हिन्दी के प्रमुख साठोत्तरी उपन्यास

डॉ. सरला शर्मा



आधुनिक हिन्दी साहित्य में स्वातंत्र्योत्तर काल तो अपना विशेष महत्व रखता ही है किन्तु सन् साठ का वर्ष भी अपनी अलग पहचान, विशेषता लिए हुए है। डॉ. रामगोपाल सिंह चौहान के शब्दों में-‘‘साठोत्तरी युवा लेखक ने अपनी रचनाओं को अनछुई दिशाओं की ओर मोड दिया है। साठोत्तरी हिन्दी उपन्यासों की जो नयी युवा पीढी उभरी उसमें अपने युग की समस्त चेतना, संवेदना की झाँकी देखी जा सकती है। इस युग के उपन्यासकारों ने उपन्यास क्षेत्र में अनेक नये प्रयोग किए हैं। साठ के बाद का हिन्दी उपन्यास व्यक्तित्वबोध, युगबोध, भावबोध और नई संवेदना का उपन्यास है। साठोत्तरी हिन्दी उपन्यास अपने पूर्ववर्ती परम्परागत मान्यताओं, मूल्यों तथा जीवनगत समस्याओं के साथ वहीं नहीं रूका प्रत्युक्त बहुत आगे बढ गया है।’’
साठोत्तरी उपन्यासों का उद्देश्य, ध्येय, साध्य तथा अभिव्यक्ति का माध्यम सभी कुछ बदल गए हैं। उपन्यास का अब यह उद्देश्य माना जाने लगा है कि उसके माध्यम से मनुष्य का अपने भोगे हुए यथार्थ से साक्षात्कार हो और प्रकृति, परिवेश, सामाजिक व्यवस्था तथा अन्तरंग भावना के बीच तथा अर्थपूर्ण सामंजस्य स्थापित हो सके।
साठोत्तरी उपन्यास में आज के जीवन तथा उसके फैलाव को पूर्ण रूप से विविधता के साथ प्रस्तुत करने का प्रामाणिक प्रयास किया है। ‘भारतीय जीवन के महानगर, नगर-कस्बा तथा गाँव की जिन्दगी की विविध समस्याएँ तथा उनके रूप इन उपन्यासों में यथार्थ धरातल पर चित्रित किए गये। इस पीढी के उपन्यासकारों मन्नु भण्डारी, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, राजकमल चौधरी, गोविन्द मिश्र ने समाज के विभिन्न वर्गो की अनेकविध समस्याओं के साथ ही भ्रष्ट एवं आलसी नौकरशाही, दिन-प्रतिदिन टूटती न्याय-व्यवस्था, फिल्म जगत की विभीषिकाए, आपातकाल का उत्पीडन, पुलिस की अन्धाधुँदता आदि समाज को घेरे विभिन्न प्रश्ा*ों को उपन्यासों की विषयवस्तु के रूप में उजागर किया है।
राजकमल चौधरी के ‘शहर था नहीं था’ उपन्यास में जिजीविषा और सेक्स की अनुभूति व्यक्त हुई, जिसके परिणामस्वरूप विघटन, संत्रास और अजनबीपन उभर कर आते हैं। ‘मछली मरी हुई’ उपन्यास में समलैंगिक यौनाचार में लिप्त स्त्रियों की कथा कही गई है।
महेन्द्र भल्ला के ‘एक पति के नोट्स’ में सेक्स की बोरियत के साथ रोज के जीवन की ऊ ब उभर आई है। दूसरे उपन्यास ‘दूसरी तरफ’ के मूल में काले ओर गोरे के रंगभेद की विसंगति चित्रित है। एक भारतीय विदेश में जाकर नौकरी की तलाश करता है, परन्तु रंगभेद की भावना उसके मन को बुरी तरह कचोटती है।
उषा प्रियवंद के ‘रूकोगी नहीं राधिका’ उपन्यास की नायिका विदेश जाकर जडता के बोध में बन्द हो जाती है। अपने में कुछ न बदलने की अनुभूति उसके मन पर हावी रहती है। इनके ‘पचपन खम्भे लाल दीवारें’ उपन्यास में आधुनिक बोध का गहरा रूप उभरा है।
