वैश्वीकरण के दौर में हिंदी के बढते कदम

डॉ. मंजु पु. तरडेजा (सिंघाणी)


‘‘किसी भी राष्ट्र की संस्कृति और अस्मिता की पहचान उसकी अपनी भाषा से होती है। विश्व में वही राष्ट्र प्रतिष्ठा और सम्मान का पात्र होता है। जिसे अपनी भाषा, संस्कृति और संस्कारों पर गर्व होता है। हम अपनी भाषा के माध्यम से ही अपने साहित्य, संगीत तथा सभ्यता से परिचित हो सकते हैं। संसार की अनेक भाषाओं की जननी संस्कृत है हिंदी इसी संस्कृत का तद्भव रूप है। अर्थात संस्कृत भाषा अपभ्रंश की गलियों से गुजरती हुई आधुनिक हिंदी बनी। भाषा के रूप में हिंदी में न केवल संस्कृति से और यूरोपीय भाषा परिवार से तथा पर्शियन भाषा से बल्कि भारतदेशीय भाषाओं से भी उर्जा का संचार होता रहा है और ये भाषाएं हिंदी को सामर्थ्य प्रदान करती रही हैं, जो हिंदी की विशेषता है।’’१ साहित्याचार्य डॉ. शीलम्, वेंकटेश्वर राव के अनुसार-‘हिन्दी केवल भाषा नहीं, अपितु समस्त देश की संस्कृति और आत्मा भी है।’ हिंदी भारत के सर्वाधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जानेवाली भाषा ही नहीं वरन् विश्व के अनेक देशों में भी इसका व्यापक प्रचार-प्रसार
हुआ है।
बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध भूमंडलीकरण का अद्भूत युग है। इस युग में अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति, कला, संगीत, धर्म, दर्शन, राजनीति और पूरे मानव-चिंतन में परिवर्तन लाने की अद्भूत शक्ति है। भूमंडलीकरण विमर्श के केंद्र में है। दरअसल, वैश्वीकरण एक प्रक्रिया, जो गत ५०० वर्षों से चल रहा है, लेकिन १९९१ में सोवियत संघ के टूटने के बाद इसकी गति ते*ा हुई है। बा*ाार के प्रभाव से संस्कृति या भाषा भी अछूती नहीं रह गई है। अतएव, आज हिंदी का भूमंडलीकरण हो रहा है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का व्यापार के लिए बडे पैमाने पर भारत में पूंजीनिवेश, भारतीयों की विश्व के विविध देशों में पद-प्रतिष्ठा तथा विज्ञान व सामाजिक ज्ञान के क्षेत्र में उत्तरोत्तर सम्मानजनक स्थिति से विश्व-पटल पर इक्कीसवीं सदी की महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। इन बहुद्देशीय कंपनियों को भारतीय भाषाओं से भले ही कोई लगाव न हो, तो भी बा*ाार की शक्ति द्वारा इन बहुद्देशीय क ंपनियों का भविष्य इन भाषाओं पर टिका हैं। गौरतलब है कि व्यापार की कार्यप्रणाली तभी गति पकड सकती है जब लेन-देन का काम उपभोक्ता या खदीददार की भाषा में किया जाए। जर्मन, फ्रांसीसी, चीनी कंपनियों को अपना माल हमारे बा*ाारों में बेचना है तो हिन्दी से बचा नहीं जा सकता। व्यापारी उसी भाषा में ग्राहक से बात करेगा जिस भाषा में उसके माल की बिक्री होगी। उसका काम अंग्रेजी से नहीं चलेगा। यहाँ वह हिंदी ही बोलेगा तो धन कमाएगा। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं का और हिंदी का भविष्य बा*ाारवाद के युग में उज्ज्वल है। भूमंडलीकरण से ‘विज्ञापन हिंदी’ का विकास और संवर्धन तो हो रहा है, लेकिन हिंदी के एक नये स्वरूप की जिसमें आप हिंदी बोल तो सकते हैं, किंतु लिखने-पढने के लिए विदेशी भाषा का सहारा लेते हैं, जैसे कि यह विज्ञापन *ष्ठद्बद्य रूड्डड्डठ्ठद्दद्ग रूश्ाह्म्द्ग* दिल मांगे मोर।
