हिन्दी के आदि कविः सरहपा

प्रो. जगमलसिंह


हिन्दी साहित्य के विकास काल को डॉ. राजकुमार वर्मा ने संधिकाल कहा है, क्योंकि इस काल में अपभ्रंश के गौरवशाली साहित्य और स्वाभाविक बोली में विकसित साहित्यक शैलियों में संधि होती है। फलतः अपभ्रंश की रूढ साहित्यिक शैली के साथ जनभाषा में सिद्धों और जैन कवि अपनी रचनाऍ प्रस्तुत करने लगे। सिद्ध कवियों में सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रथम नाम सरहपा का है जिन्होंने अर्द्धमागधी अपभ्रंश भाषा में जन-रुचियों के आलोक में अपनी
रचनाएँ की।
सिद्ध कवियों का सम्प्रदाय बौद्ध धर्म की विकसित एक श्ाृंखला है। ईसा की प्रथम शताब्दी में जब कुमारिल और शंकराचार्य के दर्शन ने बौद्ध धर्म और उसमें फैली कुरीतियों पर आघात किया तब अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए बौद्ध धर्म ने अपना स्वरूप ही बदल कर हीनयान और महायान में परिणतः हो गया। हीनयान बौद्ध धर्म का चिन्तन या सैद्धान्तिक पक्ष था। और महायान व्यावहारिक पक्ष। महायान में सरल साधना से तंत्र और अभिचार का आश्रय लेकर सिद्धि प्राप्त करने की प्रक्रिया अपनाई गई। जिसके साधक सिद्ध नाम से जाने गए।
सिद्ध साहित्य का काल सं. ७५० से माना जाता है। सिद्धों की कुल संख्या चौरासी है, जिनमें अनेक सिद्ध काव्य रचना करने में समर्थ हुए उनके आविर्भाव के पूर्व से ही बौद्ध धर्म में कुरीतियों ने अपना घर बना लिया था। इन कुरीतियों की विशालता और अन्तर्द्वद्वंताओं के फलस्वरूप ही सिद्धों का पदार्पण हुआ। उनकी चिंतन धाराएँ कई शताब्दियों तक न केवल मागधी (मगही) वाड््.मय वरन् सम्पूर्ण हिन्दी वाड्.मय को प्रभावित करती रहीं।
सिद्धों की कृतियों को उजागर करने का सर्वप्रथम श्रेय महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री को है। उनको सन् १९०७ में नेपाल दरबार पुस्तकालय से सिद्धों के पचास पदों का संग्रह मिला। जिसमें से उन्होंने बंगीय साहित्य परिषद् कलकत्ता संस्कृत सीरिज के अपने दोहा कोश म कुछ सिद्धों की रचनाएं प्रकाशित कराईं। पुनः दासगुप्ता शशि भूषण ने ‘आक्सक्योर रेलिजियस कल्ट्स’ में सिद्धों का परिचय दिया।
सिद्धों को पूर्ण प्रकाश में लाने का प्रयास महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा जो हुआ, वह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वे भूटान और तिब्ब्त से सिद्ध साहित्य के लिखित ग्रंथ खच्चरों पर लादकर भारत लाये। इन्हीं सामग्रियों के आधार पर धर्मवीर भारती ने सिद्ध साहित्य और मंगल बिहारी शरण सिन्हा ने सिद्धों की सांध्य भाषा लिखी। इसके अतिरिक्त हिन्दी साहित्य के इतिहास के प्रेरणा स्रोत रामचन्द्र शुक्ला और डा. रामकुमार वर्मा ने सिद्धों की रचनाओं पर प्रकाश डाला। परन्तु मगही साहित्य के भारतेन्दु डा. रामप्रसाद सिंह ने अपने काव्य खण्ड ‘सरहपाद’(मगही में) में सरहपा के जीवन वृत्त के साथ उनके लोकधर्मी सिद्धांतों एवं कर्ममूलक मानवधर्मी स्वरूपों का सविस्तार वर्णन किया है।
डॉ. विनय तोष भट्टाचार्य ने सरहपा का समय सं. ६९० निर्धारित किया है। परन्तु राहुल सांकृत्यायन के अनुसार वह ८१७ में आविर्भूत हुए। इसी आधार पर डॉ. राम प्रसाद सिंह ने सरहपा का निधन ७८० ई. माना है। ऐसे सिद्ध योगी गृहस्थ की उम्र सामान्यतः सौ वर्ष मान ली जाय तो उनका जन्म ७ वीं शती के अंतिम दशक में होना निर्धारित होता है। यही समय मगध राज धर्मपाल के उदय का भी है। जिसके समकालीन सरहपा को बताया जाता है।