श्रीकान्त वर्मा ‘दूसरी बार’ उपन्यास का नायक पुंसत्वहीनता की स्थिति में अपने आपको अपमानित महसूस करता है और शहर छोडने की बात सोचता है, परन्तु उसे न छोडने के लिए विवश है।
हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकारों में राजेन्द्र यादव का प्रमुख स्थान है। उनके प्रमुख उपन्यास हैं ‘प्रेम बोलते हैं’, ‘कुलटा’ ‘उखडे हुए लोग’ और ‘अनदेखे अनजान पुल’ ‘उखडे हुए लोग’ ‘कुलटा’ उपन्यास व्यक्तिपरक हैं। व्यक्ति के बनते-बिगडते सम्बन्धों का सुन्दर व यथार्थ चित्रण किया है यादवजी ने। एक व्यक्ति समाज के नियमों के चलते उसमें कैद होकर रह जाता है, पर उसकी इच्छाओं और कामना का दमन हो जाता है। समाज के नियमों को तोडकर व्यक्ति जब अपने बारे में सोचने लगता है, अपने आसपास की दुनिया भुलाकर अपनी दुनिया में मस्त होने लगता है तब कहीं कुछ बिगडता-बनता दिखाई देता है। इसी का मनोहारी चित्रण हुआ है राजेन्द्र यादव जी के उपन्यासों में।
हिन्दी उपन्यास साहित्य जगत में मन्नु भण्डारी लिखित ‘‘आपका बंटी’’ उत्कृष्ट उपन्यास माना जाता है। माता-पिता के बीच तलाक की नौबत आने पर उनके बेटे बंटी की मनःस्थिति का लेखिका ने मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया है।
अजय और शकुन का तलाक हो जाता है। उनका इकलौता पुत्र बंटी शकुन के पास रहता है। अजय दूसरा विवाह कर लेता है। शकुन भी डॉ. जोशी से विवाह कर लेती है जिसके चलते बंटी का भविष्य अंधेरे में खो जाता है। नये घर में किस प्रकार बंटी खुद को उपेक्षित महसूस करता हुआ हर पल प्रश्ा*ों से घिरा रहता है, इसका मन्नु भण्डारी ने यथार्थ चित्र उभारा है। आधुनिक युग में
बदलते पारिवारिक सम्बन्धों और तलाक के कारण बच्चों पर पडते मानसिक प्रभाव का सार्थक और यथार्थ चित्रण है ‘आपका बंटी’।
गोविन्द मिश्र का पहला उपन्यास है ‘वह अपना चेहरा’। मिश्रजी के अब तक सात उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उनका प्रत्येक उपन्यास विभिन्न पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। उनके उपन्यासों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्षो, उलझनों तथा मुश्किलों की कहानी है।
‘वह अपना चेहरा’ सरकारी दफ्तर की खींचतान का चेहरा दिखाता है। ‘उतरी हुई धूप’ प्रेम और उसकी विवाह में परिणति न होने पर उत्पन्न व्यथा की कहानी है। ‘लाल-पीली जमीन’ एक कस्बे की कहानी है, जहाँ का पूरा परिवेश ही हिंसक है। ‘लाल-पीली जमीन’ उपन्यास पढकर लगता है कि ‘तुम्हारी रोशनी में’ ‘धीरे समीरे’ उपन्यास भी उसी साहित्यकार की रचनाएँ हैं। ‘पाँच आँगनों वाला घर’ संयुक्त परिवार की कहानी है। जहां का हर सदस्य सहयोग और सद्भाव से ओत-प्रोत है। मिश्रजी ने बताया कि किस प्रकार पीढी-दर पीढी व्यक्ति अपने नैतिक मूल्यों से दूर होकर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने में लगा हुआ है। ‘पाँच आँगनोंवाला घर’ पूरी तरह परम्पराओं से बंधे हुए हिन्दुस्तानी परिवार की कहानी है। मिश्रजी के दूसरे उल्लेखनीय उपन्यास हैं-‘तुम्हारी रोशनी में’, ‘धीरे-समीरे’, ‘हुजूर दरबार’।