अब बहुतों को समझ में आ गया है कि रूपर्ट मर्डोक अपना चैनल हिंदी में चलाने के लिए क्यों लपक रहे हैं? क्यों बिल गेटस भारतीय भाषाओं में सॉफ्टवेअर बनाने को लालायित हैं? कम्प्यूटर और फोन वाले भारत में दिन-रात बढ रहे हैं। वे प्रयोग की कौन सी भाषा अपना रहे है? भारतीय भाषाएँ या अंग्रेजी? मोबाइल फोन वाली कंपनियां अब फोनों पर कौनसी भाषाएं डायल कर रही हैं? हर तरफ भारतीय भाषाओं का, हिंदी का बा*ाार गरम है। विदेशी लोग हिंदी सीख रहे हैं ताकि वे हिंदी में व्यापार कर सकें। अमरिकी सरकार हिंदी सीखने-सिखाने पर करोडों डॉलर खर्च कर रही है ताकि वह भारत से अरबों कमा सके।
उत्तर आधुनिकता के काल में बा*ाारवाद और भाषा संस्कृ ति को लेकर जो उत्तेजक बहसें हैं उनमें जाने का यहाँ औचित्य नहीं है। लेकिन जानना जरूरी है कि इनके मुद्दे बहुआयामी, जटिल और अधिक से अधिक मुनाफा कमाने से जुडे हैं। नव पूँजीवाद पूरी दुनिया को एक शॉपिंग काम्पलेक्स में बदल रहा है। हर ची*ा बिकाऊ है चाहे औरत की देह हो या कैमरा या साबून, पूरा अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र बाजारवाद पर निगाह लगााए हुए है। बा*ाार की अर्थव्यवस्था, वैश्विक पूँजी, उपभोक्ता संस्कृति, मीडिया क्रांति, उच्च टेक्नोलॉजी सभी कुछ स्थिति-परिस्थिति के दबाव से भाषा को बदल रहे हैं। संस्कृति, संचार और संप्रेषण का क्षेत्र इस गति में बदल रहा हैं कि बदलाव को ठीक से परिभाषित करना कठिन हो गया है। अकेली हिंदी में न जाने कितने शब्द मीडिया क्रांति से आ रहे हैं और हिन्दी उन्हें अपनाकर फैल रही है। मीडिया के क्षेत्र में भी हिन्दी का प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा है। मीडिया एक ऐसा माध्यम है, जिसका मुख्य कार्य संप्रेषण है। संपे*षण के लिए एक जनभाषा आवश्यक है ताकि मीडिया अपनी बातों को जनसाधारण तक पहुँचा सके। इसीलिए, आजकल हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ, हिंदी न्यूज चैनल बडी संख्या में लोकप्रिय हो रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त भारतीय जन संचार संस्थान आज मीडिया के क्षेत्र में विश्वस्तरीय पत्रकारों को
जन्म दे रहा है।
बोलने और समझने वालों की संख्या की दृष्टि से मंदारिन के बाद हिंदी संसार की दूसरी सबसे बडी भाषा है और हर महाद्वीप में मौजूद है। इस आधार पर हिंदी को एक विश्वभाषा माना जा सकता है लेकिन इस आधार पर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में छठी भाषा के रूप में मान्यता दिए जाने की जो बात जोर-शोर से उठाई जा रही है, वह भी अधिकांशतः एक भावनात्मक मुद्दा ही है जिससे हिंदी की *ामीनी स्थिति में कोई बुनियादी अंतर नहीं पडता, क्योंकि हिंदी अपने ही देश में विस्थापित होती जा रही है। इस संदर्भ में महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन का मंतव्य द्रष्टव्य है-
‘‘कंप्युटर एवं सूचना प्रौद्योगिक में अँग्रेजी का एकाधिकार होने से भारतीय भाषाओं की स्थिति संकटग्रस्त हो गई है। उदाहरण के लिए, हिंदी का गढ माने जाने वाला उत्तर प्रदेश आज अंग्रेजी के रोग से पीडित है। हर जगह अंग्रेजी के बडे-बडे विज्ञापन ही दिखाई पडेंगे। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को इस दौड में पीछे धकेला जा रहा है, बल्कि उन्हें पिछडेपन के प्रतीक के रूप में माना जा रहा है। सिनेमा और अन्य संचार-माध्यमों में तो भारतीय भाषाएँ चलती हैं, लेकिन शिक्षा जगत के व्यावसायीकरण के साथ ही उनकी स्थिति दयनीय बनती जा रही है। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्याालयों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की शिक्षा उपेक्षा की शिकार बन गई है। देशी और सरकारी पाठशालाएँ दिनों ब दिन बंद हो रही हैं और हर जगह पब्लिक स्कूलों का आधिपत्य स्थापित हो रहा है। राजभाषा हिंदी को कागजी भाषा बनाने में हमारे प्रशासकों एवं बुद्धिजीवियों का बडा हाथ रहा है।’’२