सरहपा का जन्म बिहार राज्य के भागलपुल अनुमंडल के राज्ञी (रानी) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम सरोज था, नांलदा में आने पर बौद्धों की परम्परा में होने के कारण उनको राहुल भद्र और ब्रजयानी होने से सरोज ब्रज कहा जाता था। किन्तु सरह का शाब्दिक अर्थ होता है बाण (शर) बनाने का काम करते थे। अतः उनको सरह भी कहा जाता था। बाद में आदर सूचक शब्द ‘पाद’ सरह भी सरह में जोडने से सरहपाद
हो गया।
सरोज (सरहपा) बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। उन्होंने प्रबुद्ध ब्राह्मण परिवार और ब्राह्माणी व्यवस्था में रहकर घर में ही वेद-पुराण, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत, व्याकरण, संस्कृत साहित्य आदि का गम्भीर अध्ययन एवं मनन किया। किन्तु किशोर मन ब्राह्मणवाद की रूढि और आडम्बर से विचलित होने लगा। यह देख कर उनके माता-पिता ने उनकी शादी कर दी। परन्तु उनका मन परिवार में नहीं लगा।
एक दिन वे चुपचाप घर से निकलकर नदी के किनारे पहुँच गये। देखा नदी का स्वच्छ जल स्वछंद और सहज रूप में प्रवाहित हो रहा है। प्रकृति के सभी प्राणी पशु-पक्षी, जीव-जन्तु और पेड-पौधे अपने कार्य में सहज रूप से लगे हैं। मनुष्य भी क्यों नहीं, इसी प्रकार सहज रूप में चलते।
सरोज की इस अभिधारणा पर गीता के अध्याय १८ को ४८वें श्लोक का प्रभाव परिलक्षित होता है-
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमति न त्यजेत।
सर्वासम्भा हि दोषेण धमेनागि*रिवावृताः।।
अर्थात् हे कुन्ती पुत्र ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धुएं से अगि* की भांति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं।
अतएव सरोज सहज कर्म को स्वीकार कर विरक्त हो गए। वह घूमते-घूमते नांलदा पहुंचे। वहां के विश्वविद्यालय में द्वार परीक्षा हुई। वह उत्तीर्ण हो गए। वहां के छात्र बने। अपना परम्परागत लिबास त्यागकर चीवर धारण किया। वह हरिभद्र के शिष्य बने और राहुल भद्र के नाम से पुकारे जाने लगे। हरिभद्र के शिक्षण और व्यवहार से वे अत्यधिक प्रभावित हो गए। शीघ्र ही कालिदास, बाणभट्ट आदि के संस्कृत साहित्य से परिचित राहुलभद्र बौद्ध धर्म के भी अगाध पंडित बन गए। अपना अध्ययन समाप्त कर नांलदा में ही शिक्षक के पद पर रहकर कार्य करने लगे। संस्कृत काव्य के अतिरिक्त अपभ्रंश मागधी, मगही में भी उन्होंने कविता लिखी। उनका धर्म प्रचार भी मगही के माध्यम से होने लगा।
नालंदा में उनका नागार्जुन, शान्तरक्षित और दिड्नाग जैसे उद्भट शिक्षकों तथा फाहियान और हुड्नसांग जैसे विदेशी विद्वानों से सम्फ हुआ। लेकिन तत्कालीन बौद्धों में कुरीतियां और आडम्बर घुस गए थे। वे सोचने लगे, भगवान बुद्ध की करुणा स्त्रियों के लिए नहीं है। उसकी छाया पाप है? क्या चीवर धारण करने मात्र से मोक्ष प्राप्ति हो जाएगी। यहां चीवर धारण करने से विशेष रूप से रहना पडता है। क्या यह सहज जीवन का विरोधी नहीं है। ऐसा आडम्बर तो हिन्दू धर्म में भी है, तो दोनों में क्या अंतर है? अतएव सहजयान का मार्ग बनाना पडेगा।
राहुल भद्र नालंदा विश्वविद्यालय छोडकर राजगृह के एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां के लोग सरकंडों से बाण बनाते थे। वहां उन्होंने देखा-लोग प्रकृति के सुन्दरतम स्थान में रहकर सहज रूप से अपने अपने कर्म में लगे हैं। उनकी जातियों में उन्होंने एक सुन्दर किशोरी को देखा, जो तरुण अवस्था में ही योगिन के रूप में अपना जीवन सहज रूप में व्यतीत कर रही है। उस पर राहुलभद्र मोहित हो गए। अंत में उससे शादी कर उसके साथ रहने लगे। और सरह (बाण बनाने वाला) का सहज जीवन बिताने लगे। वहां के लोगों को अपना कार्य करने और सहज जीवन तथा कर्मयोग का उपदेश भी देने लगे। इस कारण बडी संख्या में उनके शिष्य बन गये।
