रस्तुत किया है। इन्सानियत का तकाजा यहाँ भी सबसे ऊपर तरजीह पाता है। तमाम खतरे मोल लेकर सरदारजी दूध पहुँचाते हैं। मानवतावाद की अपनी विरासत को भीष्म साहनी का कहानीकार व्यक्ति को बडे परिप्रेक्ष्य में देखने वाली दृष्टि के रूप में ग्रहण करता है।’’८
इस कहानी में बलराम एक हिंदू युवक है जो उस दंगे के माहौल में एक सरदार-परिवार की खोज-खबर लेकर अपनी मानवता का परिचय देता है।
सांप्रदायिक दंगों के बीच पाकिस्तान में एक हिंदू-परिवार को आश्रय देकर मानवता दिखाने का वर्णन भीष्म जी ने अपनी कहानी ‘सलमा आपा’ में किया है।
भीष्मजी की ‘वाङ्चू’ कहानी एक चीनी बौद्ध भिक्षु वाङ्चू के जीवन को केंद्र कर लिखी गई है। वाङ्चू एक सरल हृदय, ईमानदार एवं ज्ञानपिपासु व्यक्ति था। भारत में बहुत दिनों तक रह जाने के कारण वह स्वयं को भारतीय मानता था। परंतु भारत-चीन के बिगडते रिश्ते के कारण उसे भारत और चीन में शंका की नजरों से देखा जाने लगा। दोनों देशों की राजनीतिक संवेदन-हीनता के कारण दोनों देशों के प्रशासन द्वारा उसे इतना परेशान किया जाता है कि यातनाग्रस्त, थका-हारा वाङ्चू एक दिन सारनाथ के खंडहर में दम तोड देता है। ‘‘गलत राजनीति दो देशों के बीच में मानवीय और सांस्कृतिक संबंध को नहीं देख पाती है, जबकि राजनीति का आधार इसी तरह का संबंध होना चाहिए। वाङचू वस्तुतः न चीनी था, न भारतीय। वह मात्र मनुष्य था और इसलिए वह चीनी भी था और भारतीय भी। इस बात को गलत राजनीति ने नहीं समझा और मानव-मूल्यों की उपेक्षा की गयी।’’9
यह कहानी जहाँ दो देशों की संवेदनहीनता को दर्शाती है वहीं सारनाथ के एक कैंटीन के रसोइये की संवेदनशीलता का उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। रसोइया लेखक को वाङचू की भद्रता एवं उसकी पीडा बताते हुए रो पडता है। लेखक के शब्दों में, ‘‘और उसकी आँखें डबडबा आयीं। सारे संसार में शायद यही अकेला जीव था, जिसने वाङचू की मौत पर दो आँसू बहाये थे।’’१०
अपनी ‘‘निशाचर’’ कहानी में भीष्मजी ने महानगरों में रहने वाले सर्वहारा वर्ग के संघर्ष को अत्यंत विश्वसनीयता के साथ उजागर किया है। इस कहानी में लेखक ने जहाँ रद्दी बटोरने वाली केसरो और उसकी बेटी के माध्यम से सर्वहारा वर्ग का जीवन-संघर्ष, उनकी विवशताओं, उनकी संवेदनाओं एवं उनकी मानवीयता का मार्मिक अंकन किया है, वहीं जमादार जैसे अधिकार-प्राप्त व्यक्तियों की क्रूरता भी व्यंजित की है।
उनकी ‘‘खून का रिश्ता’’, पटरियाँ, ‘‘गंगों का जाया’’, ‘‘शिष्टाचार’’ जैसी कहानियों में जहाँ समाज के निम* वर्ग का जीवन-संघर्ष, उनकी समस्याएँ, उनकी विवशताएँ, उनकी मानवीय संवेदना उद्घाटित हुई हैं, वहीं मध्य वर्ग एवं संपन्न वर्ग की ओछी मानसिकता भी व्यक्त हुई है। ‘‘भीष्मजी ने जिस मानववाद को स्वीकार किया है उसका आधार वह वैज्ञानिक समाजवाद है जो श्रम-जीवी समुदाय को शोषण से मुक्ति दिलाकर समता पर आधारित उस समाज का निर्माण करता है जो सभी मनुष्यों के सामंजस्य पूर्ण विकास
और सभी व्यक्तियों की वास्तविकत स्वंतत्रता के लिए
अनिवार्य है।’’११
सारांशतः कहा जा सकता है कि भीष्मजी ने जीवन के उस उच्च मूल्य को, जिसे मानवता कहते हैं, समाज के निम* एवं सर्वहारा वर्ग में ही अधिक पाया है। समाज के उच्च वर्ग की शोषण-वृत्ति एवं मध्य वर्ग की अवसरवादिता, संवेदनहीनता, कुंठा, लालसा, के तो वे कटु आलोचक हैं।?
संदर्भ-
१. नंदकिशोर नवल, नई कहानी की परिणति, प्रेमचंद का सौंदर्यशास्त्र, संभावन प्रकाशन, हापुड, पृ.-११९
२. कृष्ना पटेल, कथाकार भीष्म साहनी, चिंतन प्रकाशन, कानपुर, पृ.-२७१
३. भीष्म साहनी, पाली, पृ.-२८
४. वही, पृ.-२८
५. वही, पृ.-३४
6. कृष्ना पटेल, कथाकार भीष्म साहनी, चिंतन प्रकाशन, कानपुर, पृ.-२७२
७. भीष्म सहानी, झुटपुटा, पृ.-८६
८. महेश दर्पण, इंद्रधनुष, बीसवीं शताब्दी की हिंदी कहानियाँ, पृ.-२३
९. राजेश्वर सक्सेना, प्रताप ठाकुर, भीष्म साहनी ः व्यक्ति और रचना, पृ.-१०४,
१०. भीष्म सहानी, वाङचू (कहानियां, सं.-डॉ. शुकदेव सिंह, अनुराग प्रकाशन, वाराणसी, पृ.-७१)
११. नंदकिशोर नवल, नई कहानी की परिणति, प्रेमचंद का सौंदर्यशास्त्र, संभावना प्रकाशन, हापुड, पृ.-१२०
गोपाल नगर, झपाटापुर, खडगपुर (प. बंगाल)-७२१३०१
मो. ०९४३४८९४१९०