‘‘आज देश में किसी भी भाषा का साहित्यकार अपनी रचना को हिंदी में प्रकाशित कराना चाहता है या अपनी रचना का हिंदी भाषा में अनुवाद करवाना चाहता है। विदेशी भाषाओं का सर्वाधिक अनुवाद हिंदी में होता है और खूब बिकता है, चाहे ‘हॅरी पॉटर’ हो या ‘सूटेबल ब्वाय’ या ‘द सेकंड सेक्स’ जैसी पुस्तक हो। इसका कारण, उसका हिंदी प्रेम नहीं, हिंदी की उपयोगिता है। हिंदी ही उसे बडा नया देशव्यापी पाठकवर्ग दे सकती है। इस प्रकार पत्रकारिता के क्षेत्र में, हिंदी में प्रकाशित दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक तथा मासिक पत्र-पत्रिकाओं की संख्या अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में बहुत अधिक है। हिंदी की इस व्यापकता के कारण आज दुनिया में हिंदी को देश की प्रधान भाषा माना जाने लगा है और विदेशी विद्वान हिंदी का विविध कारणों से अध्ययन कर रहे हैं।’’३
दुनिया के कोने-कोने में आज लगभग २ करोड २० लाख अनिवासी भारतीय और भारतवंशी विराजमान हैं। प्रवासी भारतीयों का बडा दल शर्तबंदी प्रथा के अंतर्गत सबसे पहले मॉरीशस, १८३४ ई. में गया था फिर १८४५ ई. में निदाद, १८६० ई. में दक्षिण अफ्रीका, १९७० में गयाना, १८७३ में सुरीनाम तथा १८७९ ई में फीजी पहुँचा था।’’४ इन देशों में जाने वाले भारतीय मूलतः पश्चिमी बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से गए थे और सामान्यतः अवधी तथा भोजपुरी बोलते थे। कुछ खडीबोली का भी प्रयोग करते थे। धीरे-धीरे उनकी शुद्ध भोजपुरी का रूप बदलने लगा और हिंदी की एक नई विदेशी भाषिक शैली का विकास हुआ, जो कालांतर में इन प्रवासी भारतीयों की अस्मिता का प्रतीक बन गई। विश्व के लगभग १३७ देशों में हिंदी भाषा विद्यमान है। आज भी ये प्रवासी भारतीय हिंदी को बोलचाल का माध्यम बनाए हुए है, साथ ही इन देशों के मूलनिवासी भी हिंदी बोलते और समझते हैं। भारत के पडोसी देशों में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश व बर्मा में हिंदी भाषा बोलने और समझने वालों की संख्या पर्याप्त है। यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अमरीका और एशिया महाद्वीप के अनेक देशों में भारत की सहज स्वाभाविक भाषा हिंदी का पठन-पाठन शासकीय स्तर पर हो रहा है।
फीजी में बोली जानेवाली हिंदी को प्रवासी भारतीय ‘फीजीबात’ कहते हैं। सूरीनाम की हिंदी को ‘सरनामी हिंदी’ या ‘सूरनामी’ कहा जाता है तथा दक्षिण-अफ्रीका की हिंदी को नैताली।’’५ इन शैलियों का व्यवहार प्रवासी भारतीय अधिकांशतः घर में तथा औपचारिक बात में करते हैं। इनमें साहित्यिक रचना बहुत कम होती है, पर साहित्यिक रचनाओं में इनका प्रभाव निश्चय ही देखा जा सकता है। साथ ही इनका भाषिक स्वरूप वहाँ के हिंदी लोकगीतों में भी देखने को मिलता है।