‘तुम्हारी रोशनी में’ उपन्यास में प्रेम सम्बन्धों का चित्रण और जीवन में प्रेम के महत्व को दिखाया गया है। उपन्यास की नायिका सुवर्णा पढी-लिखी, सुन्दर कामकाजी महिला है। ‘‘सुवर्णा अपने हिस्से की आजादी चाहती है। उपन्यास पढते समय सुवर्णा की एक छवि तैयार हो जाती है। लगता है जैसे सुवर्णा हमारे ही अन्दर कहीं है। भरीपूरी जिन्दगी, स्वतंत्रता, अपने अधिकार सब कुछ है, सुवर्णा के पास, बस कुछ नहीं है तो प्यार और वो प्यार अन्नत से मिलता है। मिश्रजी ने सुवर्णा का इतना सजीव चित्रण किया है कि पढने के बाद एक जीवन्त स्मृति की तरह हमारे मन में समा जाता है। वल्लभ सिद्धार्थ के शब्दों में यह कह सकते हैं कि गोविन्द मिश्र ने यह उपन्यास लिखा नहीं है, बस लिख गया है। मिश्रजी ने इस उपन्यास के द्वारा बताया है कि प्रेम वही है जो हमारे भीतर रोशनी भर दे।
मिश्रजी का ‘धीरे समीरे’ प्रेम और विश्वास की यात्रा है। नंदन उसे ब्रजयात्रा में मिलता है, दोनों में प्रेम हो जाता है और वे विवाह कर लेते हैं, पर नंदन का लेखकीय दंभ उन्हें जल्द ही अलग कर देता है। फिर एक वकील सत्येन्द्र है, जो सुनंदा को ब्रजयात्रा में मिलता है। ‘धीरे समीरे’ ब्रजयात्रा में आए सुनंदा, सत्येंद्र, शैलजा, मंजुला बेन, नरेन्द्र, रघु भैया के मनोभावों को व्यक्त करता उपन्यास है। ‘धीरे समीरे’ में मिश्रजी ने ब्रज को पूरी रागात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है। यात्रा में शामिल तमाम यात्री अपनी समस्याओं के साथ चल रहे हैं। सभी के अपने-अपने द्वन्द्व हैं। कहने को तो ये ब्रजयात्रा में आए हैं पर असल में वे सभी खुद से जूझ रहे हैं। वे ब्रजयात्रा के साथ ही अंतर्यात्रा पर भी हैं।
‘गोविन्द मिश्रजी’ के उपन्यासों में प्रेम की धारा है तो कहीं पारिवारिक समस्याएं हैं तो कहीं नारी जागरण का आग्रह भी है। ‘उतरती हुई धूप’ प्रेम सम्बन्धों और विवाह के बाद नारी के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। ‘लाल-पीली जमीन’मध्यमवर्गीय शोषित तथा बिगडे हुए समाज की हिंसा की कहानी कहता है।
‘तुम्हारी रोशनी’ में प्रेम की महिमा का वर्णन है तो नारी मन की संवेदना की कहानी है। ‘‘पांच आंगनों वाला घर’ संयुक्त परिवार की कहानी है जो समय की धार से टूट रहे हैं, उनकी गाथा है। ‘हूजूर दरबार’ नेताओं के बढते स्वार्थ तथा शासन की कहानी है। ‘धीरे-समीरे’ ब्रजयात्रा के साथ-साथ मानव के आंतरिक जगत की हलचलों का चित्र उभरता है।
गोविन्द मिश्रजी यथार्थवादी लेखक हैं। उनके उपन्यासों में मध्यमवर्गीय परिवारों में होने वाले भीतर-बाहर की उथल-पुथल का चित्र स्पष्ट मिलता है तो साथ ही अभिजात्य वर्ग में पनपती प्रेम की ललक का सुन्दर चित्रण भी है। राजनैतिक वर्ग की कमजोरियां है तो कस्बाई वर्ग की मनोवृति का भी यथार्थ और सुन्दर अंकन किया है मिश्रजी ने। मिश्रजी आधुनिक युग में प्रतिभा सम्पन्न उपन्यासकारों में से है। उनका साहित्य सराहनीय रहा है।