सरहपाद बहुज्ञ और बहुश्रुत हो गए। अतः राजगृह के एक स्थान पर नहीं रहकर अपनी सरकन्या के साथ भ्रमण करने लगे। सर्वप्रथम तपोवन होते हुए बोधगया पहुंचे। वहां कुछ दिन ठहर कर दक्षिण की यात्रा करते हुए विदिसा पहुंचे। वहां के श्रीपर्वत पर नागार्जुन से उनका संफ हुआ। वहां अपने सहजयान का उपदेश दिया। उनके शिष्यों में तेजी से वृद्धि होने लगी। तदन्तर वे विंध्याचल पहुंचे वहां उन्होंने देखा कि बडी संख्या में पशुबलि हो रही है। उन्होंने उसका प्रबल विरोध किया। लेकिन जब वे प्रयाग पहुंचे तो उनके उपदेश और सरकन्या को देखकर वहां के विभिन्न धर्मावलम्बियों के साथ उनकी गहन मुठभेड हुई, मारपीट की स्थिति उत्पन्न हो गई। फिर भी बडी संख्या में उनके शिष्य बने। काशी में भी पहुंच कर हिन्दू धर्मावलम्बियों के आडम्बरों का घोर विरोध किया और उन्होंने गंगा किनारे एक निर्जन स्थान पर चौदह दिन तक साधना की, फिर रामधाम साकेत गये और सरयू नदी पर अवस्थित कुछ साधु-संतों को नैरात्म-करुणा का प्रेमामृत घोलकर वहां के संतों को संतुष्ट किया। इसके पश्चात् हिमालय की तराई में जाकर अपनी यात्रा समाप्त की। अंत में राजगृह पहुंचकर उन्होंने अपना स्थाई निवास बना लिया था।
वस्तुतः सरहपाद बौद्ध धर्म के विकसित सहजयान शाखा के जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं, जिनके धर्माचरण और शीलाचरण से सैंकडों वर्षो तक न केवल भारत वरन् दक्षिण-पूर्वी एशिया के समस्त देश स्पन्दित होते हैं।
सरहपाद के सहजयान में सहज कर्म करते हुए सहज जीवन निर्वाह करने की प्रेरणा और नैरात्म (शून्यता) एवं करुणा पर विशेष जोर है। यह सहज स्वाभाविक मानवधर्म सारे कृत्रिम आडंबरों को छोडकर सहज मानवीय गुणों का अनुपोषक है। बौद्ध धर्म करुणा से उपजे सत्य, अहिंसा और सदाचरण पर बल देता है। और संघ शक्ति को स्वीकार करता है। परन्तु गृहस्थ से अधिक संन्यास नहीं मान्यता देता है। इसके विपरीत सहजयान में संन्यास नहीं गृहस्थ को मान्यता दी गई है। यहीं पर सरहपाद का सहजयान बौद्ध धर्म से विलग प्रतीत होता है। वस्तुतः सहजयान मानव का सहज धर्म है, जो गृहस्थों को करुणा और नैरात्म की अनिवार्यता की शिक्षा देता है। करुणा, दुखानुभूति सहानुभूति, और परोपकार एवं सहअस्तित्व के बिना सामाजिक गृहस्थ क्षणभर भी कैसे रह सकता है ? इससे परे एक बात और यह है कि भारतीय धर्म-दर्शन में कुण्डलिनी जाग्रत की बडी कठिन प्रक्रिया हठयोग एवं ध्यान योग के माध्यम में बताई गई है। परन्तु सरहपाद ने शक्ति जागृति के लिए सहजानुभूति एवं आडम्बरहीन स्वच्छ सात्विक वृत्ति पर बल दिया, जिससे सांसारिक द्वन्द्व मिट जाते हैं-साधक विचरने लगता है, निर्द्वन्द्व आनंद लोक में। यह युगनद्ध साधना की सहजानुभूति से उत्पन्न अद्वैतभाव कुंडलिनी शक्ति के द्वारा सहस्त्रार में अमृत पाने के आनंद के समान है।
नैरात्म का अर्थ है शून्यता। अतः जिसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है, समरस है, वह सिद्ध है। सिद्धों में नैरात्म और करुणा का योग होता है। जिसकी अनुभूति से सुख और शांति प्राप्ति होती है। परम संतोष होता है। यही सहजयान का सार है।