विदेशों में हिंदी में मौलिक साहित्य सृजन के क्षेत्र में मारिशस का स्थान सर्वोपरि है। पं. लक्ष्मीनारायण चतुर्वेदी ‘रसपुंज’ मारिशस के प्रथम कवि हैं। सोमदत्त बखोरी, मुनीश्वर लाल चिंतामणि अन्य प्रमुख कवि हैं। आधुनिक हिंदी कवियों में हेमराज सुंदर, राजवंती अजोधिया आदि नाम उल्लेखनीय हैं। समाज सुधार, स्वदेश प्रेम, प्रकृति, भारत तथा भारतीय संस्कृति इनके प्रिय विषय हैं। उपन्यास और कथा साहित्य के क्षेत्र में अभिमन्यु अनंत, कृष्णबिहारी मिश्र, रामदेव धुरंधर, पूजानंद नेमा, दीपचंद बिहारी, भानुमति नागदान, नाटक के क्षेत्र में अस्तनिद सदासिंह, महेश रामाजियावन, निबंधकारों के पं. वासुदेव विष्णुदयाल, ठाकुरदत्त पांडे, पं. मुनीश्वरलाल चिंतामणि, प्रहलाच रामशरण ने उल्लेखनीय कार्य किया है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत मॉरीशस की यात्रा कर उस यात्रा का एक संस्मरण ‘सागर में मोती’ प्रस्तुत करते हुए श्री दयानंद पंदोला लिखते हैं-‘सरकारी भाषा अंग्रेजी हैं, किंतु वहाँ एक भी अखबार केवल अंगे*जी भाषा का हो ऐसा नहीं मिला। फ्रेंच एवं क्रिर्योल वहाँ की प्रमुख बोलचाल की भाषाएँ हैं, किंतु वे सरकारी भाषा नहीं हैं। घरों की भाषा भोजपुरी, तमिल, तेलुगू, उर्दू, मराठी और चीनी इत्यादि है। हिंदी अधिकांश लोग जानते हैं तथा स्कूलों में हिंदी अनिवार्य पढाई जाती है, बोलचाल की हिंदी में उच्चारण का कुछ फर्क हो गया है जैसे ‘गिरधारी’ वहाँ की भाषा में ‘गिरर्धोरी’ हो गया है।
सूरीनाम उन देशों में शिरोमणि है, जहाँ हिंदी भारतवंशी समाज के मस्तक पर अभिषिक्त रही है। जीत नाराइन ‘सरनामी’ के प्रसिद्ध कवि हैं, जिनकी ‘दोस्ती की चाह’ तीन भाषाओं में अनुदित पुस्तक राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई। सूरीनाम में छह आकाशवाणी और चार दूरदर्शन केंद्र हैं, जहाँ संगीत, धार्मिक प्रचार, चर्चा, साक्षात्कार, सूचनाएँ विज्ञापन और देश-विदेश के समाचार हिंदी में दिए जाते हैं। भारत के पडोसी देशों में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश व बर्मा में हिंदी बोलने और समझनेवालों की संख्या पर्याप्त है। नेपाल में हिंदी पूरे देश के ५३ प्रतिशत नेपालियों की मातृभाषा है।
यूरोप में हिंदी भाषा के अध्ययन की परंपरा सबसे प्राचीन तथा संपन्न है। हॉलैंड, जर्मनी, फ्रांस और इंग्लैड में हिंदी भाषा का अध्ययन संबंधी कार्य १८वीं सदी में शुरू हो गया था तथा इन देशों में हिन्दी भाषा तथा उसके साहित्य संबंधी महत्त्पूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किए। यूरोप ही नहीं, रूस, अमरीका, दक्षिण अमरीका, आस्ट्रेलिया और एशियाई देशों के बहुत से विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढाई हो रही है। अमरीका के शिकागो, कैलिफोर्निया, पैंसिलवीनिया, वाशिंग्टन आदि में २४ विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त कनाडा, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, स्विटजरलैंड, नार्वे, इटली, पोलैंड, डेनमार्क, जापान, हंगरी, चीन आदि देशों के लगभग १५० विश्वविद्यालयों में शोध स्तर तक हिंदी के अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था है। विदेशों से अनेक हिंदी के पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही है, जिसके द्वारा देश के बाहर बैठे कृति रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति छटपटाहट को वाणी दे रहे हैं। यदि अमरीका से ‘विश्व हिंदी जगत’ तथा श्रेष्ठतम वैज्ञानिक पत्रिका ‘विज्ञान प्रकाश’ हिंदी की दीपशिखा को जलाए हुए हैं तो मॉरीशस से ‘विश्व हिंदी समाचार’ ‘सौरभ’, ‘वसंत’ जैसी पत्रिकाएँ हिंदी के सार्वभौम विस्तार को प्रामाणिकता प्रदान कर रही हैं। इसी तरह साहित्य के अलावा ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी हिंदी स्वाभाविक गति से बढ रही है। आज जरूरत इस बात की है हम विधि, विज्ञान, वाणिज्य तथा नवीनतम प्रौद्योगिक के क्षेत्र में पाठ्यसामग्री उपलब्ध