पुस्‍तक विमोचन एवं प्रेमचंद गोष्‍ठी दि; 31 जुलाई 2017 जोधपुर

दिनांक: 2017-08-02
प्रेमचंद ने कहानी को चमत्कार से बाहर निकाला - डॉ. इंदुशेखर श्तत्पुरुषश् जोधपुर 31 जुलाई। राजस्थान साहित्य आकदमी उदयपुर के अध्यक्ष डॉ. इंदुशेखर ‘तत्पुरुष’ ने कहा है कि मुंशी प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी को चमत्कार से बाहर निकाला तथा उसे स्वाधीन चेतना प्रदान की। डॉ. इंदुशेखर आज गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र जोधपुर में अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद के तत्वावधान में श्प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकताश् विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के आसन से बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कहानी और उपन्यास का जो वर्चस्व आज हिन्दी में है, वह प्रेमचंद के कारण ही है। हिन्दी साहित्य में उपन्यास और कहानी को प्रतिष्ठित करने में प्रेमचंद का नाम अग्रणी है। कविता में निराला का जो स्थान है, वही स्थान कहानी में प्रेमचंद का है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डॉ. सत्यनारायण ने कहा कि आधुनिक कथा साहित्य प्रेमचंद की कफन कहानी से निकला है तथा प्रेमचंद कहानी को आदर्श से यथार्थ में लाए।प्रेमचंद ने हिन्दुस्तानी जन जीवन की गरीबी और यातना को शब्द दिए । प्रेमचंद अदृश्य रूप से निर्मल वर्मा जैसे साहित्यकार पर छाए रहे । मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय ने कहा कि सच्चा रचनाकार कभी भी अप्रासंगिक नहीं होता। प्रेमचंद आज भी प्रसांगिक हैं। प्रेमचंद ने समय से आगे जाकर सोचा इसलिए वे आज भी याद किए जाते हैं। उन्होंने जो सवाल उठाए वे आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं। संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित अखिल भारतीय साहित्य परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं क्षेत्रीय संगठन मंत्री विपिनचंद्र शर्मा ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण एवं मार्गदर्शक होता है। हम आज भी यदि प्रेमचंद को ,कबीर को याद करते हैं तो केवल इसलिए के वे अपने लेखन से समाज में परिवर्तन लाए। उन्होंने कहा कि तामसिक चिंतन से समाज के लिए हानिकारक साहित्य सृजित होता है तथा सात्विक चिंतन से समाजोपयोगी साहित्य की रचना होती है। प्रमुख वक्ता डॉ. कैलाश कौशल ने कहा कि प्रेमचंद की कलम स्वतंत्र थी और वे सच्चाई तथा ईमानदारी के लेखक थे। उन्होंने जो लिखा, अपने अनुभवों की पाठशाला से सीखा। उनका साहित्य उनके जीवन संघर्षों की उपज है। प्रेमचंद को आज भी याद करना यह सिद्ध करता है कि वे बड़े रचनाकार थे। अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद की महासचिव डॉ. पद्मजा शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि राजस्थान साहित्य अकादमी को अब अध्यक्ष मिल गया है अतः उम्मीद की जा सकती है कि अब अकादमी साहित्य के लिए बेहतर काम करेगी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने किया। इस अवसर पर डॉ. सावित्री डागा, डॉ. कुक्कू शर्मा, डॉ. संध्या शुक्ला, डॉ चांदकौर जोशी, डॉ. भावेन्द्र शरद जैन, डॉ. छोटाराम, दीप्ति कुलश्रेष्ठ, सुषमा चौहान, डॉ. सरोज कौशल, डॉ. रमाकांत शर्मा, डॉ. शैलेन्द्र आचार्य, डॉ. संजय श्रीवास्तव, डॉ. आकाश मिड्ढा, धर्मेश रूठिया, माधव राठौड़, रामकिशोर फिड़ौदा, जितेन्द्र जालोरी, वसन्ती पंवार, मंशा नायक तथा कैलाश माली सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित थे। हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया का भी विमोचन- कार्यक्रम में डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक श्हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशियाश् का विमोचन किया गया। पुस्तक की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए राजस्थान साहित्य आकदमी उदयपुर के अध्यक्ष डॉ. इंदुशेखर ‘तत्पुरुष’ ने कहा कि कुछ विमर्श एक खास विचार के तहत अब तक दबाए गए थे। उन मुद्दों पर भी विमर्श होना चाहिए। आज तक जो विमर्श हुए हैं वे थोपे हुए मुद्दों पर हुए हैं लेकिन यह पुस्तक नए विमर्श प्रदान करती है जिसका साहित्य जगत में स्वागत होना चाहिए। इस किताब को सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर देखने की जरूरत है न कि राजनीतिक दृष्टिकोण से। पुस्तक की महत्ता को रेखांकित करते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं क्षेत्रीय संगठन मंत्री विपिन चंद्र शर्मा ने कहा कि लेखक ने इण्डोनेशिया में जाकर वहां फल-फूल रही हिन्दू संस्कृति को अपनी आंखों से देखा तथा वहां के सैंकड़ों चित्रों एवं जीवंत वर्णन के माध्यम से भारतवासियों का ध्यान आकर्षित किया है तथा यह सिद्ध किया है कि भारतीयों को भारत से बाहर रह रहे हिन्दुओं से सरोकार होना चाहिए। --00कृ डॉ भावेन्द्र शरद जैन