सदी के आखिरी दौर में उपन्यासों की चर्चा की जाए तो गिरिराज किशोर का ‘पहला गिरमिटिया- शिवप्रसाद सिंह का ‘नीला चांद’ और कमलेश्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ का नाम सम्मान से लिया जाता है।
शिवप्रसाद सिंह का ‘नीला चांद’ तो एक कालजयी उपन्यास है। शिवप्रसाद सिंह उन लेखकों में से हैं जिन्होंने हिन्दी उपन्यास को एक नई तेजस्विता, आवेग और रचनाधर्मिता के साथ जोडा है।
डॉ. शशिकला राय के अनुसार-हिन्दी उपन्यास साहित्य में जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल की पीढी के बाद जो सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार हुए उनमें शिवप्रसादसिंह का नाम सबसे महत्वपूर्ण है। नीला चांद में काशी अपनी समृद्ध संस्कृति तथा अपनी सम्पूर्ण काव्यात्मकता के साथ मौजूद हैं। ‘नीला चांद’ में काशी के गौरव का इतिहास है। काशी के इतिहास और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्रचना के साथ ही प्रेम की अविष्ट भावधार ‘नीला चांद’ उपन्यास को महाकाव्यात्मक उपन्यास बनाता है। नीला चांद इतिहास में कभी-कभी ही संभव होता है। और खासकर एक विरले किस्म की भाषिक संरचना से वातावरण निर्मित करने में शिवप्रसाद सिह का कोई जवाब नहीं। इस मामले में उत्तराधिकारी है। ’’ दिल्ली को भागदौड वाली जिन्दगी के बीच ‘नीला चाँद’ जैसा चिंतन-मनन कराने वाला उपन्यास हिन्दी उपन्यास साहित्य के लिए अमूल्य निधि है। अपने अन्तिम समय में वे कबीर पर उपन्यास लिखने की तैयारी कर रहे थे।
डॉ. रामगोपाल सिंह चौहान के शब्दों में-‘‘सदी के अन्त में जो उपन्यास लिखे गए उनमें जीवन की भयावहता, यातना, संघर्ष तो थे ही पर साथ ही आम आदमी के हालात को लेकर सत्ता और व्यवस्था के प्रति विद्रोह करते उपन्यास भी मिलते हैं। इनमें योगेश गुप्त का ‘अकारण’ तथा ‘अनायास’ और वल्लभ सिद्धार्थ का ‘कठघरे’ शक्तिशाली उपन्यास है। श्रीलाल शुक्ल, सत्येन कुमार, शशिभूषण सिहल, ‘रामदरशजी, विष्णु प्रभाकर आदि कई उपन्यासकारों ने उत्कृष्ट
उपन्यास लिखे। ?
संदर्भ-
१. डॉ. रामगोपाल सिंह चौहान, उपन्यास ः २ स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य, ग्रंथ अकादमी, १९९१ पृ. १३
२. डॉ. रामगोपाल सिंह, पूर्वोद्धृत, पृ. ४१
३. गोविन्द मिश्र, ‘धीरे समीरे’, पृ. ३९
४. पूर्वोद्धृत, पृ. ४५
५. शशिकला राय, अक्षरा (५०), विगत दो दशक के हिन्दी उपन्यास, पृ. ८२
६. डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, ‘व्यक्ति, चेतना और स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास, वाणी प्रकाशन, १९८५, पृ. ७०
बी-११, आदर्श नगर, यूनिवर्सिटी रोड, उदयपुर मो. ९४६०७२६८००