सरहपाद का सहजयान बौद्ध धर्म के महायान की शाखा है, जो ब्रजयान से यंत्रयान के रूप में विकसित हुई। उसी का फल है कि सिद्धनाथ और ज्ञानश्रयी अथवा संत साहित्य दर्शनीय है। सिद्धों की कुल संख्या चौरासी है। उनमें दस को राहुल ने सर्वाधिक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण माना है। जिनमें सरहपाद को हिंदी का प्रथम कवि कहा है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने सरहपाद को हिंदी का प्रथम कवि माना है। उनकी रचनाओं का प्रभाव उस काल के हिंदी साहित्य की परम्परा पर पडा है।
राहुल ने सरहपाद के नाम से ग्रंथों की चर्चा की है। जिनमें निम*ांकित प्रमुख हैं-१)दोहा कोश गीति २)दो कोश नाम चर्चा नीति ३) दोहकोशोपदेश नीति४)क-ख दोहा नाम ५)क-ख दोहा टिप्पणी ६)काय कोशमृत गीति ७)वाक कोश रूचिर स्वर व्रजगीति ८)चित्तकोशा व्रजगीति ९)कायवाक चितामन सिकार १०)दोहा कोश महा मुद्रापदेश ११)द्वादशोपदेश गाथा १२)स्वाधिष्ठान क्रम १३) तत्वोपदेश शिखर गीतिका १४)भावना दृष्टि चर्चा फल दोहा
गीति १५)वंसत तिलक दोहा और १६)महा मुद्रापदेश
वज्रगुह्म संगीति।
इन गं*थों में सरहपाद के सहजयान के सिद्धांत एवं विचार से वर्णित है। कुछ द्रष्टव्य है-
जइ जग पूरिया सहजणन्दे,
णच्चहु गावहु विलसहु चंगे।
विसअ रमन्तण विषअहि लिप्पइ,
उ अअ हरंतण पाणी च्छुप्पइ।
णउ घरे णउ वणे बोहि ठउ,
एहु परिआणउ भेउ।
णिमल चित्त सहावता,
करहु अविकल सेहु।
बिस आसत्ति म बन्धकरू, अरे बढ सरहे बत्त,
मौन पअड्गम करि भमर, पेव रव्रह हरिणह जुत्त।
नाद न विंदु न रवि न शशि मंडल,
चिअराअ सहबे मूकल।
जहि मन पवन न संचरइ, रवि नाहि पवेश,
तहि घट चित विसाम करू, सरेहे कहिअ उबेस।
सरहपाद अधिकतर नालंदा, राजगृह और विक्रमशिला में रहे हैं। अतः उनके काव्यों की भाषा इन स्थानों और इनके आस-पास में रहने वाले बिहार के लोगों द्वारा बोली अर्धमागधी (मगही) अपभ्रंश है, जिसकों ‘संधा’ भाषा कहा गया है।
सिद्धों ने जिस मगही भाषा का प्रयोग किया था, वह थोडे परिवर्तन से आज वर्तमान है। डॉ. सम्पति अर्याणी ने तो सरहपाद के दोहे को वर्तमान मगही भाषा में रूपांतरित कर उनकी भाषा को मगही के सन्निकट किया है। द्रष्टव्य है
नगर बाहिरे डोम्बि तोहोरि कुडिया
छाड-छई जाड सो ब्राह्मण नाडिया
अलो डोम्बी तोर संयकारिब न संग
निधिण कान्ह कापाल जोगी लांग।
मगही---
नगर बाहरे डोम्बी तोहार कुटिया
छुइ-छुह जाइ से बाभन लडिया
अरे डेम्बि तोरे साथ करब न संग
निरधिन कान्ह कापाल जोगी लंग।
सरहपाद ने जनभाषा मागधी में कविता लिखने की जो परम्परा प्रारम्भ की उसका ही प्रभाव हिन्दी साहित्य के भक्ति काव्य पर रहा। नाथ पंथियों से लेकर कबीर आदि की कविताओं में सामाजिक रूढियों और आडम्बरों के विरोध में जो अक्खडपन मिलता है, वह सरहपाद की देन है। योग साधना में भी इनका प्रभाव देखा जा सकता है। सामाजिक जीवन का जो चित्र इन्होंने उकेरा है वह भक्तिकालीन काव्यों का प्रबल आधार बना है और कृष्ण भक्ति के मूल में जो प्रवृत्ति मार्ग है, उसकी प्रेरणा का सूत्र भी इनके साहित्य में मिलता है।
वस्तुतः उन्होंने एक महान प्रगतिशील चिंतक के रूप में धर्म, दर्शन, समाज, भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में नई क्रांति और मानव धर्मिता का मार्ग प्रशस्त किया। उनमें बुद्ध की करुणा और मानवता का ऐसा परिपाक था जिसमें भविष्य के लिए दिव्य संदेश भरा था। उसी का अनुकरण कर नाथ पंथियों एवं कबीर पंथियों ने अपना आधार पुष्ट किया। सरहपाद हिन्दी-साहित्य के संधिकाल के एक ऐसे सिद्ध कवि हैं, जिन्होंने अपने साहित्य में हिन्दी-साहित्य में अपभ्रंश को अनेक विशेषताओं को धरोहर के रूप में समाविष्ट किया था जो साहित्य के क्रमिक विकास का सूत्र है। ?
२/४८ प्रताप नगर, ब्यावर-३०५९०१