कराने में तेजी लाएं। इसके लिए समवेत प्रयास की जरूरत है। यह तभी संभव है जब लोग अपने दायित्व बोध को गहराइयों तक महसूस करे और सुदृढ इच्छाशक्ति के साथ संकल्पित हों। यूरोपीय विद्वान रेवरेण्ड फादर डॉ. कामिले बुल्के गोस्वामी तुलसीदास की हिंदी से प्रभावित हो सन् १९३५ में अपना देश बेल्जियम छोडकर भारत की नागरिकता स्वीकार कर लेते हैं, उन्होंने स्पष्ट शब्दों म कहा था कि, ‘‘अँग्रेजी यहाँ की दासी या अतिथि के रूप में ही रह सकती है, बहुरानी के रूप में नहीं। संस्कृत माँ, हिन्दी गृहिणी और अँग्रेजी नौकरानी है।’’७ आज समय की माँग है कि,
हम सब मिलकर फादर बुल्के के अहसास को चरितार्थता प्रदान करें।
इस तरह तमाम निकषों एवं प्रतिमानों पर कसे जाने के बाद हिंदी सही माने में विश्व भाषा की गरिमा के साथ गतिमान है, वह विश्व के अनेक महत्त्वपूर्ण पक्षों में संदर्भित है। हिंदी की भावी दिशा इस और संकेत कर रही है कि, उसका विश्व संदर्भ निरंतर फैल रहा है। हम वैचारिक खुलेपन का परिचय देकर इस सत्कार्य को गति प्रदान करें।
सारांश यह है कि हिंदी विश्व भाषा बनने की दिशा में उत्तरोत्तर अग्रसर है। वह विश्व के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण देशों के विश्व विद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन में भागीदार है। अकेले अमरीका में ही लगभग एक सौ पचास से ज्यादा शैक्षणिक संस्थाओं म हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है। आज जब २१वीं सदी में वैश्वीकरण के दबावों के चलते विश्व की तमाम संस्कृतियाँ व भाषाएँ आदान प्रदान व संवाद की प्रक्रिया से गुजर रही हैं तो हिंदी इस दिशा में विश्व मनुष्यता को निकट लाने के लिए सेतु का कार्य कर सकती है। उसके पास पहले से ही बहु सांस्कृतिक परिवेश में सक्रिय रहने का अनुभव है, जिससे वह अपेक्षाकृत ज्यादा रचनात्मक भूमिका निभाने की स्थिति में है। वैश्वीकरण के इस दौर में हिंदी भाषा को गति देनी है तो हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा और हिंदी को रो*ागार परक एवं प्रगतिशील बनाने के प्रयास करने होंगे। ऐसा होने
पर निःसंदेह भाषा का भविष्य वैश्वीकरण के दौर में
उज्ज्वल होगा।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शब्द अपने में एक संदेश लिए हुए हैं-‘‘हिंदी राष्ट्रीयता के मूल को सींचती है और दृढ करती है। देश का कोई भी सच्चा प्रेमी हिंदी का तिरस्कार नहीं कर सकता।’’९ ?
संदर्भ ग्रंथ सूची-
१) राष्ट्रभाषा-अक्टूबर २०१०, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा, प्रो. हिंदी नगर, वर्धा (महा.), पृ. ६-७
२) साहित्य अमृत-मासिक अंक, नई दिल्ली, जून २००३,
पृ. ३०
३) राजभाषा भारती अंक-८४-राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, जनवरी-मार्च, १९९९, पृ. ४९
४) विमलेशकांति वर्मा, हिंदी और उसकी उपभाषाएँ, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली, १९९५, पृ. ३१७
५) विमलेशकांति वर्मा-फीजीबात-हिंदी की विदेशी भाषिक शैली, वर्ष-३६, अंक-२, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार, नई दिल्ली-पृ. ३४-३५
६) ‘मारीशस में सात दिन’-संपादक हरिबाबू कं सल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, नई दिल्ली, १९८५-पृ. ५१
७) अक्षरा-जनवरी और फरवरी-करूणा शंकर उपाध्याय-पृ. ११३-११४
८) शोध दिशा-अंक-१३-पृ. ७७, जनवरी-मार्च
झुलेलाल सोसायटी, झूलेलाल अर्पाटमेंट-३०१, साकी रोड
धुलिया-४२४००१ मो. ९४२३३०१३०६